धूल

पति पत्नी कब रिश्तों में आई संवादहीनता को दूर करती हुई कहानी

Kusum Pareek
20 Jun, 2020 • 1 min read min read • hi
❤️ 1 💬 1 👁 803
धूल

Photo by Becca Tapert on Unsplash

" धूल " 


दीप्ति के जीवन में अमावस की काली रात के बाद धीरे-धीरे बढ़ते हुए चाँद की चांदनी काफी समय बाद ही आई थी । वह विभोर की बांहों में लेटी ,खिड़की से झांकते हुए दूज के चाँद को निहार रही थी व विभोर धीरे धीरे उसकी काली घटाओं के समान, चेहरे पर आई लटों को दूर करते हुए उसके सुंदर मुखड़े में ही खोया हुआ था।

काफी समय से वह लगभग भूल ही गई थी कि अंतिम समय में कब उसने विभोर के साथ खाना खाया था ? या कब दोनों साथ साथ बाहर गए हों! 

जो शामें दोनों की एक दूसरे के सानिध्य में बीतती थीं, वे काफी समय से एक अबोला पन और अकेलेपन के भयाक्रांत वातावरण में बीतने लगी थीं।


 आज शाम का खाना भी दीप्ति ने डरते डरते ही तैयार किया था ,पता नहीं विभोर खाएंगे या नहीं । लेकिन जब विभोर अपने भाई मुकुल के साथ ऑफिस से वापिस आए और उसने खाना परोसा तो दोनों भाई खाने पर बैठ गए ।

दीप्ति ने संतोष की सांस ली और चपाती सेकने लगी ।लेकिन सुबह वाली घटना उसके दिमाग से निकल नहीं रही थी ,जब वह बेटी अनन्या को तैयार करके बाहर आई तो उसे पति की गुस्से भरी आवाज़ सुनाई दी कि मुकुल के लिए चाय दुबारा बना दो। 

दीप्ति ने सधी हुई आवाज़ में जवाब दिया ,"अनन्या की बस आने वाली है ,उसे छोड़कर आती हूँ ,फिर बनाती हूँ "

फिर भी पति के गुस्से की तेजी का भान होते ही उसने पतीले में पानी दूध डालकर गैस पर चढ़ा दिया और गैस सिम पर करके बेटी को छोड़ने चली गई ।


वापिस आई तो पति नहाने चले गए थे ।

मतलब वे ऑफिस जाने वाले हैं । अफरा तफरी में उसने फटाफट सब्जी बनाई और रोटी सेकने लगी,लेकिन तब तक दोनों भाई तैयार होकर बाहर निकलने ही वाले थे ।

दीप्ति ने साहस बटोर कर पति से कहा , " खाना खाकर चले जाइएगा।"

विभोर का पारा पहले ही सातवें आसमान पर था ,बोला ," बाहर भी मिलता है खाना ",और इसी के साथ दोनों भाइयों के कदम बाहर पड़ चुके थे ।

यह सब दीप्ति के साथ पिछले डेढ़ वर्षों से चला आ रहा था ,जब से मुकुल उनके साथ रहकर नौकरी ढूंढने आया था । जब तब भाई के कान भरता रहता था कि मुझे आज खाना नहीं दिया या चाय ठंडी दी । उसका एक वाक्य दीप्ति के जीवन में ५,७ दिन तक अबोलापन का तूफान ला देता ।

विभोर भाई की बातों को सच मान कर दीप्ति पर गर्म हो उठते व मुकुल उनको लड़ते हुए देख कर मन ही मन खुश होता ।

दीप्ति ने कई बार समझाने की भी कोशिश की, लेकिन विभोर कह देते ," तुम्हारी ही गलती है तभी मुकुल ऐसा करता है ,मैं तो मेरी भाभी के साथ ऐसा व्यवहार नहीं करता ।"

जब अविश्वास का ऐसा आवरण चढ़ा हो तो कोई माई का लाल नहीं जो इसको हटा सके ।

 धीरे धीरे दीप्ति मुरझाने लगी थी ।

खाने से उठकर विभोर जब सोने के लिए कमरे में आया तो उसकी नज़र पहली बाहर दीप्ति के क्लांत हो आए चेहरे पर पड़ी ।वह बहुत कमजोर भी लग रही थी । उसने उसे पूछा कि तुमने खाना खाया क्या?  

पति के काफी दिनों बाद सुने इन सहानुभूति पूर्ण शब्दों को सुनकर दीप्ति की आँखें डबडबा आई, उसने ना में सिर हिला दिया ।यह' न' विभोर की आत्मा को चीरकर निकल गया ।

वह सोचने लगा ,जिसको मैं जिंदगी भर के लिए  हमसफ़र बना कर लाया था उसके साथ मैं क्या करता जा रहा हूँ ? जो मेरी एक मुस्कुराहट के लिए सारे दिन भाग सकती है उसके लिए मेरा दायित्व क्या इतना ही है?

मुझे जीवन-संगिनी के रूप में एक शांत ,सौम्य, प्रेयसी व अपने कर्तव्यों के प्रति समर्पित एक सन्त का सा जीवन जीने वाली पत्नी मिली और मैं अभागा मेरे ही भाग्य को दुर्भाग्य में बदलने चला था ।

 एक तरफ यह है ,जो मेरे ऐसे तिरस्कारपूर्ण रवैये के बावजूद अपने सारे कर्तव्य पूरे करती है। यह सोचते हुए वह कब रसोई में पहुंच गया और कब खाना लाकर दीप्ति को कौर देने लगा --भान ही नही हुआ ।

अब उसकी आँखों से निकले आंसूओं को दीप्ति ने अपने आंसूओं में मिला दिया।

रिश्तों पर छाई धूल छंट चुकी थी ।


कुसुम पारीक 


मौलिक ,स्वरचित 


1 like
☕

Support Kusum Pareek

Appreciate this story? Send a small tip to encourage the author to write more great work!

Please login to tip the author.

Kusum Pareek
Published By

Kusum Pareek

@kusumu56x

Comments

Appreciate the author by telling what you feel about the post 💓

  • Sushma Tiwari · 6 years ago last edited 6 years ago

    वाह! कितनी बढ़िया तरह से प्रस्तुत किया है

Please Login or Create a free account to comment.

★ Recommended For You

Stories tailored to your recent reading preferences

More stories in Relationship
fazal Esaf • 18 Jun, 2025 • 1 min read min

कहानी का शीर्षक: "मिट्टी के साथी"

"मिट्टी और मनुष्य" एक मार्मिक कहानी है जो शहरी जीवन की भागदौड़ और प्रकृति से अलगाव के बीच, मिट्टी और उसके सबसे छोटे जीवों — केंचुओं — के महत्व को दर्शाती है। कहानी फ़ज़ल एसाफ नाम के एक युवा, संस्कारी किसान के बेटे के इर्द-गिर्द घूमती है, जो अपनी गाँव की मिट्टी और उसके अनदेखे नायकों के प्रति गहरी समझ रखता है। कहानी की शुरुआत ठाणे के एक छोटे से कस्बे में बारिश के बाद की सुबह से होती है, जहाँ फ़ज़ल सड़क पर रेंगते केंचुओं को देखकर विचलित हो जाता है, क्योंकि लोग उन्हें बिना सोचे-समझे कुचल रहे हैं। वह एक केंचुए को उठाकर सुरक्षित स्थान पर रखता है और मन ही मन बुदबुदाता है कि लोग इस "कीड़े" की अहमियत नहीं समझते, जबकि यही उनकी "रोटियों" से जुड़ा है। आगे चलकर, फ़ज़ल का सामना तीन अलग-अलग राहगीरों से होता है: एक तेज़-तर्रार कॉर्पोरेट महिला, अदिति मैडम; एक अनुभवी बुज़ुर्ग, शास्त्री जी; और एक नन्हा लड़का, आर्यन। सबसे पहले, अदिति मैडम अनजाने में एक केंचुए को कुचल देती हैं। फ़ज़ल उन्हें रोकता है और विनम्रता से समझाता है कि यह "कीड़ा" नहीं, बल्कि "किसान का दोस्त" है जो मिट्टी को साँस देता है और ज़मीन को उपजाऊ बनाता है। अदिति शुरुआत में झिझकती हैं, लेकिन फ़ज़ल के शब्दों में छिपी सच्चाई उन्हें सोचने पर मजबूर कर देती है। इसके बाद, शास्त्री जी फ़ज़ल की बात का समर्थन करते हैं और अपने पुराने दिनों को याद करते हैं जब केंचुए को खेत में देखना अच्छी फसल का संकेत माना जाता था। वे आधुनिक समाज में मिट्टी से बढ़ती दूरी पर चिंता व्यक्त करते हैं। फ़ज़ल उन्हें समझाता है कि लोग मिट्टी को गंदगी समझते हैं, जबकि वही "गंदगी" उनकी थाली में गेहूं बनकर आती है, और केंचुए ही बिना किसी स्वार्थ के ज़मीन को जोतते हैं। कहानी में एक मार्मिक मोड़ तब आता है जब आर्यन, एक छोटा लड़का, केंचुए को "साँप जैसा कुछ" समझता है। फ़ज़ल धैर्य से उसे बताता है कि यह एक अर्थवर्म है जो मिट्टी को अंदर से जोतता है, हवा, पानी और बीज को पनपने में मदद करता है। वह आर्यन को समझाता है कि वह जो सब्ज़ियाँ खाता है, वे कहीं न कहीं केंचुए के कारण ही उगती हैं, जिससे आर्यन केंचुए को अपना दोस्त समझने लगता है। आर्यन की माँ भी इस छोटे लेकिन गहरे सबक के लिए फ़ज़ल को धन्यवाद देती हैं। एक छोटी सभा में, फ़ज़ल अदिति, शास्त्री जी और आर्यन को संबोधित करते हुए कहते हैं कि भले ही वे शहर में रहते हों और वह गाँव से हो, लेकिन "मिट्टी" ही वह धागा है जो उन सबको जोड़ता है। वह शहरी लोगों से मिट्टी के प्रति संवेदना रखने और छोटे जीवों को बचाने की अपील करता है। शास्त्री जी भावुक होकर कहते हैं कि जो समाज ज़मीन से रिश्ता तोड़ता है, वह रिश्तों की अहमियत भी भूल जाता है। कहानी का चरमोत्कर्ष तब आता है जब फ़ज़ल अपने झोले से एक मुट्ठी मिट्टी उठाता है जिसमें एक केंचुआ रेंग रहा होता है। वह भावनात्मक स्वर में समझाता है कि यह मिट्टी केवल मिट्टी नहीं, बल्कि "जीवन" है, जिसमें "मेहनत" और "उम्मीद" है। वह चेतावनी देता है कि जिस दिन केंचुए कम हुए, उस दिन रोटी भी महंगी हो जाएगी, मिट्टी बंजर हो जाएगी, और दिल भी। यह सुनकर आर्यन अब हर केंचुए को ध्यान से देखता है और वादा करता है कि वह उन्हें कुचलेगा नहीं। कहानी एक शक्तिशाली मोनोलॉग के साथ समाप्त होती है, जिसमें फ़ज़ल की आवाज़ बताती है कि शहर भले ही चमकता हो, लेकिन उसकी नींव वही मिट्टी है जो गाँवों में साँस लेती है। वह जोर देता है कि अगर हम मिट्टी को मारते रहेंगे, तो हम भी धीरे-धीरे मरेंगे, "बिना आवाज़ के, बिना मिट्टी के।" अंतिम पंक्तियाँ एक काव्यात्मक संदेश देती हैं: "जो रेंगता है ज़मीन पर, वो थामे है आसमान को। न कुचलिए उसे, क्योंकि वो पालता है हमें… चुपचाप।" संदेश: यह पटकथा एक सरल लेकिन गहन संदेश देती है: "ज़मीन पर चलिए, मगर ज़मीन को समझकर चलिए। क्योंकि वहीं से जीवन उगता है।" यह कहानी हमें प्रकृति के सबसे छोटे सदस्यों के महत्व को पहचानने और उसके साथ हमारे संबंध को फिर से स्थापित करने के लिए प्रेरित करती है।

363 0
More stories in Relationship
fazal Esaf • 02 Jun, 2025 • 1 min read min

गांव और इंसाफ़

यह कहानी पंडित रामलाल और उनकी पत्नी सीता देवी की है, जो एक ऐसे गाँव में रहते हैं जहाँ हिंदू और मुस्लिम समुदाय सदियों से शांति और सौहार्द से रह रहे थे। एक दिन, देश के किसी दूसरे हिस्से में हुए एक आतंकवादी हमले के बाद, गाँव का माहौल बिगड़ जाता है। कुछ कट्टरपंथी ग्रामीण गुस्से में आकर गाँव के मुस्लिम परिवारों को धमकाने लगते हैं और उन्हें अपने घर खाली करने का आदेश देते हैं, उन पर आतंकवादी होने का आरोप लगाते हैं। गाँव के मुस्लिम परिवारों में से एक, सलमा बेगम और उनके परिवार को विशेष रूप से निशाना बनाया जाता है। जब भीड़ उन्हें उनके घर से निकालने की कोशिश करती है, तो पंडित रामलाल और सीता देवी उनके बचाव में आगे आते हैं। पंडित रामलाल भीड़ से सवाल करते हैं कि क्या किसी एक व्यक्ति के गलत काम के लिए पूरे समुदाय को दोषी ठहराना सही है। वह तर्क देते हैं कि अगर ऐसा होता है, तो हिंदुओं द्वारा किए गए बुरे कामों के लिए पूरे हिंदू समुदाय को भी दोषी ठहराया जाना चाहिए। उनकी पत्नी, सीता देवी, भी अपनी बात रखती हैं और सलमा बेगम के गाँव के प्रति योगदान और मदद को याद दिलाती हैं। वे दोनों स्पष्ट करते हैं कि आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता; आतंकवादी सिर्फ़ मानवता के दुश्मन होते हैं। वे गाँव वालों को समझाते हैं कि उन्हें आपस में नफ़रत फैलाने के बजाय ऐसे बुरे लोगों का मिलकर विरोध करना चाहिए। पंडित रामलाल और सीता देवी की बुद्धिमान और दृढ़ बातों का गाँव के लोगों पर गहरा असर होता है। उन्हें अपनी गलती का एहसास होता है और भीड़ शांत हो जाती है। इस घटना से गाँव वालों को यह महत्वपूर्ण सबक मिलता है कि किसी एक व्यक्ति के कृत्य के लिए पूरे समुदाय को दोषी ठहराना अन्याय है और धर्म के नाम पर नफ़रत फैलाना गलत है। यह कहानी सच्ची इंसानियत, समझदारी और मुश्किल समय में एक-दूसरे का साथ देने के महत्व को दर्शाती है।

458 0
More stories in Relationship
Ruchika Rai • 19 Mar, 2023 • 0 mins read min

लिव इन के प्रति राय

लिव इन

711 0
More stories in Relationship
Kumar Sandeep • 22 Feb, 2023 • 1 min read min

प्रार्थना यही है ईश्वर से

Dad please come back

920 1