एहसास स्मृतियां और वर्तमान

कभी कभी हम अतीत के सहारे ही वर्तमान में लौटते हैं।

Sonnu Lamba
03 Oct, 2026 • 1 min read • hi
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एहसास स्मृतियां और वर्तमान

हरसिंगार झरा तो याद आया कि अक्टूबर आने वाला है, संयोग से, वो पहली तारीख थी अक्टूबर की। ऐसा भी क्या कि अब समय और तारीख का भान नहीं रहता। हर जगह तो लिखी है तारीखें मोबाइल पर, डाक्टर के पर्चे पर..

तो कैसे कह दें कि याद ही नहीं थी। याद का क्या है याद तो वे तारीखें भी है जो अब आयेगी नहीं उनसे जुड़ी स्मृतियां हैं जिनसे, कोशिकाओं की मेमोरी भरी हुई है।

वर्तमान में जब भी तंद्रा टूटने के साथ कुछ याद आता है वो अतीत का कोई एहसास होता है, सुखद एहसास.. जैसे हरसिंगार के फूलों से भरी ठंडी सुबह, पूरब में सूरज के आने से पहले का धुंधलका और तुलसी अदरक की चाय ...बस इतना सा सूकून ही तो है अपना। फिर ये तो रोज़ ही घटता है ना..

इसे लेने किसी सुपर मार्केट तो नहीं जाना होता।

सच है.. लेकिन हर सुबह ऐसे ही शुरू हो जरूरी नहीं, वो भी पिछली रात पर निर्भर है। पिछली रात आप कितने सूकून से सोये थे, कोई ऐसी दवा तो नहीं दे दी आपके डाक्टर ने जो आपको बिना अलार्म के उठने नहीं देती। चिकित्सा भी कितनी निराली होती है ना किसी भी तरह के दर्द को हील करने के लिए, मेडिसिन में कुछ ऐसा मिला दिया जाता है कि इंसान सो जाए। नींद भी कितनी जरूरी शय है कुछ समय के लिए सब भुला देती है, इसलिए ये जरूरी भी है। और दर्द भी कितने निराले होते हैं पहले वो मन से सेंध लगाते हैं फिर शरीर को सताते हैं।

खैर...यही जीवन है, समय का बोध के लिए

घड़ी जरूरी भी नहीं, मौसमों के बदलने के सभी एहसास हमारी स्मृतियों में जिवित रहते हैं। आती सर्दियां, जाती गर्मियां और बरसातें सबकी अलग-अलग बातें, खुशबुओं की तरह क़ैद हैं, मनों में।

जो बिना किसी अलार्म, बिना किसी रिमाइंडर हमें कुछ कह जाती हैं और इस तरह हम अतीत के सहारे भी वर्तमान में लौटते हैं। एक ऐसे वर्तमान में जो यांत्रिक हो चला है। लेकिन शुक्र है कि स्क्रीन पर हरसिंगार आए तो हमें उनकी खुशबू आती है, स्क्रीन पर मंदिर की घंटी बजे तो हमें प्रार्थना याद आती है क्योंकि ये वो एहसास है जो हमारी कोशिकाओं की स्मृतियों में हैं जो हमने बिना मोबाइल के हासिल किये हैं।

अब देखिए ना..

ये सब पढ़ते हुए कितने ही एहसास आपके मन में भी उतर आए होंगे। हरसिंगार की तरह...या फिर किसी दबी टीस की तरह। कोई नहीं.. रहिये थोड़ी देर अपने एहसासों के साथ। क्योंकि वर्तमान में लौटने के बहुत से साधन है, फोन की घंटी, नोटिफिकेशन, दरवाजे की बेल, कोई दूधवाला, अखबार वाला, सब्जी वाला, बस आती ही होगी कोई कॉल।

~ सोनू लांबा 🪷

#सुबह #हरसिंगार #स्मृतियां #अक्टूबर

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