पुरुषोत्तमः
श्री राम :एक आदर्श राम को आदर्श मानने और होने में आस्था और प्रासंगिकता में हमेशा से ही मतभेद रहे हैं। परंतु क्या श्री राम का चरित्र इन मतभेदों या अपना अपना मत रखने वाले लोगो की परिभाषा का मोहराज नही है। बल्कि ये पंडितों को अपना मत रखते समय श्री राम के आदर्शों को ध्यान में रखें,तो इनके पंडित्व में थोड़ा बहुत आदर्शवाद की वृद्धि की सम्भावना रहेगी। क्योकि चाहे तुलसी और बाल्मीकी की लिखे ग्रन्थ में देखें या हिन्दू धर्म के आदर्श के रूप में देखें, श्री राम आदर्श ही रहेंगे। एक आदर्श पुत्र, आदर्श पति, आदर्श पिता, आदर्श भाई ,इन सबसे अहम है आदर्श राजा। ये सभी आदर्श ही श्री राम को आदर्श पुरुष , मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम बनाते हैं। यहाँ बात हिन्दू धर्म की नही है कोई भी धर्म हो, बेटा अगर राम जैसा हो, भाई अगर राम जैसा हो,पिता अगर राम जैसा हो, पति अगर राम जैसा हो, तो धरती स्वतः ही स्वर्ग बन जायेगी। -अमन मिश्र
खोज
हम हर पल तलाश क्यों करते रहते हैं! कभी दूसरों में खुद की तो कभी खुद में दूसरों की। यही वजह है कि हम किसी की कला से इतना प्रभावित होते हैं कि हम उसे जीने लगते हैं,फिर जब हम उस कला के असली दांव-पेंच से गुजरते हैं तो फिर समय की बर्बादी के अलावा हमारे हाँथ कुछ नही लगता। तो करना क्या चाहिए? यही सवाल बार बार उठता है क्यों कि इस तरह से कई लोगों की पूरी ज़िंदगी खोजने में ही निकल जाती है। यदि आपमें वो कला है,या आपको तलाश है उस कला की जो किसी व्यक्ति में है,आप् कॉपी करना बंद करें,उस कला के असली दांव-पेंचों से गुजरे, कुछ समय दें;फिर अपना अवलोकन करें। आपको खुद में न तो किसी और की तलाश करने से सफलता मिलेगी। और न ही किसी और में खुद को ढूढने से, आप् सफल होंगे जब आप खुद में खुद को ढूढ़ पाएंगे। आपको स्वयं से मिलने पर असंख्य शुभकामाएं! -अमन मिश्र
धन्यवाद
*समय समय पर भगवान का धन्यवाद अदा करना चाहिए* *किसी निर्माणाधीन भवन की सातवीं मंजिल से* *ठेकेदार ने नीचे काम करने वाले मजदूर को आवाज दी !* *निर्माण कार्य की तेज आवाज के कारण मजदूर कुछ सुन न सका कि उसका ठेकेदार उसे आवाज दे रहा है !* *ठेकेदार ने उसका ध्यान आकर्षित करने के लिए एक 1 रुपये का सिक्का नीचे फैंका जो ठीक मजदूर के सामने जा कर गिरा !* *मजदूर ने सिक्का उठाया और अपनी जेब में रख लिया, और फिर अपने काम मे लग गया !* *अब उसका ध्यान खींचने के लिए सुपर वाईजर ने पुन: एक 5 रुपये का सिक्का नीचे फैंका !* *फिर 10 रु. का सिक्का फेंका* *उस मजदूर ने फिर वही किया और सिक्के जेब मे रख कर अपने काम मे लग गया !* *ये देख अब ठेकेदार ने एक छोटा सा पत्थर का टुकड़ा लिया और* *मजदूर के उपर फैंका जो सीधा मजदूर के सिर पर लगा!* *अब मजदूर ने ऊपर देखा और ठेकेदार से बात चालू हो गयी !* *ऐसी ही घटना हमारी जिन्दगी मे भी घटती रहती है..* *भगवान हमसे संपर्क करना ,मिलना चाहता है, लेकिन हम* *दुनियादारी के कामों में इतने व्यस्त रहते हैं* *की हम भगवान को याद नहीं करते !* *भगवान हमें छोटी छोटी खुशियों के रूप मे उपहार देता रहता है, लेकिन हम उसे याद नहीं करते और* *वो खुशियां और उपहार कहाँ से आये ये ना देखते हुए, उनका उपयोग कर लेते है,* *और भगवान को याद ही नहीं करते!* *भगवान् हमें और भी खुशियों रूपी उपहार भेजता है, लेकिन उसे भी हम हमारा भाग्य समझ कर रख लेते हैं, भगवान् का धन्यवाद नहीं करते, उसे भूल जाते हैं !* *तब भगवान् हम पर एक छोटा सा पत्थर फैंकते हैं, जिसे हम कठिनाई, तकलीफ या दुख कहते हैं,* *फिर हम तुरन्त उसके निराकरण के लिए* *भगवान् की ओर देखते है, याद करते हैं !* *यही जिन्दगी मे हो रहा है.* *यदि हम हमारी छोटी से छोटी ख़ुशी भी* *भगवान् के साथ उसका धन्यवाद देते हुए बाँटें,* *तो हमें भगवान् के द्वारा फैंके हुए पत्थर का इन्तजार ही नहीं करना पड़ेगा