Adhiraj
14 Oct, 2025
समय
हर दिन सुबह गुजरती और शाम आती है,
ज्यों तन रेत ढलती और बिखर जाती है ।
मूक मूर्तियां देखती है बदलती नसले,
और युगों की बाते किताबों में क़ैद हो जाती है ।
समय के पाँव रुकते कहाँ है मित्र ?
अक्सर लोग अहम में समय पकड़ना चाहते है ।
तोड़ कर , झंझोड़कर, फिर गुलज़ार कर दे ,
समय अकाल की बर्बादी और वर्षा की खुशहाली है ।
बेशक इतिहास गवाह रहा होगा,
उन कब्रों पर लिखी तारीख़ का कुछ अर्थ बचा होगा ,
समय की आँच से जो झुलसे,
उनका मिजाज किसी फ़कीर सा रहा होगा ।
सूर्य का अंत भी लिख दे वो,
समय महज़ इंसानों तक क्यों रहा होगा ।
Paperwiff
by adhiraj
14 Oct, 2025
समय
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