मुठ्ठी में दुनिया
ये डोर कुछ कच्ची है,ये जाल नकली है, दिखता नहीं पर चलता है, मीलों दूर का भी दिखाता है!सोचो तो ये जादू है, सोचो तो ये माया है ,हाथ में है सारा जहां,पर क्या हाथ में आया है?
तकनीक ने दुनिया जोड़ दी, पर क्या दिल भी जोड़ पाए हैं?हम ग्लोबल तो हो गए पर क्या दिल से ग्लोबल हो पाए हैं?
ये तरक्की है या अकेलेपन का नया नाम?
Paperwiff
by preetigupta3