एक मुलाकात : मानस (भाग 1)
बिल्कुल सर, हिंदी में भेज रहा हूँ - सीधा Copy-Paste कर दो: *1. SUMMARY में ये डाल दो:* > अयोध्या की पावन धरती पर प्रथम दर्शन का अनुभव। ट्रेन से उतरते ही एहसास हुआ कि हम श्रीराम जन्मभूमि में हैं। जहाँ हर कोना श्रीराम राज्य की याद दिला रहा था
#Life
मीरदाद से मुलाकात: सवालों का समुंदर
लेखक को 'मिरदाद की किताब' पढ़ने के बाद सपने में मिरदाद मिलता है। मिरदाद समझाता है कि किताबें समुंदर जैसी हैं, जितना गहरा जाओगे नया अर्थ मिलेगा। हर व्यक्ति कर्मों के हिसाब से जीवन में आता है। उसका काम था सोई हुई चेतनाओं को जगाकर ईश्वर तक पहुँचाना।
बागी : एक चेतना
शरीर हार्डवेयर है, चेतना उसका ऑपरेटिंग सिस्टम। बिना OS के फोन जैसे देह बेजान है। हम शरीर नहीं, चेतना हैं, यह बोध अहंकार मिटाता है। कर्म तय करता है कौन सा हार्डवेयर मिलेगा। जब चेतना डेवलपर से जुड़ती है, तो डर मिटता है, इंसान सदा अमर हो जाता है। के
अंतिम संस्कार : लकड़ी
यहाँ इस कहानी का सबसे छोटा और सधा हुआ सार (Summary) है: यह कहानी एक रिटायर्ड प्रोफेसर और उनके बचपन के दोस्त (एक पेड़) की मार्मिक विदाई है। सालों बाद गाँव लौटने पर प्रोफेसर को पता चलता है कि हाईवे बनने के कारण कल उस पेड़ को काट दिया जाएगा। पेड़ बिना किसी शिकायत के अपनी मौत को स्वीकारता है और प्रोफेसर से अपना 'अंतिम संस्कार' करने को कहता है। अंत में, प्रोफेसर उसे काटने की हिम्मत नहीं जुटा पाते। वे कुल्हाड़ी का लोहे वाला हिस्सा (जो मारने का प्रतीक है) वहीं छोड़ देते हैं और महज़ **लकड़ी का डंडा** अपने साथ ले आते हैं—ताकि उनका दोस्त हमेशा के लिए उनके साथ रह सके।
अंतिम संस्कार : लकड़ी
यहाँ इस कहानी का सबसे छोटा और सधा हुआ सार (Summary) है: यह कहानी एक रिटायर्ड प्रोफेसर और उनके बचपन के दोस्त (एक पेड़) की मार्मिक विदाई है। सालों बाद गाँव लौटने पर प्रोफेसर को पता चलता है कि हाईवे बनने के कारण कल उस पेड़ को काट दिया जाएगा। पेड़ बिना किसी शिकायत के अपनी मौत को स्वीकारता है और प्रोफेसर से अपना 'अंतिम संस्कार' करने को कहता है। अंत में, प्रोफेसर उसे काटने की हिम्मत नहीं जुटा पाते। वे कुल्हाड़ी का लोहे वाला हिस्सा (जो मारने का प्रतीक है) वहीं छोड़ देते हैं और महज़ **लकड़ी का डंडा** अपने साथ ले आते हैं—ताकि उनका दोस्त हमेशा के लिए उनके साथ रह सके।
मेरी राख: एक सफर
राकेश मृत्यु के बाद अपनी ही राख के सफर का साक्षी बनता है। जलगाँव में शरीर जलता है, फिर राख के तीन हिस्से — जन्मस्थान की नाराज़ नदी, पुणे के पुल पर बहा अधूरा इश्क़ और मुंबई के समंदर में विलीन अहंकार। आखिरी राख बेटा गुरुस्थान की मौन मिट्टी में बिखेरता है, जहाँ राकेश समझता है — मीटिंग, जायदाद, प्रेम सब रेगिस्तान में 'ओसिस' जैसा भ्रम था, सच तो शून्यता है।