एक मुलाकात : मानस (भाग 1)
बिल्कुल सर, हिंदी में भेज रहा हूँ - सीधा Copy-Paste कर दो: *1. SUMMARY में ये डाल दो:* > अयोध्या की पावन धरती पर प्रथम दर्शन का अनुभव। ट्रेन से उतरते ही एहसास हुआ कि हम श्रीराम जन्मभूमि में हैं। जहाँ हर कोना श्रीराम राज्य की याद दिला रहा था
श्री राम जी कहानी
बड़ी इच्छा थी, श्रीरामलला के दर्शन करूँ। ट्रेन से उतरते ही अयोध्या में कदम रखा। सुबह होने में वक्त था, इसलिए पहले से बुक कमरे में चला गया।
आराम करके दस बजे दर्शन के लिए निकला। रास्ते भर अयोध्या की विशालता आंखों में भरता रहा। हर प्रतिमा, हर कोना याद दिला रहा था हम श्रीराम जन्मभूमि में हैं। लगा सच में श्रीरामराज्य आ गया है।
लंबी कतार के बाद एक पल ऐसा आया जब स्वयं को श्रीराम जी के सम्मुख पाया। आंखें सजल हो उठीं। कुछ कहा नहीं, बस देखता रहा।
शाम को सरयू घाट की ओर चल पड़ा। हरिद्वार की तरह यहाँ भी शाम को नदी किनारे सुकून मिलता है। सोचा था तीन दिन हूँ, हर शाम किसी अजनबी से मिलकर श्रीराम के बारे में बात करूँगा।
घाट पर भीड़ कम थी। लोग छोटे ग्रुप में बैठे थे, कुछ भजन गा रहे थे। मैं शोर से दूर जाकर बैठ गया। थोड़ी दूर एक बाबा पोथी के सामने भजन गा रहे थे।
मैं पास गया, बोला - बाबा जी, राम राम।
उन्होंने कहा - राम राम।
बैठने की इजाजत ली तो मुस्कुराकर हामी भरी। पूछा कहां से आए हो, मैंने परिचय दिया।
आप यहीं से हो?
बोले - पास के गांव से आता हूँ, दो-चार दिन यहीं रहता हूँ, फिर लौट जाता हूँ। गांव में मन नहीं लगता। पत्नी कहती है श्रीराम का भजन करो।
परिवार?
बोले - पत्नी है, बच्चे नहीं।
काम?
बोले - जवान था तब करता था, अब हम श्रीराम को भजते हैं, बाकी श्रीराम जी जानें।
मैंने बात शुरू की - मंदिर बनने में काफी दिन लग गए न?
मुस्कुराए और बोले - जो श्रीराम को नहीं जान पाए, वे विवाद करते हैं और करते रहेंगे।
मैंने अचरज से देखा - मतलब?
इशारा करके बोले - वहाँ देखो।
एक महिला नदी में पूजा कर दिया विसर्जित कर रही थी।
बोले - वह दिया किस धर्म का है?
अगर वही दिया तुम्हारे घर रख दूँ तो क्या तुम्हारे धर्म का हो जाएगा? और दूसरे धर्म वाले के घर रखूँ तो क्या उसका प्रकाश बदल जाएगा?
मैंने ना में सिर हिलाया।
तब बोले - श्रीराम वही दिया हैं, जो सबको प्रकाश देता है। श्रीराम सबके हैं। अनंत ब्रह्मांड बनाने वाले को हम जात-पात, धर्म की चार दीवारों में कैसे बंद कर सकते हैं?
हजारों ग्रह अपनी कक्षा में घूम रहे हैं, उनमें एक छोटा ग्रह है पृथ्वी। पूरे ब्रह्मांड के स्वामी मेरे भक्त-वत्सल श्रीराम हैं, उन्हें हम तुच्छ बुद्धि से कैसे समझें?
फिर मेरी ओर देखकर बोले — क्या करते हो?
मैंने कहा — अध्यापक हूँ।
वे बोले — तुम्हारी कक्षा में भी अलग-अलग जाति के छात्र होंगे। क्या तुम उन्हें शिक्षा देने में भेदभाव करते हो?
मैंने ना में सिर हिलाया।
वे मुस्कुराकर बोले — बस, श्रीराम भी वही प्रकाश देने वाला दिया हैं, जिसका प्रकाश सबके लिए है। हर धर्म के लिए है।
तभी आरती की सूचना हुई। वे उठकर चलने लगे और बोले — मेरे प्रभु की आरती का समय हो गया है।
मैंने कहा — बाबा, आपसे बात करके बड़ी शांति मिली। कल यहीं मिलोगे?
उन्होंने मुस्कुराकर कहा — श्रीराम जी की इच्छा, देखते हैं कल।
और वह उठकर मंदिर की ओर चल दिए।
मैं वही घाट पर बैठा रहा , सरयू बह रही थी ,मेरे मन में एक दिया जल रहा था जो सबके लिए है
दूसरे दिन थोड़ा जल्दी घाट पर पहुँच गया। दूर से बाबा को पहचान लिया, पास जाकर बैठ गया।
उन्होंने हँसकर देखा — आ गए भाई?
मैंने हाँ में सिर हिलाया।
मैंने पूछा — बाबा, आप कल कह रहे थे श्रीराम प्रकाश हैं, अनंत ब्रह्मांड को चलाने वाले हैं, तो उन्हें गुरु की जरूरत क्यों पड़ी? और जीवन में इतने कष्ट क्यों?
बाबा हँस पड़े। बोले — तुम्हारा स्कूल सरकारी है या प्राइवेट?
मैंने कहा — प्राइवेट।
बोले — कल को संचालक का बेटा कहे, बिना कक्षा बैठे, बिना परीक्षा दिए फाइनल डिग्री दे दो, तो?
मैंने कहा — ये कैसे होगा? कक्षा में बैठना पड़ेगा, परीक्षा पास करनी होगी।
उन्होंने कहा — पर स्कूल तो संचालक का ही है?
मैंने कहा — संचालक का पुत्र होने से क्या? एक-एक कक्षा पास करेगा तभी बुद्धि आकार लेगी, जानकारी मिलेगी, तभी जीवन में मजबूत बनेगा। स्कूल के नियम होते हैं।
वो बोले — ये धरती भी एक स्कूल है। जब संचालक यहाँ जन्म लेगा, तो उसे भी धरा के नियम मानने होंगे। यही नियम श्रीराम पर भी लागू है। वे जन्म लेंगे तो गुरु के सानिध्य में शिक्षा लेंगे।
और जब वे गुरुकुल में थे, तब भी उन्होंने कई राक्षसों का अंत कर ऋषि-मुनियों को दुख और भय से मुक्त किया।
कक्षा-दर-कक्षा बढ़ते ही डिग्री मिलती है। श्रीराम को कष्ट मिले, बनवास मिला, तभी वे युवराज राम से मर्यादा पुरुषोत्तम बने। यही डिग्री उन्हें प्राप्त हुई।
मैंने दूसरा सवाल किया — बनवास में माता सीता के हरण बाद प्रभु पेड़-पत्तों से, पंछियों से उनका पता पूछते, बहुत दुखी होते, ऐसा क्यों? क्या उन्हें पता नहीं था कौन हर ले गया?
उन्होंने पूछा — सिनेमा देखते हो? मैंने हाँ कहा।
बोले — दो राजाओं में युद्ध में कई सैनिक मरते दिखाते हैं, क्या सच में मरते हैं?
मैंने कहा — नहीं, अभिनय करते हैं ताकि दृश्य जीवंत लगे।
बोले — श्रीराम को भी पता था कि माता सीता को कौन हर ले गया, पर उन्होंने अपनी भूमिका को इतना जीवंत किया कि आज भी रामायण में जब सीता हरण के बाद का प्रसंग आता है, जब श्रीराम व्याकुल होकर माता को ढूंढते हैं, तो हर व्यक्ति दुखी हो जाता है। फिर वीर जटायू को भी तो अपना अभिनय करना था।
देखो, श्रीराम ने हर अभिनय उत्तम निभाया — आज्ञाकारी पुत्र का, जिम्मेदार भाई का, सुग्रीव के मित्र का, या सीता के दुखी पति का। हर रिश्ता निभाया, तभी मर्यादा पुरुषोत्तम कहलाए।
आज प्रेमी बिछड़ने पर जीवन समाप्त कर देते हैं, तो अगर उन्होंने बिछड़े पति की भूमिका अक्षरशः जीवन में उतारी है, तो अचरज कैसा? जब राघव ने यह अभिनय किया, तभी तो आगे हनुमान, सुग्रीव, अंगद मिले और रावण का अंत हुआ।
मैंने कहा, "बाबा, आपको तो सब पता है, आपके गुरु कौन हैं?"
उन्होंने मुस्कुराहट के साथ जवाब दिया, "मेरा गुरु मेरी पत्नी है।"
मैंने अचरज भरी निगाहों से उन्हें देखा।
वे बोले, "मेरा बहुत मोह था पत्नी में... पूर्ण आसक्ति। फिर एक दिन पत्नी ने ही कुछ ऐसा कह दिया कि मैं श्री राम जी की तरफ मुड़ गया।"
तभी आरती की सूचना हुई।
वे उठकर चल दिए, बोले - "मेरे प्रभु की आरती का वक्त हो गया है।"
मैंने पीछे से जोर से कहा - "मैं कल फिर आऊंगा!"
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