Quote on hard work

Quote

Akshat
26 Apr, 2020 • 1 min read min read • tl
❤️ 0 💬 0 👁 1478
Quote on hard work

Behind every happy face

There is a crying hard work

0 likes
☕

Support Akshat

Appreciate this story? Send a small tip to encourage the author to write more great work!

Please login to tip the author.

Akshat
Published By

Akshat

@DaShiNgAkShAt

Comments

Appreciate the author by telling what you feel about the post 💓

Please Login or Create a free account to comment.

★ Recommended For You

Stories tailored to your recent reading preferences

More stories in Fiction
Aarti Kushwah • 15 Sep, 2026 • 1 min read min

कितनी परतें हैं इस अनजाने मन की

हमारे मन में कभी-कभी इतना सब चलता रहता है कि हमारा अंतर्मन विचलित होने लगता है ।

51 0
More stories in Fiction
wayne travel log • 31 Dec, 2025 • 1 min read min

The goth gouls of horror

fun gothic tale of horror

309 0
More stories in Fiction
Adhiraj • 19 Oct, 2025 • 1 min read min

कविता : पर्वतों के पुत्र

साहसी संघर्ष में विचलित नहीं होते |

403 1
More stories in Fiction
fazal Esaf • 12 Jun, 2025 • 1 min read min

बिल के उस पार"

सफ़दर अली को लीवर संक्रमण के कारण आईसीयू में भर्ती हुए छह दिन हो चुके थे। उनकी पत्नी ज़ेबा, एक स्कूल टीचर, इलाज के ₹2,83,000 के भारी बिल को देखकर परेशान थी, क्योंकि डॉक्टरों ने अगले दिन तक आईसीयू का भुगतान करने या सफ़दर को जनरल वार्ड में शिफ़्ट करने के लिए कहा था। उसकी मासिक आय इस बिल का एक तिहाई भी नहीं थी। मदद के लिए, ज़ेबा ने सबसे पहले मस्जिद के इमाम साहब को फ़ोन किया, जिन्होंने चंदा इकट्ठा करने का आश्वासन दिया। फिर उसने स्कूल की प्रिंसिपल को कॉल किया, जिन्होंने व्हाट्सएप ग्रुप में मैसेज डालने की पेशकश की, लेकिन कोई आधिकारिक मदद नहीं की। उसकी आख़िरी उम्मीद वक़्फ़ बोर्ड की वेबसाइट भी बेकार साबित हुई। अगले दिन, सफ़दर की हालत बिगड़ने पर, डॉक्टर ने बताया कि लीवर ट्रांसप्लांट ज़रूरी है और इसका खर्च लगभग ₹18 लाख होगा। यह सुनकर ज़ेबा पूरी तरह टूट गई। उसे याद आया कि कैसे समाज के लोग दूसरों की मदद करने में उदासीन रहते हैं। कहानी इन सवालों के साथ समाप्त होती है कि क्या मस्जिदें और वक़्फ़ संपत्तियाँ वास्तव में ज़रूरतमंदों के लिए उपलब्ध हैं, क्या मुस्लिम समुदाय ने स्वास्थ्य आपात स्थितियों के लिए ठोस व्यवस्थाएँ की हैं, और क्या हम केवल प्रार्थनाओं तक ही सीमित रह गए हैं जब किसी को वास्तविक सहायता की आवश्यकता होती है। यह इस बात पर भी विचार करती है कि क्या समाज में किसी "ज़ेबा" को अकेला छोड़ दिया जाना चाहिए। यह कहानी एक महत्वपूर्ण प्रश्न उठाती है: "जब कोई बीमार होता है, क्या हम केवल संवेदना भेजते हैं, या समाधान भी?"

559 0