कहाँ गए वो दिन
वो मिट्टी, वो मैदान, वो बेफ़िक्र शामें,
हर खेल में छुपी थीं खुशियों की राहें।
न कोई जल्दबाज़ी, न कोई फ़ासला,
बस साथ था अपनों का, और हँसी का सिलसिला।
आज यादों में ही बसता है वो ज़माना,
काश… फिर लौट आए हमारा बचपन सुहाना।
Paperwiff
by saritachawla