मंदिर के पट खोलो
शीर्षक -मंदिर के पट खोलो मंदिर के पट खोलो गोविंद भक्त खड़े दरवाजे पर पूजा की थाली तुम्हें बुलाती रोरी कुमकुम तुम बिन नही सुहाती। बंद हुए क्यों पट मंदिर के पूछ रही पूजा की थाली। मेरा नैना तरस रहे दर्शन को। तुम बिन कौन सहारा मेरा। दर्शन दे दो हे जगदम्बे तुम बिन जीवन सुना मेरा। रो रही है अँखियाँ संकट में तुम कौन तारन हारा। भक्तो पर कष्ट है भारी माँ जगदम्बे तुम्ही सहारा। पाप बढ़ गया जब धरती पर तुमने शत्रु दल को मारा छोड़ दिया क्यों आज साथ हमारा। इस संकट में तुम बिन कौन सहारा। व्रन्दावन की गलियां सुनी सुनी पड़ी माँ जम्बू कटरा सुने हो गए सब देवालय बंद हुई जब पुरी तुम्हारी। कौन जगाये अब भजन सुना कर कौन उतारे आरती तुम्हारी क्या याद नही तुम को भक्तों की आती। कैसे बेटे से बिन मिले माँ सो जाती। आज धरा पर संकट के बादल मंडराते और बंद पड़े है मंदिर तुम्हारे। संध्या चतुर्वेदी अहमदाबाद, गुजरात
The tune of death
A short poem about the inevitable.