तेरे बिना भी क्या जीना- 13

शादी के मंडप में जो नाटक हुआ उसके आगे की कड़ी

Moumita Bagchi
29 Apr, 2022 1 min read min read hi
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तेरे बिना भी क्या जीना- 13

Photo by Prashant Saini on Unsplash

"आज माहिरा की इस हालत के लिए कहीं न कहीं शायद मैं ही जिम्मेदार हूँ!" आशीष भीड़ से ज़रा दूर हटकर मंडप के समीप खड़े एक पेड़ के तने के सहारे अपने सर और पीठ को टिकाकर यही सब सोचे जा रहा था। 

उसकी आँखों के आगे इस समय बरसों पुरानी एक घटना के एक के बाद एक स्लाइड्स चलचित्र के सीनों की भाँति फिसलते जा रहे थे।

वे लोग उन दिनों काॅलेज के द्वितीय वर्ष में पढ़ते थे। माहिरा पढ़ाई में न केवल अव्वल थी, बल्कि तीखी नाक नख्श की धनी बेहद खूबसूरत बाला भी थी।

उसकी आँखों में बस एक ही सपना बसा था कि वह भी नासा की एक वैज्ञानिक बनेगी। इसलिए उसने फिजिक्स का विषय चुना था और एस्ट्रोफिजिक्स में स्पेशलाइज़ेशन करके उसे भी कल्पना चावला की तरह अंतरिक्ष का सैर करना था। बस यही एक लक्ष्य को साधे वह जीवन में आगे बढ़ने का प्रयास करने लगी थी। 

प्रेम-मोहब्बत, फैशन, सैर- सपाटा, दोस्तों संग हँसी- मज़ाक आदि जिन्दगी की सारी रंगीणियों से उसने खुद को दूर कर लिया था और स्वयं को एकलव्य की भाँति इस एक लक्ष्य के सुपुर्द कर दिया था।


पहले ही बताया जा चुका है कि माहिरा स्कूल के दिनों से ही आशीष को बहुत पसंद करती थी। पर आशीष पहले उसे कभी भाव नहीं देता था। पर काॅलेज में जाकर उसका कुछ- कुछ हृदय- परिवर्तन होने लगा था।


अन्य सभी लड़कियों के खोखले प्रेम-प्रदर्शन और शारीरिक दिखावा को देख कर उसका ज़रा इन सब बातों से जी उचाट होने लग गया था। उसके मन में इन लड़कियों के प्रति एक तरह से घोर विरक्ति उत्पन्न हो गई थी जो बात- बात पर अपने ब्याॅयफ्रेन्डों के साथ कामुकता भरी कारनामों की मिसालें दिया करती थीं।


यह उन्हीं दिनों की बात है जब उसमें अपने लक्ष्य-प्राप्ति के प्रति ईमानदारी रखने वाली और अथक परिश्रम करने वाली माहिरा के प्रति रुचि भी जाग्रत होने लगी थी।


माहिरा ने कभी भी अन्य लड़कियों की भाँति अपने प्रेम को आशीष पर थोपने की कोशिश न की थी। वर्ना आशीष का दम घुटने लगता।


आशीष को आज भी स्पष्ट याद आता है स्कूल के फेयरवेल का वह दिन जब माहिरा ने केवल उसे जन्मदिन की मुबारकबात दी थी और एक छोटा सा गिफ्ट देकर चुपचाप खिसक ली थी। उसकी दोनों अँखियाँ आशीष के प्रति प्रेम से भरे होने के बावजूद भी उसने उस समय आशीष से कुछ न कहा था। वह जानती थी कि आशीष किसी और को पसंद करता है। उसे आशीष की भावनाओं का अहसास था!


हाँ यह सही है, कि तब आशीष की क्रॅश कोई और थी। आशीष को बहुत जल्द ही प्रेम हो जाया करता है। और फिर उसके बाद वह उस प्रेम को ज्यादा दिन तक संभाल भी नहीं पाता है। स्वभाव से वह थोड़ा चंचल है या फिर वह जहाँ हमेशा के लिए बँध जाना चाहता है, ऐसी लड़की उसे अब तक मिली ही नहीं पाई थी, शायद।

लिज़ा को भी वह पसंद तो बहुत करता था, परंतु यहाँ भी उसके मन को वह सुकून नहीं मिल पाता था जहाँ बैठकर वह आजीवन चैन की वंशी बजा सके।


आज माहिरा के बारे में जानकर उसे इस हालत में भी अविचल देख कर आशीष के दिल में उसके प्रति एक असीम श्रद्धा जगने लगी थी। वही श्रद्धा हौले- हौले फिर प्रेम और केयर में परिवर्तित होने की कोशिश कर रही थी। 


माहिरा के प्रति आशीष की यह भावुकता कुछ विशेष जरूर थी। परंतु यह बचपना या दिखावट जैसी तो बिलकुल न थी। लेकिन दरअसल क्या थी,,, उसे आशीष भी सही से नहीं जानता था!


काॅलेज में भी जब वह था तब माहिरा को देखकर उसका दिल बहुत जोरों से धड़कने लगता था। परंतु यही बात वह उसे जाकर बता भी नहीं पाता था। वह कूछ भी करता बस माहिरा को खुश देखना चाहता था। और इसके लिए वह अपनी जान की बाज़ी भी लगा सकता था । और बरसों बाद माहिरा को देखकर आज भी वैसी ही कुछ फीलिंग्स उसे हो रही थी!


उन दिनों काॅलेज में एक बहुत बड़ी घटना घटित हुई थी जिसके चलते आशीष और माहिरा दोनों दुनिया के दो अलग- अलग कोनों में छिटक गए थे।


प्रथम वर्ष के स्वागत की जिम्मेदारी में उनके काॅलेज में एक बड़ा सा कार्यक्रम आयोजित होना था। द्वितीय वर्ष के छात्रों को इसकी सारी जिम्मेदारियाँ सौंपी गई थी। माहिरा उस आयोजक टिम को कोषाध्यक्षा थी। 


कुछ लोग, इस आयोजक कमिटी में ऐसे थे जो काॅलेज के अंदर ही एक गैर- कानूनी शराब- पार्टी करवाना चाहते थे। इसके लिए उन लोगों ने स्वागत- कार्यक्रम की निधि से गुप-चुप तरीके से पैसे निकालने लग गए थे। 


परंतु उनका यह कृत्य ज्यादा समय के लिए छिपा न रह पाया था क्योंकि हिसाब रक्षक को जल्दी ही यह सब पता चल गया।और उसने जाकर माहिरा को सब कुछ बता दिया था।


माहिरा ने तब गुस्से से भरकर उन चारों लड़कों का पर्दाफाश पूरे काॅलेज के सामने कर दिया था। बातों की गहमागहमी इतनी बढ़ गई थी कि माहिरा ने उस दिन अपना आपा खो दिया था। तैश में आकर उसने राजा नामक लड़के को सबके सामने थप्पड़ इज़ाद कर दिया था।


फिर क्या था-- शराब पार्टी तो न हो पाया लेकिन माहिरा की पूरी टिम की अथक मेहनत से स्वागत कार्यक्रम बहुत सार्थकता से पूरा हो गया था!


राजा,, परंतु,, अपना उस दिन का अपमान न भूल पाया था।


वह स्थानीय विधायक का साला था। स्वभाव से गुँडा और राजनैतिक वरदहस्त प्राप्त होने के कारण अहंकार से चूर भी था। उसने माहिरा को ज़लील करने की ठानी।


"किसी लड़की को अगर बुद्धि से न जीत पाओ तो उस पर बल प्रयोग करो।"


राजा ने भी इसी पुरानी पितृसत्तात्मक कहावत का सहारा लेकर अपने गुँडों को साथ लेकर एकदिन मौका देखकर माहिरा पर हमला बोल दिया।


क्रमशः


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