आधुनिकता और तेजी से बदलते समय की अनवरत चाल ने हमारी
ज़िंदगी में क्या कुछ बदल दिया … इस एहसास को अपनीकुछ
मौलिक स्वरचित पंक्तियों के माध्यम से साझा कर रहा हूँ
***
बरसों बीते छत पे सोये,
तारों से मुलाक़ात के होय |
तड़क भड़क के जीवन में हम,
सब जन रहते खोये खोये ||
बरसों बीते छत पे सोये
अनुज मिलें अब हाय हेलो से,
पैरी पौना करे न कोय |
बोलचाल हो गई विदेशी,
राम राम भी करे न कोय ||
बरसों बीते छत पे सोये
अपने बेगाने से हो गए,
मिलना जुलना कैसे होय |
रिश्तों की परिभाषा बदली,
प्रेम की माला कौन पिरोय ||
बरसों बीते छत पे सोये
बरसों बीते छत पे सोये,
✍️༄ चन्द्र मोहन कत्याल ༄ कवि • लेखक
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