प्रेरणादायक विचारों का संचार

अति प्रेरणादायक विचार

Kumar Sandeep
17 Aug, 2026 • 1 min read min read • hi
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1)जब तक पिता जीवित हैं, ईश्वर का अनेकानेक आभार व्यक्त करना नितांत आवश्यक है क्योंकि बिना पिता के ठीक वही पीड़ा महसूस होती है जैसी पीड़ा एक गरीब महसूस करता है पूस की रात में कपड़े और सुरक्षित छत के अभाव में।2)संबंध में संशय का समावेश होना मजबूत संबंध के बंधन को भी ध्वस्त कर 1, है। 


3)सुबह सवेरे उठने की इज़ाज़त नींद बिल्कुल नहीं देना चाहती है। 5पर उस वक्त ही ज़िम्मेदारी धीमी आवाज़ में हमें उठने की इज़ाज़त देती है। यदि इस वक्त ज़िम्मेदारी की h आवाज़ को हम नहीं सुनेंगे तो आने वाले कल में हमारीa आवाज़ को कोई नहीं सुनेगा, हम अस्तित्वहीन हो जाएंगे।


4)सुबह नींद द्वारा लाख मार्ग भटकाने के बावजूद यदि हम नींद की ना सुनकर उठ जाते हैं और अपने कर्म में मग्न हो जाते हैं तो यह हमारे स्वर्णिम भविष्य का सुखद सूचक है। ऐसा करने से कल की तारीख में हम बेशक धनवान बनें या ना बनें पर प्रातःकाल उठकर कर्म में रत रहकर इतिहास के किसी एक पृष्ठ पर हम अपनी उपस्थिति अवश्य दर्ज कर पाएंगे।



5)हम सबके चेहरे की मुस्कुराहट जो हमारे चेहरे पर ज़िंदा है, यह हमारी माँ द्वारा किए गए ईश्वर के श्रीचरणों में उपवास का प्रतिफल है। हे ईश्वर! हर संतान की ओर से प्रार्थना है कि माँ के चेहरे पर मुस्कुराहट और ख़ुशी हमेशा ज़िंदा रहे व माँ तब तक ज़िंदा रहे जब तक संतान की साँसें ज़िंदा हैं। यदि यह प्रार्थना स्वीकृत हो जाएगी तो हर आदर्श संतान की ख़ुशी की कोई निर्धारित सीमा नहीं होगी। 

6)यदि पापा द्वारा की गई मेहनत कुछ अलग करने के लिए प्रेरित नहीं कर रही है, यदि माँ की अथक मेहनत हमें प्रेरणा नहीं दे रही है, तो दुनिया की कोई ताकत हमें प्रेरणा नहीं दे सकती है। पिता की आँखों में माँ की आँखों में पल रहे हमारे प्रति अनेक सपने ही हमारे लिए सबसे बड़ी प्रेरणा है। 


7)बच्चों की ग़लत गतिविधियों से मन हो जाता है निराश फिर भी भूलकर ग़लतियों को शिक्षक करते हैं उनके लिए प्रयास। नहीं रखते हैं शिक्षक अपेक्षा यह कि बच्चे करें मेरा बेइंतहा सम्मान, रहती है अपेक्षा उनकी कि बच्चे करें माता-पिता का बेइंतहा सम्मान। 


8)वो दौर अलग था जब शिक्षक की आज्ञा का पालन करना विद्यार्थी अपना प्रथम कर्तव्य मानते थे पर आज का दौर पूर्णतः विपरीत है। आज गुरु की आज्ञा, गुरु की बात कुछेक विद्यार्थी के लिए कड़वी दवा के समान लगती है। 


9)ज्ञानी व्यक्ति के समक्ष बैठने पर स्वयं को अज्ञानी समझना हमारा विवेष गुण होना चाहिए ऐसा करने से हम ज्ञानी व्यक्ति से अनेक ज्ञान की बातें सीख सकते हैं। और जो ज्ञान हमें उस ज्ञानी व्यक्ति से प्राप्त होगा उस ज्ञान की प्राप्ति हम बाजार से क्रय करके कदापि नहीं ला सकते हैं, चाहे हम कितने भी धनी क्यों ना हो। 



10)हमें जीते जी अपने मन,कर्म,वचन का कुछ इस तरह सार्थक उपयोग करना चाहिए ताकि हम जिस दिन ज़िंदा ना भी रहें फिर भी हम पृथ्वीलोक पर मौजूद हर शख्स के दिल में जिंदा रहें।

 



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