Aman G Mishra
Aman G Mishra 25 Aug, 2019 | 0 mins read
भारत भविष्य

भारत भविष्य

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Aman G Mishra
Aman G Mishra 24 Aug, 2019 | 1 min read
चिंता:कविता

चिंता:कविता

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Aman G Mishra 22 Aug, 2019 | 1 min read
पुरुषोत्तमः

पुरुषोत्तमः

श्री राम :एक आदर्श राम को आदर्श मानने और होने में आस्था और प्रासंगिकता में हमेशा से ही मतभेद रहे हैं। परंतु क्या श्री राम का चरित्र इन मतभेदों या अपना अपना मत रखने वाले लोगो की परिभाषा का मोहराज नही है। बल्कि ये पंडितों को अपना मत रखते समय श्री राम के आदर्शों को ध्यान में रखें,तो इनके पंडित्व में थोड़ा बहुत आदर्शवाद की वृद्धि की सम्भावना रहेगी। क्योकि चाहे तुलसी और बाल्मीकी की लिखे ग्रन्थ में देखें या हिन्दू धर्म के आदर्श के रूप में देखें, श्री राम आदर्श ही रहेंगे। एक आदर्श पुत्र, आदर्श पति, आदर्श पिता, आदर्श भाई ,इन सबसे अहम है आदर्श राजा। ये सभी आदर्श ही श्री राम को आदर्श पुरुष , मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम बनाते हैं। यहाँ बात हिन्दू धर्म की नही है कोई भी धर्म हो, बेटा अगर राम जैसा हो, भाई अगर राम जैसा हो,पिता अगर राम जैसा हो, पति अगर राम जैसा हो, तो धरती स्वतः ही स्वर्ग बन जायेगी। -अमन मिश्र

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Aman G Mishra
Aman G Mishra 22 Aug, 2019 | 1 min read
खोज

खोज

हम हर पल तलाश क्यों करते रहते हैं! कभी दूसरों में खुद की तो कभी खुद में दूसरों की। यही वजह है कि हम किसी की कला से इतना प्रभावित होते हैं कि हम उसे जीने लगते हैं,फिर जब हम उस कला के असली दांव-पेंच से गुजरते हैं तो फिर समय की बर्बादी के अलावा हमारे हाँथ कुछ नही लगता। तो करना क्या चाहिए? यही सवाल बार बार उठता है क्यों कि इस तरह से कई लोगों की पूरी ज़िंदगी खोजने में ही निकल जाती है। यदि आपमें वो कला है,या आपको तलाश है उस कला की जो किसी व्यक्ति में है,आप् कॉपी करना बंद करें,उस कला के असली दांव-पेंचों से गुजरे, कुछ समय दें;फिर अपना अवलोकन करें। आपको खुद में न तो किसी और की तलाश करने से सफलता मिलेगी। और न ही किसी और में खुद को ढूढने से, आप् सफल होंगे जब आप खुद में खुद को ढूढ़ पाएंगे। आपको स्वयं से मिलने पर असंख्य शुभकामाएं! -अमन मिश्र

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Kiran
Kiran 20 Aug, 2019 | 1 min read
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Hari
Hari 20 Aug, 2019 | 1 min read
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Raghav Sen
Raghav Sen 19 Aug, 2019 | 3 mins read
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Aman G Mishra
Aman G Mishra 19 Aug, 2019 | 1 min read

धन्यवाद

*समय समय पर भगवान का धन्यवाद अदा करना चाहिए* *किसी निर्माणाधीन भवन की सातवीं मंजिल से* *ठेकेदार ने नीचे काम करने वाले मजदूर को आवाज दी !* *निर्माण कार्य की तेज आवाज के कारण मजदूर कुछ सुन न सका कि उसका ठेकेदार उसे आवाज दे रहा है !* *ठेकेदार ने उसका ध्यान आकर्षित करने के लिए एक 1 रुपये का सिक्का नीचे फैंका जो ठीक मजदूर के सामने जा कर गिरा !* *मजदूर ने सिक्का उठाया और अपनी जेब में रख लिया, और फिर अपने काम मे लग गया !* *अब उसका ध्यान खींचने के लिए सुपर वाईजर ने पुन: एक 5 रुपये का सिक्का नीचे फैंका !* *फिर 10 रु. का सिक्का फेंका* *उस मजदूर ने फिर वही किया और सिक्के जेब मे रख कर अपने काम मे लग गया !* *ये देख अब ठेकेदार ने एक छोटा सा पत्थर का टुकड़ा लिया और* *मजदूर के उपर फैंका जो सीधा मजदूर के सिर पर लगा!* *अब मजदूर ने ऊपर देखा और ठेकेदार से बात चालू हो गयी !* *ऐसी ही घटना हमारी जिन्दगी मे भी घटती रहती है..* *भगवान हमसे संपर्क करना ,मिलना चाहता है, लेकिन हम* *दुनियादारी के कामों में इतने व्यस्त रहते हैं* *की हम भगवान को याद नहीं करते !* *भगवान हमें छोटी छोटी खुशियों के रूप मे उपहार देता रहता है, लेकिन हम उसे याद नहीं करते और* *वो खुशियां और उपहार कहाँ से आये ये ना देखते हुए, उनका उपयोग कर लेते है,* *और भगवान को याद ही नहीं करते!* *भगवान् हमें और भी खुशियों रूपी उपहार भेजता है, लेकिन उसे भी हम हमारा भाग्य समझ कर रख लेते हैं, भगवान् का धन्यवाद नहीं करते, उसे भूल जाते हैं !* *तब भगवान् हम पर एक छोटा सा पत्थर फैंकते हैं, जिसे हम कठिनाई, तकलीफ या दुख कहते हैं,* *फिर हम तुरन्त उसके निराकरण के लिए* *भगवान् की ओर देखते है, याद करते हैं !* *यही जिन्दगी मे हो रहा है.* *यदि हम हमारी छोटी से छोटी ख़ुशी भी* *भगवान् के साथ उसका धन्यवाद देते हुए बाँटें,* *तो हमें भगवान् के द्वारा फैंके हुए पत्थर का इन्तजार ही नहीं करना पड़ेगा

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Aman G Mishra
Aman G Mishra 19 Aug, 2019 | 1 min read

साक्षात्कार

दरअसल कुपात्र तार्किक लोगों ने एक नैरेटिव बनाया कि हमारे शास्त्रों में जन्म आधारित जाती सूचक शब्दों का वर्णन है। इसमें वह भी शामिल हैं जो तथाकथित धार्मिक हैं क्योंकि इससे उन्हें बिना कुछ किये धरे सम्मान व धन मिल जाता था, और वे भी जिनमें सनातन व्यवस्था की वास्तविक महानता से चिढ़ने वाले जैसे वामपंथी लोग भी, जो इसे खत्म कर देना चाहते हैं। गलती ये रही कि इस नैरेटिव पर चोट करने की बजाय सब अपनी जाति जन्मगत मानने लगे और शास्त्रों को भी इसी दृष्टि से पढ़ने लगे। जीवन भी वैसे ही जीने लगे। नाम के आगे श्रीवास्तव इत्यादि लगाकर स्वयं के साथ जाती को अभिन्न बना लिया। तुलसी, चैतन्य, शंकर, मनु जैसे सिद्धों के वाक्यों को उस मूल भावना में देखना होगा जहां जाति गुणकर्मविभागशः है। इस चौपाई के परिप्रेक्ष्य में श्रीराम द्वारा उल्लिखित नवधा भक्ति की ओर भी देखना होगा जहां श्रीभगवान ने भीलनी भक्त शबरी माता को यह बताने के बाद कहा कि इस भक्ति के नौ अंगों में से किसी एक का भी यदि कोई पालन करता है तो वह स्त्री पुरुष चर अचर कोई भी हो, मुझे अतिशय प्रिय होता है। इस प्रकार गोस्वामी जी ने श्रीभगवान के मुखकमल से यह कहलाकर सारी संकीर्णता और संशय की दीवार ध्वस्त कर दी।

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Aman G Mishra
Aman G Mishra 19 Aug, 2019 | 1 min read

चरित्र

*नेल्सन मंडेला दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति बनने के बाद, अपने सुरक्षा कर्मियों के साथ एक रेस्तरां में खाना खाने गए। सबने अपनी अपनी पसंद के खाना का आर्डर दिया और खाना के आने का इंतजार करने लगे।*

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