अनासक्ति
जब “क्यों” और “कब”के सवाल मिट जाते हैं,
और सिर्फ़ “जो है”वही स्वीकार हो जाता है ,
जहाँ “मेरा” ख़त्म हो जाता है ,
वहीं से अनासक्ति शुरू हो जाती है ,
ना कुछ खोने का डर , ना अधिक पाने की चाह,
हर अनुभव को हल्के मन से जीना ,
यही तो है अनासक्ति की सच्ची राह ।
Paperwiff
by saritachawla