अंतिम संस्कार : लकड़ी
यहाँ इस कहानी का सबसे छोटा और सधा हुआ सार (Summary) है: यह कहानी एक रिटायर्ड प्रोफेसर और उनके बचपन के दोस्त (एक पेड़) की मार्मिक विदाई है। सालों बाद गाँव लौटने पर प्रोफेसर को पता चलता है कि हाईवे बनने के कारण कल उस पेड़ को काट दिया जाएगा। पेड़ बिना किसी शिकायत के अपनी मौत को स्वीकारता है और प्रोफेसर से अपना 'अंतिम संस्कार' करने को कहता है। अंत में, प्रोफेसर उसे काटने की हिम्मत नहीं जुटा पाते। वे कुल्हाड़ी का लोहे वाला हिस्सा (जो मारने का प्रतीक है) वहीं छोड़ देते हैं और महज़ **लकड़ी का डंडा** अपने साथ ले आते हैं—ताकि उनका दोस्त हमेशा के लिए उनके साथ रह सके।
अंतिम संस्कार : लकड़ी
यहाँ इस कहानी का सबसे छोटा और सधा हुआ सार (Summary) है: यह कहानी एक रिटायर्ड प्रोफेसर और उनके बचपन के दोस्त (एक पेड़) की मार्मिक विदाई है। सालों बाद गाँव लौटने पर प्रोफेसर को पता चलता है कि हाईवे बनने के कारण कल उस पेड़ को काट दिया जाएगा। पेड़ बिना किसी शिकायत के अपनी मौत को स्वीकारता है और प्रोफेसर से अपना 'अंतिम संस्कार' करने को कहता है। अंत में, प्रोफेसर उसे काटने की हिम्मत नहीं जुटा पाते। वे कुल्हाड़ी का लोहे वाला हिस्सा (जो मारने का प्रतीक है) वहीं छोड़ देते हैं और महज़ **लकड़ी का डंडा** अपने साथ ले आते हैं—ताकि उनका दोस्त हमेशा के लिए उनके साथ रह सके।
अब बात ख़तम
The poem “Ab Baat Khatam” expresses the exhaustion of someone who has finally decided to stop trying to save a relationship. After saying everything that needed to be said and enduring everything that needed to be endured, the speaker reflects on the pain, misunderstandings, broken trust, and self-blame they have carried. They also remind the other person that their own journey was not free of struggles or thorns. The poem ends with a firm, emotional decision: the speaker has stayed as long as they could, but now it is time to let go. It captures the quiet pain of reaching one's limit and choosing closure over further suffering.
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मेरी राख: एक सफर
राकेश मृत्यु के बाद अपनी ही राख के सफर का साक्षी बनता है। जलगाँव में शरीर जलता है, फिर राख के तीन हिस्से — जन्मस्थान की नाराज़ नदी, पुणे के पुल पर बहा अधूरा इश्क़ और मुंबई के समंदर में विलीन अहंकार। आखिरी राख बेटा गुरुस्थान की मौन मिट्टी में बिखेरता है, जहाँ राकेश समझता है — मीटिंग, जायदाद, प्रेम सब रेगिस्तान में 'ओसिस' जैसा भ्रम था, सच तो शून्यता है।
तू है यहीं कहीं
जब मुहब्बत रूहानी हो तो जिस्मानी गैरमौजूदगी कुछ मायने नहीं रखती | इसी मनोभाव को अपनी कुछ मौलिक स्वरचित पंक्तियों के माध्यम से साझा कर रहा हूँ |
एहसास स्मृतियां और वर्तमान
कभी कभी हम अतीत के सहारे ही वर्तमान में लौटते हैं।
#Feelings #Life
शौकिया कवि
A Hindi poem about an amateur poet who has gradually become silent, withdrawn from others and from his own emotions, questioning whether the poet within him has merely fallen asleep or disappeared.
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सरहद मेरे मन की
प्रेम में असफलता स्वीकारने को हार नहीं कहना चाहिए बल्कि उस ऊपर वाले की मर्जी के आगे समर्पण करने जैसा मानना चाहिए | इन्हीं भावनाओं को अपनी कुछ मौलिक स्वरचित पंक्तियों के माध्यम से साझा कर रहा हूँ जिसमें ईश्वर की मर्जी के आगे एक समर्पित प्रेमी, अपनी जिद में डूबी हुई प्रेमिका से निवेदन कर रहा है |
कितनी परतें हैं इस अनजाने मन की
हमारे मन में कभी-कभी इतना सब चलता रहता है कि हमारा अंतर्मन विचलित होने लगता है ।
##talash
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