एक परीक्षार्थी की व्यथा-कथा
A humorous Hindi poem titled “एक परीक्षार्थी की व्यथा-कथा” (The Ordeal of an Examinee), written from the perspective of a student sitting in an examination hall. It portrays the nervousness of facing an unfamiliar question paper, forgetting everything studied, struggling to write answers, watching the clock, worrying about unanswered questions, and fearing the results and parents’ reactions. Through witty expressions, relatable situations, and playful exaggeration, the poem captures the funny yet stressful experience of being an examinee.
Photo by Scott Graham on Unsplash
हाथ-पाँव हमारे अब काँप रहे हैं,
बैठे-बैठे यूँ ख़ाली पन्ने नाप रहे हैं,
एक शब्द लिखा कुछ जाता नहीं,
जवाब भी याद कोई आता नहीं,
पढ़ा-लिखा सब कुछ गुल हो गया,
दिमाग जैसे गोबर से फुल हो गया,
हालत अब, ऐसी गंभीर लग रही है,
नागिन पन्ने की हर लकीर लग रही है,
नाखूनों से अब मेज ही, खरोंच रहे हैं,
अपने ही हाथों, अपने बाल नोच रहे हैं,
ताका-झाँकी से तो कोई आस ही नहीं है,
अपनी भी बुद्धि तो अपने पास ही नहीं है,
हरेक सवाल, नया-सा क्यों लगने लगता है,
तुमसे न हो पायेगा, ऐसा सा कहने लगता है,
बार-बार आँखों के आगे, अंधेरा सा छाता है,
भविष्य छोड़ो, वर्तमान काला नजर आता है,
याद आ रहा है जो, पन्ने पर साफ जाता नहीं,
ख़ुद का लिखा, ख़ुद को भी समझ आता नहीं,
ये उँगलियाँ बिना मेहनत ही आराम माँग रही हैं,
आधे ही प्रश्नपत्र लिख, पूरे का दाम चाह रही हैं,
जैसे-जैसे हर घंटे पर घंटे की घंटी बजती जाती है,
कलम की रफ़्तार मंद, धड़कन की बढ़ती जाती है,
हर बार लगता है जैसे बहुत कुछ याद आने लगा है,
बेसुध याददाश्त में, चेतना सा कुछ सुगबुगाने लगा है,
मगर फिर जब कुछ ही पंक्तियाँ हम लिख चुके होते हैं,
गधे के सींग के जैसे यकायक फिर होश फाख़्ता होते हैं,
जवाबों का ब्रह्माण्ड सा उमड़ता है, वर्तमान में जगते ही,
हरेक घंटे पर बजने वाली, घंटे की तीसरी घंटी बजते ही,
मास्टर साहब जैसे ही उत्तर पुस्तिका जब लूटने लगते हैं,
आधे-आधे से लगने वाले, कई पूरे सवाल छूटने लगते हैं,
परीक्षा केंद्र से निकलते हुए भी, कई ख़्याल हमें डराते हैं,
हमें तोलती नज़रों से मुस्कुराके ही हम ख़ुद को बचाते हैं,
लौटते हुए घर को, अभिभावकों के सवाल भी तीखे होंगे,
वज्र से गिरेंगे हमारे सीने पर, या तो काँटों से सरीखे होंगे,
फिर महीनों ही परीक्षा फल के इंतज़ार में, सदियाँ काटेंगे,
हर मंदिर मत्था टेक, भगवान मन्नतें माँग-माँग के गुजारेंगे,
आशंकित मन की आशंकाओं से हर रोज ही लड़ना होगा,
ज़ार-ज़ार मरेंगे या फिर, किसी तरह से धीरज धरना होगा,
अब परीक्षा के परिणाम का सोच-सोच के हाथ पाँव काँपेगे,
मिलेगी शाबाशी, घर जाकर या पिताजी हमारी पीठ नापेंगे।
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