Aman G Mishra
Aman G Mishra 24 Aug, 2019 | 0 mins read

जन्माष्टमी

वेदों और उपनिषदों की व्याख्या करना बड़ा मुश्किल है, और संसारी जीवों को तो उसका अर्थ भी नहीं उतरता। इसलिए वेद जिनकी सांसें हैं, उन्ही श्रीभगवान ने आविर्भूत होकर गीता कर प्रचारक के रूप में श्रुति का अर्थ समझाया, और आश्चर्य यह कि इसे उपनिषदों और वेदों का निचोड़ माना गया। यहां आदि शंकराचार्य को अद्वैत मर दिखता है तो श्रीरामानुजाचार्य को विशिष्ट अद्वैत तो श्रीमध्व आचार्य को द्वैत दिखता है। सभी मत और सम्प्रदाय यहां आकर अपनी पूर्णता को प्राप्त हो जाते हैं। श्रीभगवान जब कहते हैं कि तुम हर मार्ग से मेरी ही आराधना करते हो, तो मन से सभी संशय और भय समाप्त हो जाते हैं। श्रीभगवान कहते हैं कि यह सारा जगत मुझमे वैसे ही गूंथा है जैसे धागे में मणि रहती है, क्योंकि मुझसे अलग तो कुछ है ही नहीं, तो सारी संकीर्णता और भेदभाव की दीवार गिर जाती है। गीता के वाक्य, श्रीकृष्ण की वज्र के समान गंभीर और महती वानीसब के बंधन तोड़ देती है और सभी को परम् पद का अधिकारी बना देती है। पलायन तो उनके शब्दकोश में नहीं था। कर्मयोगियों में सर्वश्रेष्ठ भगवान श्रीकृष्ण ने स्वयं अपने उपदेशों को जिया, और कहा कि कर्म किए बिना कोई नहीं रह सकता, कर्म करो लेकिन उसका विज्ञान समझो, कर्म जम के करो लेकिन फल की चिंता न करो, उलझ मत जाओ, कर्म का एकमात्र उद्देश्य है आत्मशुद्धि, इसलिए चिंता न करो, श्रीभगवान की शरण मे आ जाओ और वह तुम्हे सभी पापों से मुक्त कर देंगे। जिन्हें राजसूय यज्ञ में मेहमानों के जूते साफ करने में भी आनंद आता है, और अपने भक्त का रथ हांकने में भी, जिन्हें मिट्टी खाने में मजा आता गई और गरीब सुदामा के सूखे चावल भी, ऐसे महानतम श्रेष्ठतम प्रियतम अद्भुत आश्चर्य और विरोधाभास से भरे हुए साकार और निराकार से परे श्रीकृष्ण ही मेरी गति हों, मेरे आश्रय हो, और मैं अनन्तकाल तक उनका दास रहूं। जहां जहां जाऊं करूं तेरी सेवा तुम सम ठाकुर और न देवा।।

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Aman G Mishra 24 Aug, 2019 | 1 min read

ग़ज़ल

जाते जाते वो अपनी तस्वीर दे गए, हँसती हुई मेरी आँखों में नीर दे गए। देखती रही अपने हाथों को चुपचाप, हाथों में वो जुदाई की लकीर दे गए। मन में एक कसक रहेगी ता-उम्र अब, जिंदगी भर कम ना हो ऐसी पीर दे गए। मोहब्बत का मेरी मजाक बना गये वो, बेवफाई का इल्जाम वो मेरे सिर दे गए। दोष किसको दूँ उनको या हालात को, जाते हुए मुझे ख़िताब ऐ फकीर दे गए। मेरी मोहब्बत ही इतनी गरीब निकली, कौड़ियों के भाव गैरों को ज़मीर दे गए। आगाह कर सके "सुलक्षणा" औरों को, इसीलिये वो कलम ऐ शमशीर दे गए। ©® डॉ सुलक्षणा अहलावत

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Aman G Mishra 24 Aug, 2019 | 0 mins read

ग़ज़ल

बैठा है अपने दिल में छुपाकर राज कोई। बंद लबों से दे रहा है मुझे आवाज कोई। अपनी आँखों से हाल ऐ दिल बयाँ करके, निभा रहा है मोहब्बत का रिवाज कोई। दिल गुनगुना बैठा तराना ऐ मोहब्बत, दे गया चुपके से मोहब्बत का साज कोई। दिल धड़काया नज़रों से नजरें मिला कर, ऐसे कर गया मोहब्बत का आगाज कोई। अजीब सी हालत हो गयी मोहब्बत में, ना जाने कैसे होगा इसका इलाज कोई। दिन रात ख्यालों में खोई रहती हूँ मैं, खुद से भी प्यारा लगने लगा आज कोई। जिस दिल पर लाखों पहरे बिठा रखे थे, आज उस दिल का बन गया सरताज कोई। बस एक ही दुआ है मुझे मिल जाए वो, नहीं चाहिएँ मुझे तख़्त ओ ताज कोई। उसकी मोहब्बत के साये में बीते जिंदगी, सच कहने में रखती नहीं हूँ लिहाज कोई।

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Aman G Mishra 24 Aug, 2019 | 1 min read

ठाकुर जी

ठाकुर जी

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Aman G Mishra 24 Aug, 2019 | 1 min read

भगवान् श्री कृष्ण

जुगलकिशोर ठाकुर जी महाराज

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Aman G Mishra
Aman G Mishra 24 Aug, 2019 | 2 mins read

Happy Janmashtami

No one remembers the girl baby born on the same day who was interchanged with Krishna, a boy baby, to save his life. The boy's life was precious but the girl was born to sacrifice her life. Today is not only the birthday of Krishna but also of Yogamaya. It is said that Yogmaya flew off to Heavens freeing herself from the clutches of Kansa while announcing to Kansa that your killer has been born. Scriptures do not clearly mention that she too got killed like other siblings of Krishna. However more knowledgeable are requested to throw light on it. Yogmaya was also an incarnation of Shakti who came to be born along with the incarnation of Lord Vishnu to keep some old promise. When Kansa caught her by her feet and hurled her to the ground, she flew towards the heaven, saying “Kansa, your killer has already taken birth. I could have also killed you but since you caught me by my feet, I take it as your expression of humility and am pardoning you”. *Krishna* was born in the darkness of the night, into the locked confines of a jail. However, at the moment of his birth, all the guards fell asleep, the chains were broken and the barred doors gently opened. Similarly, as soon as *Krishna* ( Chetna, Awareness ) takes birth in our hearts, all darkness ( Negativity ) fades. All chains ( Ego, I, Me, Myself ) are broken. And all prison doors we keep ourselves in ( Caste, Religion, Profession, Relations etc ) are opened. And that is the real Message And Essence of Janmashtmi. Happy Krishna Janmashtami !

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Aman G Mishra
Aman G Mishra 24 Aug, 2019 | 1 min read

वीर सावरकर

कांग्रेस की छात्र विंग एनएसयूआई के कार्यकर्ता दिल्ली विश्वविद्यालय में जाकर वीर सावरकर की प्रतिमा पर कालिख पोत रहे हैं लेकिन कोई कुछ नहीं बोल रहा। वह सावरकर, जिन्हें दोहरे आजीवन कारावास की सजा हुई, पर कांग्रेस उन्हें वीर नहीं मानती। उनके खिलाफ सुनियोजित तरीके से षड्यंत्र कर उनके विचारों को सांप्रदायिक बताया जाता है हमें सावरकर के कार्यों और उनके आदर्शों को छत्रपति शिवाजी और चाणक्य की कार्यविधियों से तोलना होगा, न कि गांधी जी के साथ। सावरकर के खिलाफ वामपंथियों और इस्लामी ताकतों ने दुष्प्रचार किया है और अभी भी कर रहे हैं। अपने 37 वर्ष के लंबे कार्यकाल में, जिस दौरान उन्होंने भारत की नियति को बदला और हिंदवी स्वराज की नींव रखी, छत्रपति शिवाजी ने औरंगजेब को चार माफीनामे भेजे थे। इनमें से तीन माफीनामे उनके और मुगलों के बीच लिखित संधियों के बाद के थे। लेकिन इन सभी संधियों को स्वयं शिवाजी ने तोड़ा था, क्योंकि यह उनकी स्वतंत्र हिंदू राज्य स्थापित करने और सबको समान अधिकार देने की दीर्घकालिक नीति का हिस्सा था। विनायक दामोदर सावरकर शिवाजी के अनुयायी थे। वे गांधी जी के विशुद्ध अहिंसा के सिद्धांत में विश्वास नहीं रखते थे। जैसे शिवाजी 1666 में आगरा से मिठाइयों के टोकरे में छुपकर मुगल कैद से फरार हुए थे, उसी से प्रेरणा लेकर सावरकर ने भी 1910 में मोरिया नामक एक स्टीमर से पलायन किया था, जिस पर उन्हें लंदन में ब्रिटिश विरोधी गतिविधियों को बढ़ावा देने और मदन लाल ढींगरा द्वारा ब्रिटिश अफसर की हत्या के षड्यंत्र में शामिल होने के आरोप में ले जाया जा रहा था। उन्हें 60 वर्ष की कड़ी सजा मिली थी। जैसे ही स्टीमर मार्से के फ्रांसीसी तट के निकट पहुंचा, सावरकर ने उस पर मौजूद एक छिद्र में से निकल कर समुद्र में छलांग लगा दी और तैर कर किनारे पहुंचे। वहां मौजूद फ्रांसीसी अधिकारियों ने सोचा कि वे ब्रिटिश बंधक हैं, इसलिए उन्हें पकड़ कर स्टीमर के किनारे पहुंचते ही ब्रिटिश अधिकारियों के हवाले कर दिया। इसलिए जब हम सावरकर की माफी का आकलन करते हैं, तब हमें सही नतीजे पर पहुंचने के लिए शिवाजी की युक्तियों के बारे में सोचना पड़ता है, न कि गांधीवादी नीतियों पर। और ऐसा करने पर हमें पता चलता है कि उनका माफीनामा खुद को जेल से बाहर रखने की नीति से जुड़ा था, ताकि वे अपनी राष्ट्रीय-दृष्टि को आगे ले जा सकें। इस जोरदार और तार्किक दलील की बुनियाद अपने आप में बहुत पुख्ता है। 1913 में एक वरिष्ठ ब्रिटिश अधिकारी रेगिनल्ड क्रेडक सेल्युलर जेल में कैदियों द्वारा विरोध प्रदर्शन के बाद वहां की हालत देखने आए और जाते हुए जेल कर्मचारी को गोपनीय हिदायत देकर गए। उन्होंने कहा अन्य कुछ कैदियों की तरह सावरकर को जेल से बाहर समुद्र किनारे टहलने की इजाजत न दी जाए, क्योंकि यदि ऐसा होता है तो पहला मौका मिलते ही सावरकर वहां से फरार हो जाएंगे। क्रेडक ने कहा कि संभव है सावरकर को वहां से निकालने के लिए उनके कुछ साथी समुद्री जहाज भी लेकर आ सकते हैं। यह प्रकरण बताता है कि अंग्रेज सरकार क्रांतिकारी सावरकर से कितनी खौफजदा थी। वामपंथियों और छद्मवादियों ने सावरकर को बदनाम करने की एक और चाल चली। उन्होंने भगत सिंह को वामपंथी विचारधारा वाले व्यक्ति के तौर पर सामने रखा और कहा कि कैसे वे खुशी-खुशी फांसी चढ़ गए थे। इसके विपरीत, कैसे सावरकर ने अपनी रिहाई के लिए अंग्रेजों से माफी मांगी थी। सच यह है कि भगत सिंह का समूचा परिवार स्वामी दयानंद सरस्वती और आर्य समाज आंदोलन से प्रभावित रहा था। भगत सिंह ने लाहौर में दयानंद सरस्वती विद्यालय में शिक्षा प्राप्त की थी। एक प्रदर्शन के दौरान जब ब्रिटिश लाठियों के हमलों से लाला लाजपत राय की मौत हुई, तब भगत सिंह ने अंग्रेजों से बदला लेने की सौगंध ली थी। लाला लाजपत राय भी आर्य समाज के अनुयायी थे। वहीं, भगत सिंह के कई साथी भी आर्य समाज से जुड़े हुए थे। अगर वामपंथी यह दावा करते हैं कि भगत सिंह ने एक कम्युनिस्ट पुस्तक का गुरमुखी में अनुवाद किया था, तो इस बात के भी प्रमाण हैं कि उन्होंने सावरकर के ग्रंथ "माई ट्रांसपोर्टेशन फॉर लाइफ" का भी अनुवाद किया था। इस पुस्तक में सावरकर के कठोर कारागार के दिनों की दास्तान है। भगत सिंह द्वारा लिखी पुस्तक "मैं नास्तिक क्यों हूं" एक वामपंथी इतिहासकार द्वारा लिखी गई है, जिसमें विचारधारा को आधार बनाते हुए तथ्यों से खिलवाड़ किया गया है। इसलिए कई लोगों का मानना है कि यह वामपंथी चाल है, क्योंकि पुस्तक भगत सिंह के फांसी चढ़ने के फौरन नहीं, कुछ वर्षों के बाद आई थी।

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Aman G Mishra
Aman G Mishra 22 Aug, 2019 | 1 min read

पुरुषोत्तमः

श्री राम :एक आदर्श राम को आदर्श मानने और होने में आस्था और प्रासंगिकता में हमेशा से ही मतभेद रहे हैं। परंतु क्या श्री राम का चरित्र इन मतभेदों या अपना अपना मत रखने वाले लोगो की परिभाषा का मोहराज नही है। बल्कि ये पंडितों को अपना मत रखते समय श्री राम के आदर्शों को ध्यान में रखें,तो इनके पंडित्व में थोड़ा बहुत आदर्शवाद की वृद्धि की सम्भावना रहेगी। क्योकि चाहे तुलसी और बाल्मीकी की लिखे ग्रन्थ में देखें या हिन्दू धर्म के आदर्श के रूप में देखें, श्री राम आदर्श ही रहेंगे। एक आदर्श पुत्र, आदर्श पति, आदर्श पिता, आदर्श भाई ,इन सबसे अहम है आदर्श राजा। ये सभी आदर्श ही श्री राम को आदर्श पुरुष , मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम बनाते हैं। यहाँ बात हिन्दू धर्म की नही है कोई भी धर्म हो, बेटा अगर राम जैसा हो, भाई अगर राम जैसा हो,पिता अगर राम जैसा हो, पति अगर राम जैसा हो, तो धरती स्वतः ही स्वर्ग बन जायेगी। -अमन मिश्र

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Aman G Mishra
Aman G Mishra 22 Aug, 2019 | 1 min read

खोज

हम हर पल तलाश क्यों करते रहते हैं! कभी दूसरों में खुद की तो कभी खुद में दूसरों की। यही वजह है कि हम किसी की कला से इतना प्रभावित होते हैं कि हम उसे जीने लगते हैं,फिर जब हम उस कला के असली दांव-पेंच से गुजरते हैं तो फिर समय की बर्बादी के अलावा हमारे हाँथ कुछ नही लगता। तो करना क्या चाहिए? यही सवाल बार बार उठता है क्यों कि इस तरह से कई लोगों की पूरी ज़िंदगी खोजने में ही निकल जाती है। यदि आपमें वो कला है,या आपको तलाश है उस कला की जो किसी व्यक्ति में है,आप् कॉपी करना बंद करें,उस कला के असली दांव-पेंचों से गुजरे, कुछ समय दें;फिर अपना अवलोकन करें। आपको खुद में न तो किसी और की तलाश करने से सफलता मिलेगी। और न ही किसी और में खुद को ढूढने से, आप् सफल होंगे जब आप खुद में खुद को ढूढ़ पाएंगे। आपको स्वयं से मिलने पर असंख्य शुभकामाएं! -अमन मिश्र

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Aman G Mishra
Aman G Mishra 19 Aug, 2019 | 1 min read

पुण्य की कमाई

पुण्य की कमाई

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