MUKESH BISSA

mukeshbissa

Myself poet and writer and mathematics teacher who like peace only

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मन
मन मन एक अनजाना सागर है, लहरों सा इसका स्वभाव, कभी शांत गहराई लेकर, कभी उठे तूफ़ानी चाव। मन कभी धूप सा चमकता, आशा की किरणें बिखेरता, कभी बादल बनकर घिरता, भीतर ही भीतर बरसता। मन है पंछी आज़ाद गगन का, सीमाओं से परे उड़ता, पर जब बंध जाता बंधनों में, खुद ही खुद से लड़ता। मन में सपनों की नगरी है, रंग-बिरंगे दृश्य बसे, कुछ पूरे हो जाते हँसकर, कुछ रह जाते अधूरे से। मन कभी बचपन सा भोला, छोटी-छोटी बातों में हँसता, कभी अनुभवों का वृद्ध बन, हर सच को चुपचाप सहता। मन ही मंदिर, मन ही माया, मन ही हर उलझन की डोर, इसे साध ले जो इंसान, उसके लिए नहीं कुछ भी कठिन और। मन को समझना ही जीवन है, मन से ही हर राह बने, अगर ये साथ हो अपने, तो अंधेरे में भी दीप जले।

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by mukeshbissa

मन

09 Apr, 2026
रावण कहाँ है
रावण कहाँ है? दशहरे पर जलाते हो जिसे, वो पुतला कागज़ का है, सोने की लंका तो जल गई, पर रावण आज कहाँ है? भीड़ में खड़े होकर तुम, तालियाँ बजाते हो, क्या अपने अंदर के रावण को, तुम पहचान पाते हो? रावण नहीं मरा था तब, उसकी बस देह मरी थी, उसकी बुराई, उसकी अहंकार, आज भी हर जगह खड़ी थी। वो तो एक ही सीता हर पाया, वो मर्यादा जानता था, पर आज तो हर गली में कई 'रावण' घूमते हैं, नारी सम्मान की बात करते हैं, पर नियत में छल छुपाये घूमते हैं। वह ज्ञानी था, पंडित था, फिर भी मोह में अड़ गया, आज तो अज्ञान में लिपटे, कितने भ्रष्ट यहाँ खड़े हैं। न्याय की चौखट पर, ईमान की धज्जियाँ उड़ती हैं, झूठ के बाज़ार में, सच्चाई सिसकती-मरती है। किस-किस रावण को तुम अब जलाने निकलोगे? जब हर मन में उसके अंश, पलते-बढ़ते दिखेंगे। पुतला जलाने से पहले, तुम ख़ुद को टटोलना ज़रा, कहाँ छिपा बैठा है वो, तुम्हारे अंदर का रावण डरा?

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कविता

30 Sep, 2025
इंतज़ार
इंतज़ार इंतज़ार कोई पल भर की बात नहीं, ये तो जैसे समय की लंबी साँस है, जो हर धड़कन के साथ चलती है, और हर ठहराव में छुपी एक आस है। कभी ये शाम के साये में ढलता है, कभी रात की चुप्पी में जागता है, कभी सुबह की किरणों से पूछता है— “क्या आज वो आएगा…?” और हर जवाब में खुद को ही पाता है। इंतज़ार में एक अजीब सी खामोशी होती है, जो शब्दों से कहीं ज्यादा बोलती है, होंठ चुप रहते हैं, मगर आँखें हर रास्ते को टटोलती हैं। वो जो नहीं है पास, उसी की मौजूदगी सबसे गहरी होती है, उसके कदमों की आहट भी हवा में कहानी सी बहती होती है। कभी ये मीठा लगता है— जैसे कोई सपना पल रहा हो, कभी ये चुभता है— जैसे कोई अधूरा ख्वाब जल रहा हो। इंतज़ार सिखाता है सब्र, और सब्र में छुपा होता है इम्तिहान, जो जितना गहरा इंतज़ार करता है, वो उतना ही सच्चा होता है इंसान। कभी ये प्रेम की परिभाषा बन जाता है, तो कभी विरह का गीत, कभी ये दिल को मजबूत करता है, तो कभी कर देता है अतीत। पर सच यही है— इंतज़ार कभी खाली नहीं जाता, या तो वो मिल जाता है जिसका था, या इंसान खुद को पा जाता। और तब समझ आता है— इंतज़ार कोई सज़ा नहीं, बल्कि वो रास्ता है, जहाँ चलते-चलते इंसान अपने भीतर के सबसे सच्चे हिस्से से मिलता है।

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इंतज़ार

09 Apr, 2026