माँ की अलमारी-2

दफ्तर जाकर मायरा सरप्राइज़ हो जाती है!

Moumita Bagchi
07 Jun, 2021 • 1 min read • hi
❤️ 3 💬 2 👁 1082
माँ की अलमारी-2

Photo by guille pozzi on Unsplash

" हैलो मायरा जी, कैसी तबीयत है अब,आपकी?" मनोहरलाल ने उसे देखते ही पूछा। "

जी अंकल, मैं ठीक हूँ। आप सुनाइए?!"

" बेटे, आपको कल सारे कागजातों के साथ एक बार दफ्तर चले आना है। हम बहुत कोशिश कर रहे हैं कि विमला जी की जाॅब आपको मिल जाए!"

" ठीक है, अंकल!" " तो बेटा,,, यह आपका नियुक्ति- पत्र है और डक्यूमेन्ट्स की यह लिस्ट आप रख लीजिए। एक बार चेक करके सारे कागज़ात रख लीजिएगा। कल ग्यारह बजे मिलते हैं।"

"ओक्के,,थैन्क्यू!! नमस्ते अंकल!"

रात को मायरा बहुत खुश थी। उसे माँ के दफ्तर में काम मिल रहा था। अपने सभी सहपाठियों में से सबसे पहले उसी की नौकरी लग रही है! अभी उनका ग्रेजुएशन भी पूरा न हुआ था। उनका कोर्स पूरा होने में एक साल और बाकी था।

काॅलेज में आवेदन कर देगी। नाइट में पढ़कर एग्ज़ाम दे देगी और साथ ही दिन के टाइम जाॅब भी कर लेगी! मायरा के लिए यह बहुत खुशी की बात है।

इससे एक और अच्छी बात होगी कि वह बुआ जी के साथ गाँव जाने से बच जाएगी। ---- घर पर ही एक कूक और मेड रख लेगी। फिर तो उसका सारा काम मजे से चल जाएगा!

इन्हीं सुख स्वप्नों में खोई- खोई सी मायरा चैन से सो गई थी। माँ के गुज़र जाने के बाद शायद पहली बार! मायरा की मम्मी विमला सरकार के एक विभाग में उच्चपद पर आसीन थी।

उनकी अकस्मात् मृत्यु की वजह से सरकार की ओर से उनके निकटतम संबंधी, यानी की उनकी बेटी मायरा को, अनुकम्पा के आधार पर उसी कार्यालय में नियुक्त किया गया था। इस कार्य में दफ्तर के लोगों ने भी उसकी बहुत मदद की थी। खास कर इस मनोहरलाल जी ने। वही जो आज मायरा का नियुक्ति पत्र देने उसके घर आए थे।

अगले दिन सुबह सारे ज़रूरी काग़जातों को एक फाइल में समेट कर नियत समय से कुछ पहले ही मायरा मनोहर अंकल के केबिन के सामने आकर दरवाज़ें पर आकर दस्तक देती है। उसको अंदर आते देख कर अंकल के प्रसन्न चेहरे पर अचानक गंभीरता छा जाती है। वे उससे बैठने को कहना भी भूल जाते हैं, और उससे कहते हैं--

" मायरा, आपका एक बड़ा भाई भी है, यह तो आपने हमें कभी नहीं बताया?!! फिर मैं आपको यह कुर्सी दिलाने के लिए इतनी भाग- दौड़ करता ही नहीं!"

" यह आप, कैसी बातें कर रहे हैं, अंकल? मैं तो अपनी माँ की अकेली संतान हूँ! आपको शायद कोई भयंकर गलतफहमी हुई है।"

" नहीं, बेटा अब आप घर चले जाइए। हम आपके लिए जो कुछ कर सकते थे, कर चुके हैं!"

इतना कह कर मनोहरलाल एक फाइल खिंच कर उस पर कुछ लिखने लगे!

" पर अंकल कल आपने ही मुझे यहाँ आने को कहा था। अब आप मेरे साथ ऐसा कैसे कर सकते हैं? कोई भी आकर अनाप- शनाप कुछ कहेगा और आप लोगो मेरी माँ की जगह उसको दे देंगे?"

" क्या बात कर रही हैं आप, मायरा? दफ्तर का काम है कोई मज़ाक थोड़े ही है? हमारे एच° आर° विभाग द्वारा अनिकेत जी के सभी डक्यूमेन्ट्स की कई बार जाँच की गई। और जब उनके सारे काग़ज़ात सही निकले, तभी उनको इस जाॅब के लिए हाँ कहा गया! हम सब ने भी कई - कई बार चेक किया है। "

" अंकल, पर--- ।"

" कोई पर नहीं,,, इस बात पर और कोई बहस नहीं। आप घर जाइए।"

"हाँ एक और बात बताना आपको जरूरी समझता हूँ -- इस पद के लिए न्यूनतम योग्यता ग्रेजुएट है। और आपका ग्रेजुएशन अभी कम्प्लीट नहीं है,, सो आपको वैसे भी यह जगह देना मुश्किल होता!"

किसी अज्ञात कारण से मनोहरलाल जी की रातोंरात कायापलट हो गई थी। कल जो उसके घर आकर हँस- हँसकर बातें कर रहे थे आज उसी मनोहरलाल को पहचानने में मायरा को दिक्कत हो रही थी!

" यह फिर आप पहले ही कह देते, अंकल!! मुझे यहाँ आने को कह कर ऐसी बेइज्जती करने की क्या जरूरत थी, आपको? ---मैं ,,,आपका कम्प्लेन करूँगी!"

इतना कहकर तैश में मायरा मनोहरलाल के केबिन से निकल कर जेनरल मैनेजर के केबिन की ओर चल दी। पर वहाँ भी उसे यही सुनने को मिला।

" हम क्या कर सकते हैं, मैडम? हमें भी तो कायदे से चलना होता है।"

घर आकर मायरा किसी से कुछ न बोली। कल कितनी खुश हो रही थी और आज ही उसकी सारी खुशियों में मानों ग्रहण लग चुका था। वह वैसी ही आकर विस्तर पर लेट गई और खाने को भी न उठी।

अपमान की तीव्रता से उसकी आँखें जलने लगी थी। उसने कमरे की सारी बत्तियाँ गुल कर दी और सर पर हाथ रखकर पलंग पर देर तक लेटी रही।

कुछ देर बाद एक स्नेह- स्पर्श पाकर उसने जब अपनी आँखें खोली तो देखा कि-- बुआ जी उसके सिरहाने बैठकर उसके सिर पर हाथ फेर रही है। कुछ समय पहले माँ भी इसी तरह आकर बैठ जाती थी। न जाने कैसे समझ जाती थी वे कि मायरा का मन बिलकुल भी अच्छा नहीं है!

" बिट्टो, मम्मी की याद आ रही है, क्या?" बुआ जी का इतना पूछना था कि बिट्टो बुआजी की गोदी में सर छुपाकर सिसकने लगी।

क्रमशः-----  

3 likes
☕

Support Moumita Bagchi

Appreciate this story? Send a small tip to encourage the author to write more great work!

Please login to tip the author.

Moumita Bagchi
Published By

Moumita Bagchi

@moumitabagchi

Comments

Appreciate the author by telling what you feel about the post 💓

Please Login or Create a free account to comment.

★ Recommended For You

Stories tailored to your recent reading preferences

More stories in Fiction
Abdul Aleem nsk • 29 Jun, 2025 • 3 mins read

"The Boy Who Held Storms in Silence" (Fiction)

A silent boy, crushed by cruelty and unseen by the world, carries his pain alone—until it quietly ends him.

537 0
More stories in Fiction
fazal Esaf • 12 Jun, 2025 • 1 min read

बिल के उस पार"

सफ़दर अली को लीवर संक्रमण के कारण आईसीयू में भर्ती हुए छह दिन हो चुके थे। उनकी पत्नी ज़ेबा, एक स्कूल टीचर, इलाज के ₹2,83,000 के भारी बिल को देखकर परेशान थी, क्योंकि डॉक्टरों ने अगले दिन तक आईसीयू का भुगतान करने या सफ़दर को जनरल वार्ड में शिफ़्ट करने के लिए कहा था। उसकी मासिक आय इस बिल का एक तिहाई भी नहीं थी। मदद के लिए, ज़ेबा ने सबसे पहले मस्जिद के इमाम साहब को फ़ोन किया, जिन्होंने चंदा इकट्ठा करने का आश्वासन दिया। फिर उसने स्कूल की प्रिंसिपल को कॉल किया, जिन्होंने व्हाट्सएप ग्रुप में मैसेज डालने की पेशकश की, लेकिन कोई आधिकारिक मदद नहीं की। उसकी आख़िरी उम्मीद वक़्फ़ बोर्ड की वेबसाइट भी बेकार साबित हुई। अगले दिन, सफ़दर की हालत बिगड़ने पर, डॉक्टर ने बताया कि लीवर ट्रांसप्लांट ज़रूरी है और इसका खर्च लगभग ₹18 लाख होगा। यह सुनकर ज़ेबा पूरी तरह टूट गई। उसे याद आया कि कैसे समाज के लोग दूसरों की मदद करने में उदासीन रहते हैं। कहानी इन सवालों के साथ समाप्त होती है कि क्या मस्जिदें और वक़्फ़ संपत्तियाँ वास्तव में ज़रूरतमंदों के लिए उपलब्ध हैं, क्या मुस्लिम समुदाय ने स्वास्थ्य आपात स्थितियों के लिए ठोस व्यवस्थाएँ की हैं, और क्या हम केवल प्रार्थनाओं तक ही सीमित रह गए हैं जब किसी को वास्तविक सहायता की आवश्यकता होती है। यह इस बात पर भी विचार करती है कि क्या समाज में किसी "ज़ेबा" को अकेला छोड़ दिया जाना चाहिए। यह कहानी एक महत्वपूर्ण प्रश्न उठाती है: "जब कोई बीमार होता है, क्या हम केवल संवेदना भेजते हैं, या समाधान भी?"

587 0
More stories in Fiction
fazal Esaf • 11 Jun, 2025 • 1 min read

माफ़ी का मर्म

यह कहानी एक बुजुर्ग मुस्लिम इमाम हाजी यूसुफ़ साहब की है, जिनके बेटे की नृशंस हत्या पड़ोस में रहने वाले एक युवक ने कर दी। हत्या का कोई मजहबी या व्यक्तिगत कारण नहीं था — बस घृणा और ग़लतफहमी से उपजा हिंसक आवेग। पूरे मोहल्ले में शोक और ग़ुस्से का माहौल था। लेकिन जब अदालत में हाजी यूसुफ़ से यह पूछा गया कि वे क्या सज़ा चाहते हैं, तो उन्होंने हत्यारे को माफ कर दिया। उन्होंने कहा, "अगर मैं बदला लूंगा, तो मैं भी उसी घृणा में जीऊंगा जिसने मेरे बेटे की जान ली। लेकिन अगर मैं माफ कर दूं, तो शायद यह घृणा का अंत हो।" यह निर्णय सबको चौंका देता है — पड़ोसी, गैर-मुस्लिम मित्र, और समाज के वे लोग भी जो सोचते थे कि धर्म अलग करता है। इस माफ़ी ने लोगों को आत्म-चिंतन के लिए मजबूर कर दिया: जब ग़लती उसकी नहीं थी, तो वह फिर भी माफ कैसे कर सका? क्या हम दूसरों की गलतियों को इस तरह क्षमा कर सकते हैं? क्या हमारा धर्म, जाति, या पूर्वग्रह हमें मानवता से दूर कर रहे हैं? "माफ़ी का मर्म" सिर्फ एक कहानी नहीं, बल्कि आत्मा की गहराई से निकली इंसानियत की पुकार है — यह दिखाती है कि सच्ची शक्ति बंदूक में नहीं, माफ़ी में होती है।

586 0
More stories in Fiction
fazal Esaf • 06 Jun, 2025 • 1 min read

माँ हूँ मैं – सलमा की कहानी"

"माँ हूँ मैं – सलमा की कहानी" यह कहानी एक जुझारू माँ सलमा बी की है, जो अपने निर्दोष बेटे रामिज को झूठे चोरी के आरोप से बचाने के लिए अकेले लड़ती है। बिना पैसे, बिना सहारे, लेकिन सच्चाई और ममता के बल पर वह गवाह ढूंढती है, सबूत इकट्ठा करती है और अंततः अपने बेटे को जेल से आज़ाद कराती है। यह कहानी हर माँ के हौसले और हर बेगुनाह की उम्मीद का प्रतीक है।

484 0