मेरे हिस्से का सफ़र
A reflective Hindi poem about shattered dreams, relentless effort, self-doubt, missed opportunities, and the emotional burden of life's struggles. It explores the conflict between destiny and determination while accepting personal flaws. Despite disappointment and repeated setbacks, the poem carries an honest voice of self-reflection rather than blame, making it a deeply personal journey through hope, failure, and resilience.
Photo by Sanket Deorukhkar on Unsplash
अगर मेरे सपनों का ऐसा ही अंज़ाम होना था,
लगन और मेहनत का यही परिणाम होना था,
फिर तो थक जाना चाहिए था मुझे, पहले ही,
बेवज़ह तो न कम से कम यूँ परेशान होना था,
जब बदल लेती है मंज़िल ही राह मुझे देखकर,
फ़िर न काँटों से चौंकना था, न हैरान होना था,
कैसे पहुँचें उस तक, जो भागती रहे आपसे ही,
हर विकर्षण को सफ़र के ही दरम्यान होना था,
गलतियाँ कम करता तो कोसता भी नसीब को,
उस वाक-युद्ध में भी मेरा ही नुकसान होना था,
अब जो हालात हैं मेरे छुपे नहीं रहे हैं जमाने से,
हालांकि मेरे किस्सों पर तो मेरा कमान होना था,
लगने लगी है ज़िन्दगी बोझ सी दिलो-दिमाग पर,
जबकि मेरी सोच में, लड़ने का अरमान होना था,
देखता हूँ अवसरों को सामने से आकर जाते हुए,
किसी लायक तो होना था, न कि महान होना था,
हर ठोकर के बाद, कुछ न कुछ छूटता गया मुझसे,
वरना पास लड़ने का, पूरा साजो समान होना था,
होती जो भनक भी कि इस खेल में खिलौना हूँ मैं,
न खेलता मैं “साकेत", न मेरा ये अंज़ाम होना था।
Comments
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खूबसूरत रचना और बहुत प्यारे सन्देश के साथ कि यह जरुरी नहीं कि आपकी लगन और मेहनत हमेशा आपको सुखद परिणाम दे | लेकिन हमारा प्रयास जारी रहना चाहिए |
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