हिंदी दिवस

स्वतंत्रता के बाद भी हिंदी की बिगड़ती हुई दशा के लिए हम सब जिम्मेदार हैं।

Kusum Pareek
14 Sep, 2020 • 1 min read • hi
❤️ 0 💬 2 👁 1081

" व्यथा"


मैं हिंदी हूँ और संस्कृत मेरी मां है जो एक जमाने में बहुत गौरवशाली ,सुंदर,सुसंस्कृत और विदुषी रही हैं।

मैंने भी मेरी माँ के पदचिन्हों पर चलते हुए स्वयं को शैशवावस्था से ही मिलनसार और बौद्धिक क्षमताओं से ओतप्रोत करते हुए स्वयं का विकास किया। 

मध्यकालीन युग में मैं पूरे यौवन पर थी ।सभी साहित्यकार और कवियों की रचनाओं में मेरा खूबसूरती से वर्णन किया जाता था ।

उसी समय मेरे साथ ही एक और भाषा उर्दू भी बड़ी होने लगी ।मैंने उससे भी हाथ मिलाया और कई कवियों ,साहित्यकारोँ की रचनाओं में हम एक दूसरे के साथ देखी जाने लगीं। 

मेरी कई बेटियां( क्षेत्रीय भाषाएं) भी हुईं जो अपने-अपने घर में लोगों के मेलजोल का माध्यम बनीं परन्तु सम्पूर्ण भारत भूमि पर मेरा ही अधिकार था। 

मेरी दूसरी बहनें भी थीं( दक्षिण भारतीय भाषाएं) जो धीरे धीरे मुझसे ईर्ष्या करने लगीं ।

इसका कारण मैं आज तक नहीं समझ पाई जबकि मां ने स्वयं की विरासत का हिस्सा उन्हें ज्यादा दिया था।

फिर भी मैं खुश थी मेरी बेटियों और अन्य भाषाओं के साथ। 

19 वीं शताब्दी में जब अंग्रेज आए और उन्होंने जगह-जगह अपनी भाषा के विद्यालय खोलने शुरू कर दिए व स्वयं को श्रेष्ठ सिद्ध करने लगे। 

1947 में जब अपना देश आजाद हुआ तब मैं बहुत खुश हुई कि अब मेरे घर में मेरा सम्मान होगा। मेरा यह सपना तब टूटा जब मेरी सौतेली बहनों को भड़का कर हमारे घर के संचालकों ने स्वयं की रोटी सेकने के लिए ,उन्हें मेरे विरुद्ध खड़ा कर दिया। यह विरोध इतना तीव्र था कि मेरे घर के कई भाग जला दिए गए और अंग्रेजों की एक नीति दुबारा काम कर गई ।अंग्रेजी को 10 वर्ष तक मेरे घर में यह कह कर पनाह दे दी गई कि अभी घर में अव्यवस्था है, ज़िम्मेदारी ज्यादा है। जब,सब कुछ सामान्य हो जाएगा तब अंग्रेजी को निकाल देंगे ।

लेकिन वह अंग्रेजी ,सौत की तरह मेरी ही छाती पर मूंग दलने लगी।

मेरे ही बच्चों को मेरे विरुद्ध किया जाने लगा ।जब वे विद्यालय जाते तब वहां मेरा नाम लेने तक की मनाही कर दी गई। 

मेरा सम्मान, वैभव सब मिटने लगा। 

कभी नौकरियों का प्रलोभन तो कभी आधुनिकता का प्रलोभन देकर मेरे ही खून को मुझसे अज़नबी किया जाने लगा।

अब तक यह दस साल की अवधि सत्तर साल में तब्दील हो चुकी है । मेरी सौत घर छोड़ने को भी तैयार नहीं है। मेरी खूबसूरती ,मेरा वैभव,मेरी गरिमा इस क़दर तार तार हो गए और इस उपहास से मैं इतनी द्रवित हो उठी  कि अब यदा कदा ही बाहर निकलती हूँ।

अंग्रेजी का यौवन उफान पर है और मैं निराशा के भंवर में डूबी हुई ।


जैसा कि कहा गया है, धोखा ज्यादा दिन नहीं चलता और पुत्र माँ से ज्यादा दिन दूर नहीं रह सकता ।

मेरे पुत्रों को दुबारा मेरी अहमियत समझ आने लगी हैं और 

वे मेरा खोया हुआ सम्मान दिलाने के लिए प्रतिबद्ध हो चुके हैं। 

आज मेरे बेटे मेरी सौत को घर से नहीं निकाल पा रहे हैं क्योंकि यह जड़ जमा चुकी है ।परन्तु मेरा सम्मान करने लगे हैं ।मुझे अपने साथ यदा-कदा बाहर भी ले जाते हैं ।

१४ सितंबर को तो मेरा जन्म दिन मनाते हैं ।

परन्तु एक टीस मेरे मन मे है , मैं मेरे पुराने वैभव को वापस पाना चाहती हूँ। 


मेरे बच्चों से यही गुहार है कि यदि तुम अपनी माँ का वैभव दिलाने की ठान लो तो मुझे कोई इससे वंचित नहीं कर पायेगा ।

इसी आशा में तुम्हारी माँ 


"हिंदी"


कुसुम पारीक 

मौलिक,स्वरचित ,

0 likes
☕

Support Kusum Pareek

Appreciate this story? Send a small tip to encourage the author to write more great work!

Please login to tip the author.

Kusum Pareek
Published By

Kusum Pareek

@kusumu56x

Comments

Appreciate the author by telling what you feel about the post 💓

  • Neha Srivastava · 6 years ago last edited 6 years ago

    बेहतरीन??

  • Kumar Sandeep · 6 years ago last edited 6 years ago

    आपकी कलम को नमन मैम

Please Login or Create a free account to comment.

★ Recommended For You

Stories tailored to your recent reading preferences

More stories in Education
Xleem • 01 Jul, 2026 • 1 min read

Life

Life is a long journey, and most of us spend it chasing what we lack, while forgetting to be grateful for what we already hold.

122 0
More stories in Education
Xleem • 01 Jul, 2026 • 1 min read

Li3f

Just read it

113 1
More stories in Education
Adhiraj • 14 Oct, 2025 • 2 mins read

अंतर्राष्ट्रीय स्कूल

कहानी का संदर्भ शिक्षा के बढ़ते व्यापारिक स्वरूप से है | किस प्रकार शिक्षा दान के स्थान पर व्यापार बन कर विद्यालयों की गुणवत्ता गिरती जा रही है, इस समस्या का जिक्र कहानी में व्यंगात्मक रूप में प्रस्तुत किया गया है |

278 1
More stories in Education
fazal Esaf • 18 Jun, 2025 • 1 min read

कहानी का शीर्षक: "मिट्टी के साथी"

"मिट्टी और मनुष्य" एक मार्मिक कहानी है जो शहरी जीवन की भागदौड़ और प्रकृति से अलगाव के बीच, मिट्टी और उसके सबसे छोटे जीवों — केंचुओं — के महत्व को दर्शाती है। कहानी फ़ज़ल एसाफ नाम के एक युवा, संस्कारी किसान के बेटे के इर्द-गिर्द घूमती है, जो अपनी गाँव की मिट्टी और उसके अनदेखे नायकों के प्रति गहरी समझ रखता है। कहानी की शुरुआत ठाणे के एक छोटे से कस्बे में बारिश के बाद की सुबह से होती है, जहाँ फ़ज़ल सड़क पर रेंगते केंचुओं को देखकर विचलित हो जाता है, क्योंकि लोग उन्हें बिना सोचे-समझे कुचल रहे हैं। वह एक केंचुए को उठाकर सुरक्षित स्थान पर रखता है और मन ही मन बुदबुदाता है कि लोग इस "कीड़े" की अहमियत नहीं समझते, जबकि यही उनकी "रोटियों" से जुड़ा है। आगे चलकर, फ़ज़ल का सामना तीन अलग-अलग राहगीरों से होता है: एक तेज़-तर्रार कॉर्पोरेट महिला, अदिति मैडम; एक अनुभवी बुज़ुर्ग, शास्त्री जी; और एक नन्हा लड़का, आर्यन। सबसे पहले, अदिति मैडम अनजाने में एक केंचुए को कुचल देती हैं। फ़ज़ल उन्हें रोकता है और विनम्रता से समझाता है कि यह "कीड़ा" नहीं, बल्कि "किसान का दोस्त" है जो मिट्टी को साँस देता है और ज़मीन को उपजाऊ बनाता है। अदिति शुरुआत में झिझकती हैं, लेकिन फ़ज़ल के शब्दों में छिपी सच्चाई उन्हें सोचने पर मजबूर कर देती है। इसके बाद, शास्त्री जी फ़ज़ल की बात का समर्थन करते हैं और अपने पुराने दिनों को याद करते हैं जब केंचुए को खेत में देखना अच्छी फसल का संकेत माना जाता था। वे आधुनिक समाज में मिट्टी से बढ़ती दूरी पर चिंता व्यक्त करते हैं। फ़ज़ल उन्हें समझाता है कि लोग मिट्टी को गंदगी समझते हैं, जबकि वही "गंदगी" उनकी थाली में गेहूं बनकर आती है, और केंचुए ही बिना किसी स्वार्थ के ज़मीन को जोतते हैं। कहानी में एक मार्मिक मोड़ तब आता है जब आर्यन, एक छोटा लड़का, केंचुए को "साँप जैसा कुछ" समझता है। फ़ज़ल धैर्य से उसे बताता है कि यह एक अर्थवर्म है जो मिट्टी को अंदर से जोतता है, हवा, पानी और बीज को पनपने में मदद करता है। वह आर्यन को समझाता है कि वह जो सब्ज़ियाँ खाता है, वे कहीं न कहीं केंचुए के कारण ही उगती हैं, जिससे आर्यन केंचुए को अपना दोस्त समझने लगता है। आर्यन की माँ भी इस छोटे लेकिन गहरे सबक के लिए फ़ज़ल को धन्यवाद देती हैं। एक छोटी सभा में, फ़ज़ल अदिति, शास्त्री जी और आर्यन को संबोधित करते हुए कहते हैं कि भले ही वे शहर में रहते हों और वह गाँव से हो, लेकिन "मिट्टी" ही वह धागा है जो उन सबको जोड़ता है। वह शहरी लोगों से मिट्टी के प्रति संवेदना रखने और छोटे जीवों को बचाने की अपील करता है। शास्त्री जी भावुक होकर कहते हैं कि जो समाज ज़मीन से रिश्ता तोड़ता है, वह रिश्तों की अहमियत भी भूल जाता है। कहानी का चरमोत्कर्ष तब आता है जब फ़ज़ल अपने झोले से एक मुट्ठी मिट्टी उठाता है जिसमें एक केंचुआ रेंग रहा होता है। वह भावनात्मक स्वर में समझाता है कि यह मिट्टी केवल मिट्टी नहीं, बल्कि "जीवन" है, जिसमें "मेहनत" और "उम्मीद" है। वह चेतावनी देता है कि जिस दिन केंचुए कम हुए, उस दिन रोटी भी महंगी हो जाएगी, मिट्टी बंजर हो जाएगी, और दिल भी। यह सुनकर आर्यन अब हर केंचुए को ध्यान से देखता है और वादा करता है कि वह उन्हें कुचलेगा नहीं। कहानी एक शक्तिशाली मोनोलॉग के साथ समाप्त होती है, जिसमें फ़ज़ल की आवाज़ बताती है कि शहर भले ही चमकता हो, लेकिन उसकी नींव वही मिट्टी है जो गाँवों में साँस लेती है। वह जोर देता है कि अगर हम मिट्टी को मारते रहेंगे, तो हम भी धीरे-धीरे मरेंगे, "बिना आवाज़ के, बिना मिट्टी के।" अंतिम पंक्तियाँ एक काव्यात्मक संदेश देती हैं: "जो रेंगता है ज़मीन पर, वो थामे है आसमान को। न कुचलिए उसे, क्योंकि वो पालता है हमें… चुपचाप।" संदेश: यह पटकथा एक सरल लेकिन गहन संदेश देती है: "ज़मीन पर चलिए, मगर ज़मीन को समझकर चलिए। क्योंकि वहीं से जीवन उगता है।" यह कहानी हमें प्रकृति के सबसे छोटे सदस्यों के महत्व को पहचानने और उसके साथ हमारे संबंध को फिर से स्थापित करने के लिए प्रेरित करती है।

378 0