ज़िम्मेदारी
मां की उंगली, पिता की खामोशी
बिन कहे सब समझा गई ,
बड़े हुए तो समझ आया,वहीं तो ज़िम्मेदारी का पहला दायरा था !
लोग कहते हैं खुद के लिए जी,
पर कभी दूसरों के लिए जीने में खुद से मिल जाओगे !!ये कर्ज नहीं निवेश है , प्रेम, दुआओं का भंडार है , सुकून का संसार है !! फिर जब भी लगे भारी
हीरा याद करना तुम तो इन्सान हो!!
Paperwiff
by preetigupta3