सरहद मेरे मन की

प्रेम में असफलता स्वीकारने को हार नहीं कहना चाहिए बल्कि उस ऊपर वाले की मर्जी के आगे समर्पण करने जैसा मानना चाहिए | इन्हीं भावनाओं को अपनी कुछ मौलिक स्वरचित पंक्तियों के माध्यम से साझा कर रहा हूँ जिसमें ईश्वर की मर्जी के आगे एक समर्पित प्रेमी, अपनी जिद में डूबी हुई प्रेमिका से निवेदन कर रहा है |

chandra mohan katyal
15 Sep, 2026 1 min read min read hi
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सरहद मेरे मन की

सरहद मेरे मन की

प्रेम में असफलता स्वीकारने को हार नहीं कहना चाहिए बल्कि उस ऊपर वाले की मर्जी के आगे समर्पण करने जैसा मानना चाहिए | 

इन्हीं भावनाओं को अपनी कुछ मौलिक स्वरचित पंक्तियों के माध्यम से साझा कर रहा हूँ जिसमें ईश्वर की मर्जी के आगे एक

समर्पित प्रेमी, अपनी जिद में डूबी हुई प्रेमिका से निवेदन कर रहा है | 

***

 

सरहद मेरे मन की बस अब पार न कर तू ,

छोड़ भी दे ओ मेहरबाँ अब प्यार न कर तू |

बामुश्किल ठहराव सा आया चंचल मन में,

फिर से मीठी यादों की झंकार न कर तू ||

 

सरहद मेरे मन की बस अब पार न कर तू

 

ख़्वाबों के वो महल ढह गए जाने कब के ,

रेगिस्तानों को फिर से गुलज़ार न कर तू |

दिये उम्मीदों के जो जलते वो भी बुझ गए ,

उन्हें जिलाने की कोशिश बेकार न कर तू ||

 

सरहद मेरे मन की बस अब पार न कर तू

 

तेरे साये की खुशबु से तन मन डोले ,

बेसुध होने को फिर से बेकरार न कर तू |

भूल सकूँ में तुझको ये तो नामुमकिन है ,

मेरी कसमों पर चाहे ऐतबार न कर तू ||

 

सरहद मेरे मन की बस अब पार न कर तू

 

न सतही न ही उथला है रिश्ता अपना ,

दुनियां जाने पर इसका इज़हार न कर तू |

इश्क मुश्क न छुपा कभी न छुप पायेगा ,

ज़िक्र ज़माने को यूँ ही हर बार न कर तू | 

सरहद मेरे मन की बस अब पार न कर तू

 

न जीने से प्यार न मरने का डर है अब ,

जिंदा हूँ इस भ्रम पे कुछ तकरार न कर तू |

मन की दहक को दबे दबे ही मिट जाने दे ,

फिर से उसे जगाने का इसरार न कर तू ||

 

सरहद मेरे मन की बस अब पार न कर तू

 

चल रब की मर्जी की गंगा में बह जाएँ ,

बात बात पे यूँ ही हाहाकार न कर तू |

खोल पोटली किस्मत की अब खुशियां ढूंढें ,

तकदीरें जो बख्शें अस्वीकार न कर तू ||

 

सरहद मेरे मन की बस अब पार न कर तू

सरहद मेरे मन की बस अब पार न कर तू

 

         ✍️ ༄ चन्द्र मोहन कत्याल ༄ कवि • लेखक

     #chandramohankatyal, #HindiPoetry,

#हिंदीकविता 

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