जीवन का आधार राम

परिवार में बिगड़ते रिश्तों को बचाने हेतु राम जैसी सहनशीलता दिखाई जाने की आवश्यक्ता

Kusum Pareek
12 Aug, 2020 • 1 min read min read • hi
❤️ 1 💬 2 👁 1290
#Relationship
जीवन का आधार राम

Photo by Ahmed Nishaath on Unsplash

आज राम वापिस अयोध्या आ गए है लेकिन मैं किस मुँह से बाहर जाऊं, यही सोच व्यथित अवस्था में कैकयी अपने कक्ष में बैठी सोच रही थीं कि तभी दरवाजे पर दस्तक हुई , देखा एक छायाकृति उनके कमरे में आई आश्चर्य मिश्रित हो कर उन्होंने अपनी आँखों को बार-बार ऊपर नीचे किया,फाड़ फाड़ कर देखने की कोशिश की ,वह कोई और नहीं 'राम' ही थे।

दुःख व पश्चाताप से वह जड़ हुई जा रही थी कि अचानक राम ने उनके चरण छू लिए। 

पाँवों पर वे कोमल हाथ जो अब थोड़े कठोर हो चुके थे,उनके ह्वदय को अंदर तक पिघला गये।

कैकयी समझ नहीं पाई क्या कहे ?

अचानक राम का स्वर उभरा," माता क्या अपने इस पुत्र को आशीर्वाद नहीं देगी आप?"

यही वह वाक्य था जिसने माँ कैकयी को फिर से वही माँ बना दिया जिसने बचपन मे राम को भरत से भी अधिक लाड़-दुलार किया था।

इतने वर्षों बाद अब ममता वापिस हिलोरे लेने लगी थीं और अश्रुपूरित आँखों से उन्होंने अपने राम को देखा व भाव विह्वल हो हृदय से लगा लिया। 

समय भी माँ और पुत्र के इस मिलन को देखने के लिये वहीं ठठक कर खड़ा हो गया था।

वह शायद आगे बढ़ना भी नहीं चाहता लेकिन और भी कार्य उसे अभी पूरे करने थे।

थोड़ी देर में राम ,माँ कैकयी से अलग हुये और एक तरफ हटते हुये उन्होंने एक छाया को और आगे कर दिया विस्फारित नेत्रों से कैकयी जड़ हो गई जब राम के कहने पर उनके स्वयं के पुत्र भरत ने उनके चरण स्पर्श किये।

आज कैकयी का वह पुत्र भी उनके पास था जिसने राम वनवास के समय प्रतिज्ञा की थी कि आज से यह मेरी माता नहीं रहेंगी।"

चौदह वर्षों तक इस प्रायश्चित व दुःख की आग में झुलसने वाली कैकयी को आज चारों पुत्र वापिस मिल चुके थे।

यह था मेरे राम का व्यक्तित्व जिन्होंने रिश्तों को वहाँ तक जिया जहां तक क्षमा शीलता या सद्भावना लाना किसी साधारण पुरुष के वश में नहीं हो सकता।

पारिवारिक प्रेम व द्वेष रहित जीवन ही उनके जीवन के मूलभूत आदर्श रहे हैं।

जब तक हमारे मन में राम जैसा भातृ, मातृ, पितृ प्रेम नहीं पनपेगा तब तक त्याग ,सेवा,संयम व सहिष्णुता वाले परिवार बनाना कठिन है।

राम के इन आदर्शों को यदि हम जीवन में ढालें तब हम पायेंगे कि यदि हमें अच्छा परिवार चाहिए, अच्छा समाज चाहिए व सुदृढ देश चाहिए तो उनके आदर्शों को जीवन मे ढालना होगा।


कुसुम पारीक


1 like
☕

Support Kusum Pareek

Appreciate this story? Send a small tip to encourage the author to write more great work!

Please login to tip the author.

Kusum Pareek
Published By

Kusum Pareek

@kusumu56x

Comments

Appreciate the author by telling what you feel about the post 💓

  • Babita Kushwaha · 6 years ago last edited 6 years ago

    nice

  • Ektakocharrelan · 6 years ago last edited 6 years ago

    सुंदर लिखा आपने और मन को छू गई वो पंक्ति ऐसे थे मेरे राम सुंदर लेखन के लिए बधाई आपको ?

Please Login or Create a free account to comment.

★ Recommended For You

Stories tailored to your recent reading preferences

More stories in Self-help
Xleem • 01 Jul, 2026 • 1 min read min

Life

Life is a long journey, and most of us spend it chasing what we lack, while forgetting to be grateful for what we already hold.

104 0
More stories in Self-help
Xleem • 01 Jul, 2026 • 1 min read min

Li3f

Just read it

96 1
More stories in Self-help
Abdul Aleem nsk • 29 Jun, 2025 • 3 mins read min

"The Boy Who Held Storms in Silence" (Fiction)

A silent boy, crushed by cruelty and unseen by the world, carries his pain alone—until it quietly ends him.

503 0
More stories in Self-help
fazal Esaf • 02 Jun, 2025 • 1 min read min

एक मुस्लिम गरीब लड़के की कहानी जो पढ़ना चाहता है

यह कहानी रहीम नाम के एक गरीब और मेहनती मुस्लिम लड़के की है, जिसके जीवन में कम उम्र में ही मुश्किलों का पहाड़ टूट पड़ता है। जब वह सिर्फ तीन साल का था, तभी उसके अब्बा का इंतकाल हो जाता है, और घर की सारी ज़िम्मेदारी उसकी अम्मी, सकीना, पर आ जाती है। सकीना दूसरों के घरों में मेड का काम करती है, लेकिन उसकी कमाई इतनी कम होती है कि दो वक्त की रोटी भी मुश्किल से मिलती है, और रहीम को स्कूल भेजने का सपना अधूरा रह जाता है। इसके बावजूद, रहीम के अंदर पढ़ने की गहरी लगन है। उसकी आँखें ज्ञान की दुनिया को देखने का सपना देखती हैं और वह अपनी अम्मी को गरीबी और दूसरों के घरों में काम करने की मजबूरी से आज़ाद कराना चाहता है। अपनी इस इच्छा को पूरा करने के लिए, रहीम छोटी उम्र में ही काम करना शुरू कर देता है। वह शहर की एक छोटी सी परचून की दुकान पर दिन भर ईमानदारी और लगन से काम करता है। शाम होते ही, रहीम अपनी थकान को दरकिनार करते हुए पास के 'शाम के मदरसे' में पढ़ने चला जाता है, जहाँ गरीब बच्चों को मुफ्त शिक्षा दी जाती है। मदरसे से लौटने के बाद भी वह अपनी अम्मी की मदद करता है, घर के कामों में हाथ बँटाता है। रविवार का दिन उनके लिए खास होता है, जब रहीम अपनी अम्मी से अपने बड़े-बड़े सपने साझा करता है – खूब पढ़कर बड़ा आदमी बनना और अम्मी को आराम भरी ज़िंदगी देना। कहानी इस बात पर भी जोर देती है कि कैसे रहीम अपनी विपरीत परिस्थितियों के बावजूद अच्छी आदतों को बनाए रखता है। जहाँ उसके आस-पास के कई लड़के गरीबी से हार मानकर गलत रास्तों पर चले जाते हैं, वहीं रहीम न केवल खुद ईमानदार और नेक रहता है, बल्कि अपने दोस्तों और पड़ोस के लड़कों को भी पढ़ाई की अहमियत समझाता है और उन्हें सही रास्ता दिखाता है। वह उन्हें बताता है कि शिक्षा ही गरीबी से निकलने का एकमात्र ज़रिया है, न कि बुरे काम। यह कहानी मेहनत, लगन और नैतिक मूल्यों का एक सशक्त उदाहरण प्रस्तुत करती है, जो दर्शाती है कि दृढ़ इच्छाशक्ति और सही दिशा में प्रयास से कोई भी व्यक्ति अपनी मुश्किलों को पार कर सकता है।

876 0