बरसों बीते छत पे सोये

आधुनिकता और तेजी से बदलते समय की अनवरत चाल ने हमारी ज़िंदगी में क्या कुछ बदल दिया … इस एहसास को अपनी कुछ मौलिक स्वरचित पंक्तियों के माध्यम से साझा कर रहा हूँ

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chandra mohan katyal
chandra mohan katyal 04 Sep, 2026 | 1 min read
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#chandramohankatyal, #HindiPoetry, #हिंदीकविता

आधुनिकता और तेजी से बदलते समय की अनवरत चाल ने हमारी

ज़िंदगी में क्या कुछ बदल दिया … इस एहसास को अपनीकुछ

मौलिक स्वरचित पंक्तियों के माध्यम से साझा कर रहा हूँ

***

 

बरसों बीते छत पे सोये,

तारों से मुलाक़ात के होय |

तड़क भड़क के जीवन में हम,

सब जन रहते खोये खोये ||

 

बरसों बीते छत पे सोये

 

अनुज मिलें अब हाय हेलो से,

पैरी पौना करे न कोय |

बोलचाल हो गई विदेशी,

राम राम भी करे न कोय ||

 

बरसों बीते छत पे सोये

 

अपने बेगाने से हो गए,

मिलना जुलना कैसे होय |

रिश्तों की परिभाषा बदली,

प्रेम की माला कौन पिरोय ||

 

बरसों बीते छत पे सोये

बरसों बीते छत पे सोये,

 

✍️༄ चन्द्र मोहन कत्याल ༄ कवि • लेखक

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