अहंकार का त्याग

Aman G Mishra
24 Sep, 2019 • 1 min read min read • hi
❤️ 0 💬 0 👁 884
अहंकार का त्याग

जब अहं आता है तो बाक़ी सब चला जाता है, और जब अहं चला जाता हैं तो सब आ जाता है।

 


साइकिल चलाना आ जाने के बाद जो एक बड़ा रोमांच होता है वह है हैंडल से हाथ छोड़कर उसे चलाना। इस तरह से साइकिल चलाना इतना महत्वपूर्ण नहीं होता, जितना यह देखना कि ऐसा करते हुए लोग हमें देख रहे हैं। किशोरावस्था में किसी बस या ट्रेन के पायदान पर खड़े होकर यात्रा करना साहस का एक बढ़िया प्रदर्शन समझा जाता है। दरअसल लोगों में यह ललक उस काम को करने की नहीं होती, बल्कि दूसरों की नज़र में आने की होती है।

 


जीवन में हर कोई उस अवस्था से गुज़रता ही है, जिसमें दूसरों की नज़र में आने और अपनी एक पहचान बनाने के लिए हम कुछ भी कर गुज़रने को तैयार रहते हैं। यह वह समय होता है, जब कोई भी अच्छाई केवल इसलिए अच्छाई लगती है, क्योंकि वह लोगों का ध्यान अकर्षित करती है। और तो और कोई बुराई भी तब इसलिए अच्छाई लगने लगती है कि वह लोगों का ध्यान आकर्षित कर रही होती है। विडंबना तो तब होती है जब कोई अच्छाई भी, बस इसलिए अच्छाई नहीं रह जाती क्योंकि वह लोगों का ध्यान आकर्षित करने में विफल रहती है। दूसरों का ध्यान आकर्षित करना, दूसरों की नज़र में आना - यह अहं की ही ख़ुराक़ है। लेकिन आख़िरकार हमें उस अवस्था से ऊपर उठना चाहिए।

 


अपने स्वभाव के अनुसार, अहं को पोषण चाहिए और इसीलिए वह सदा इसका भिखारी बना रहता है। अहं के साथसमस्या यह है कि जब तक आपके अहं का पोषण होता है, तो आप श्रेष्ठता की भावना से ग्रस्त रहते हैं, लेकिन जब आपके अहं का पोषण नहीं किया जाता तो आप हीन भावना से ग्रस्त हो जाते हैं। दोनों ही अवस्थाओं में यह आपकी मानसिक शांति को छीन लेता है।

 


जब अहं आता है तो बाक़ी सब चला जाता है, और जब अहं चला जाता है तो सब आ जाता है।

 


अपने अहं को संतुष्ट करने के चक्कर में आप कितने मूल्यवान संबंध खो चुके हैं? आपको जब अपने अहं को दूर करके संबंध को बचाना था, तब आपने संबंध को दूर जाने दिया और अहं को बचा लिया। अहं कभी इस योग्य नहीं होता कि उसके लिए इतनी भारी क्षति सही जाए।

 


जब आप अपने अहं की सेवा करने में लगे होते हैं, तब कितने ही सुनहरे अवसर गँवा देते हैं? तब हर पल भारी होता है, हर स्थिति दिमाग़ की नसें हिला देने वाली होती है, हर बातचीत तनावपूर्ण होती है… अहं से भरा हृदय हमेशा आग पर चल रहा होता है, जल रहा होता है। अहं और सहजता का मिलन कभी नहीं हो पाता।

 


अपनी चोंच में माँस का टुकड़ा ले जा रहे एक कौवे ने पाया कि कई चिड़ियाँ उसके पीछे पड़ गई हैं। उसने वह माँस का टुकड़ा छोड़ दिया। तब सारी चिड़ियाँ कौवे को छोड़कर उस टुकड़े के पीछे झपट पड़ीं। तब आकाश में अकेले उड़ते कौवे ने कहा - “उस माँस के टुकड़े को छोड़कर मैंने आकाश की आज़ादी पा ली।”

 


अपने अहं को छोड़ देने से आपको भरपूर आज़ादी मिल जाती है। हम उस आजादी को तब तक महसूस नही कर पाएंगे जब तक अहम हमारे साथ रहेगा। इसलिए जितना जल्दी हो सके हमें अभिमान को छोड़ कर जीवन जीने की ओर अग्रसर होना चाहिए। 

हमें ये ध्यान रखना चाहिए कि क्या सही है ये नहीं कि कौन सही।

0 likes
☕

Support Aman G Mishra

Appreciate this story? Send a small tip to encourage the author to write more great work!

Please login to tip the author.

Aman G Mishra
Published By

Aman G Mishra

@aman

Comments

Appreciate the author by telling what you feel about the post 💓

Please Login or Create a free account to comment.

★ Recommended For You

Stories tailored to your recent reading preferences

More stories in Spirituality
fazal Esaf • 05 Jul, 2025 • 1 min read min

"मदीना को लिखे गए ख़त"

हर जुमे की सुबह एक बूढ़ा आदमी अपने दिल के टुकड़े काग़ज़ पर रख देता था — मदीना के नाम।" ‘मदीना को लिखे गए ख़त’ एक रूहानी, मोहब्बत-भरी कहानी है, जो इबादत और इंतज़ार के धागों से बुनी गई है। गुलज़ार की नज़्मों की तरह नरम, और दिल को छू लेने वाली इस कहानी में, एक पोती अपने दादा के उन ख़ामोश ख़तों को पढ़ती है, जो मदीना को नहीं, बल्कि अल्लाह से की गई एक धीमी, टूटती बातचीत होते हैं। यह कहानी है उन अल्फ़ाज़ों की जो कभी भेजे नहीं जाते, उन दुआओं की जो जवाब नहीं मांगतीं—बस यकीन रखती हैं।

316 0
More stories in Spirituality
fazal Esaf • 02 Jun, 2025 • 1 min read min

गांव और इंसाफ़

यह कहानी पंडित रामलाल और उनकी पत्नी सीता देवी की है, जो एक ऐसे गाँव में रहते हैं जहाँ हिंदू और मुस्लिम समुदाय सदियों से शांति और सौहार्द से रह रहे थे। एक दिन, देश के किसी दूसरे हिस्से में हुए एक आतंकवादी हमले के बाद, गाँव का माहौल बिगड़ जाता है। कुछ कट्टरपंथी ग्रामीण गुस्से में आकर गाँव के मुस्लिम परिवारों को धमकाने लगते हैं और उन्हें अपने घर खाली करने का आदेश देते हैं, उन पर आतंकवादी होने का आरोप लगाते हैं। गाँव के मुस्लिम परिवारों में से एक, सलमा बेगम और उनके परिवार को विशेष रूप से निशाना बनाया जाता है। जब भीड़ उन्हें उनके घर से निकालने की कोशिश करती है, तो पंडित रामलाल और सीता देवी उनके बचाव में आगे आते हैं। पंडित रामलाल भीड़ से सवाल करते हैं कि क्या किसी एक व्यक्ति के गलत काम के लिए पूरे समुदाय को दोषी ठहराना सही है। वह तर्क देते हैं कि अगर ऐसा होता है, तो हिंदुओं द्वारा किए गए बुरे कामों के लिए पूरे हिंदू समुदाय को भी दोषी ठहराया जाना चाहिए। उनकी पत्नी, सीता देवी, भी अपनी बात रखती हैं और सलमा बेगम के गाँव के प्रति योगदान और मदद को याद दिलाती हैं। वे दोनों स्पष्ट करते हैं कि आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता; आतंकवादी सिर्फ़ मानवता के दुश्मन होते हैं। वे गाँव वालों को समझाते हैं कि उन्हें आपस में नफ़रत फैलाने के बजाय ऐसे बुरे लोगों का मिलकर विरोध करना चाहिए। पंडित रामलाल और सीता देवी की बुद्धिमान और दृढ़ बातों का गाँव के लोगों पर गहरा असर होता है। उन्हें अपनी गलती का एहसास होता है और भीड़ शांत हो जाती है। इस घटना से गाँव वालों को यह महत्वपूर्ण सबक मिलता है कि किसी एक व्यक्ति के कृत्य के लिए पूरे समुदाय को दोषी ठहराना अन्याय है और धर्म के नाम पर नफ़रत फैलाना गलत है। यह कहानी सच्ची इंसानियत, समझदारी और मुश्किल समय में एक-दूसरे का साथ देने के महत्व को दर्शाती है।

463 0
More stories in Spirituality
fazal Esaf • 02 Jun, 2025 • 1 min read min

हिजाब वाली लड़की

कहानी का विस्तृत सारांश यह कहानी आयशा नाम की एक युवा मुस्लिम छात्रा के बारे में है जो मुंबई के एक आधुनिक कॉलेज में हिजाब पहनकर आती है, लेकिन उसे अपने पहनावे के कारण सहपाठियों के उपहास और पूर्वाग्रह का सामना करना पड़ता है। शुरुआत में आयशा इन टिप्पणियों को नज़रअंदाज़ करती है, लेकिन एक दिन कैंटीन में कुछ छात्रों द्वारा उसके हिजाब और उसकी बौद्धिक क्षमता को लेकर की गई आपत्तिजनक टिप्पणी उसे बोलने पर मजबूर कर देती है। आयशा बड़े ही शांत और दृढ़ स्वर में उन छात्रों को चुनौती देती है। वह सवाल करती है कि क्या हिजाब पहनने से "न्यूरॉन्स" काम करना बंद कर देते हैं और क्या विज्ञान में ऐसा कोई प्रमाण है जो यह बताता हो कि कपड़ों का एक टुकड़ा सोचने की क्षमता को प्रभावित करता है। वह स्पष्ट करती है कि हिजाब उसकी आस्था का प्रतीक है और इसे पहनकर वह सुरक्षित और सहज महसूस करती है। आयशा के सवाल केवल उसके व्यक्तिगत अनुभव तक ही सीमित नहीं रहते, बल्कि वे समाज के सामने व्यापक प्रश्न उठाते हैं। वह पूछती है कि यदि एक महिला अपने चुने हुए परिधान में सहज महसूस करती है तो दूसरों को इसमें क्या समस्या होनी चाहिए। वह आज़ादी के सही अर्थ पर प्रकाश डालती है, जो न केवल अपनी पसंद को व्यक्त करने की स्वतंत्रता है, बल्कि दूसरों की पसंद का सम्मान करने की भी। वह इस बात पर जोर देती है कि लोगों को उनके कपड़ों के आधार पर नहीं, बल्कि उनके विचारों और गुणों के आधार पर आंका जाना चाहिए। आयशा के सवालों से कॉलेज के छात्र शर्मिंदा होते हैं और उसके प्रति उनका नज़रिया बदलता है। कुछ छात्र उससे माफ़ी भी माँगते हैं। आयशा का यह कार्य न केवल उसके आत्मविश्वास को दर्शाता है बल्कि यह भी साबित करता है कि अज्ञानता और पूर्वाग्रह को समझ और सम्मान से ही हराया जा सकता है। कहानी इस बात पर ज़ोर देती है कि आयशा एक मेधावी छात्रा थी और हिजाब उसकी बौद्धिक क्षमता या पहचान के आड़े कभी नहीं आया।

473 0
More stories in Spirituality
Kinjal Jain • 23 Jan, 2024 • 1 min read min

Horizon

#Horizon

711 0