31) हर रोज़ बच्चों को बेहतर बनाने में व बच्चों के बेहतर परिणाम हेतु निरंतर प्रयत्न करने की श्रृखंला में एक शिक्षक भूल जाता है काम से मिले थकान का दर्द, ख़ुद का भविष्य, अपने आज का भी कर देता है कुर्बान। पर अफ़सोस शिक्षक के इस त्याग का एहसास कुछेक बच्चे ही करते हैं जो करते हैं वह गढ़ लेते हैं अपना उज्ज्वल भविष्य एक दिन।
32)यदि हमसे मुस्कुराकर, हँसी ख़ुशी बात करने वाला यदि हमसे मौन रहने लगे इसका तात्पर्य है कि रिश्ते निभाने में हमने केवल स्वयं का हित देखा और हमने अपने अहंकार से रिश्तों को चकनाचूर कर दिया।
33)जिस दिन से हम यह समझ जाएंगे कि हमारे शिक्षक नारियल की तरह हैं, जो बाहर से तो सख्त (मजबूत) दिखाई पड़ते हैं पर अंदर से मुलायम हैं, उस दिन से हमारी ज़िंदगी की दिशा व दशा अवश्य बदलने लगेगी।
34)अगर हम विद्यार्थी की भूमिका में अपनी ज़िंदगी को निभा रहे हैं, तो हमें सुबह सवेरे उठने के लिए अलार्म लगाने की कोई आवश्यकता नहीं है। जिनके मन मस्तिष्क में ज़िम्मेदारी का अलार्म लगा रहता है, जिनके मन में इस बात का संकल्प है कि मुझे अपने परिवार के कल को बदलना ही है उन्हें आगे बढ़ने से कोई रोक नहीं सकता है।
35)आज यदि हमें अपनी ग़लती अपनी आँखों से नहीं दिख रही है, और हम ग़लती पर ग़लती नियमित रुप से करते जा रहे हैं तो वो दिन दूर नहीं जब हमारे द्वारा की गईं ग़लतियाँ हमें अपने सभी करीबियों से बहुत दूर कर देंगी।
36)कौन हमारे लिए कौन-कौनसी बातें कह रहा है? क्या षडयंत्र रच रहा है? हमारे विषय में क्या दूसरों से कह रहा है? इन तमाम प्रश्नों का उत्तर ढूंढने की बजाए उस ईर्ष्यालु शख्स को प्रतिउत्तर देने की बजाए हमें अपने कदम को सत्य पथ पर बढ़ाते हुए सबकुछ ईश्वर के श्रीचरणों में समर्पित कर देना चाहिए और ईश्वर से यह प्रार्थना करना चाहिए कि हे प्रभु मेरे विषय में कोई कुछ भी सोचे, कहे, षडयंत्र रचे पर कभी भी इस प्रकार का भाव हमारे अंदर ना आने देना।
37)माता-पिता व शिक्षक की समझाई अच्छी बात करैले की सब्जी की तरह यदि कड़वी लगती है तो इसका सीधा मतलब है कि हम उन रास्तों पर अपने कदम बढ़ा रहे हैं जिन रास्तों पर चलकर वर्तमान में तो हमें सुख का अनुभव हो रहा है पर भविष्य में हमें दुःख भोगना पड़ेगा अर्थात पछताना होगा।
38) जिसके शीश पर माँ की छाया है यह समझा जा सकता है कि उसके शीश पर साक्षात देवता की छाया है।
39) मेरे पापा जब मेरी आँखों के सामने थे और रोज़ प्रातःकाल साइकिल से गाँव में घर- घर बच्चों को ट्यूशन पढ़ाने जाया करते थे। और सुबह जब मैं लेट से उठता था माँ से पूछता था "माँ पापा कहां हैं, माँ कहती थी पापा कब के चले गए।" आज पापा जिंदा नहीं हैं, आज जब मैं ख़ुद सुबह सवेरे उठ जाता हूँ, बच्चों को पढ़ाता हूँ तो पापा की मेहनत याद आती है। कितनी शारीरिक मानसिक थकावट होती रही होगी उनको पढ़ाने के पश्चात, कभी-कभी सुबह उठने का मन भी उनका नहीं रहता रहा होगा फिर भी वो जाते थे रोज़ पढ़ाने, हम सबके अभिभाकगण यही संघर्ष रोज़ कर रहे हैं। और हम उनके लिए क्या कर रहे हैं? कभी ख़ुद से सवाल कीजिए।
40) जो पीड़ा पेड़ को होती है अपनी शाखाओं का ख़ुद से अलग होने के पश्चात, जो पीड़ा होती बेटी की विदाई के वक्त एक माँ के मन की, जो पीड़ा होती है पिता के धैर्य के टूटने की जीवन के झंझावातों को सहने वक्त, ठीक उतनी ही पीड़ा होती है एक शिक्षक को विद्यार्थियों का शैक्षणिक सत्र समाप्ति उपरांत विद्यार्थियों को विदा करने वक्त।
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