संकटमोचन

और ऐसा भला हो सकता था कि बजरंगबली अपने प्रिय भक्त की मदद न करें।।

Dr. Pratik Prabhakar
05 Nov, 2020 • 1 min read • hi
❤️ 1 💬 0 👁 971
संकटमोचन

संकटमोचन हनुमान जी

"पवनपुत्र हनुमान की जय" मंदिर में जयकारा लगाया जा रहा था। और "जय" की आवाज़ जो जोर से कह रहा था वो था सुब्बु। सुब्बु हर शनिवार एवं मंगलवार को अपने दादा जी के साथ हनुमान मंदिर जाता था।  

एक तो इसी बहाने उसे मंदिर में प्रसाद खाने को मिलता तो दूसरी ओर मंदिर से लौटते वक्त दादाजी उसे कोई न कोई चॉकलेट जरूर दिलवाते थे।


सुब्बु थर्ड ग्रेड में था। घर पर तो काफी खुश रहता था लेकिन स्कूल जाना नहीं चाहता था। चूकिं क्लास के ही कुछ स्टूडेंट्स उसे मारते थे और सुब्बु कि टिफ़िन भी खा जाते थे। पर सुब्बु कर ही क्या सकता था।


एक बार मंदिर जाते रास्ते मे दादाजी ने सुब्बु को बताया कि हनुमान जी संकटमोचन होते हैं, सच्चे मन से जो कोई भी कुछ मांगता है, बजरंगबली उसे पूरा करते हैं। उसदिन सुब्बु ने हनुमान जी से मन ही मन मदद माँगी।


और ऐसा भला हो सकता था कि बजरंगबली अपने प्रिय भक्त की मदद न करें।। एक गोल मटोल बच्चे के रूप में पहुँच गए सुब्बु के स्कूल में। वहाँ जाकर सारे उत्पाती बच्चों के टिफ़िन खा लिए। उत्पाती बच्चों को भी समझ आ गया था कि वो उनसे जीतने वाले नहीं और ये सब इसीलिए हो रहा क्योंकि वो सुब्बु को परेशान करते थे।


सुब्बु समझ गया था कि हो न हो ये बजरंगबली ही हैं जो उसकी मदद करने आये हैं। आगे से किसी ने फिर कभी सुब्बु को तंग नहीं किया।

अब भी सुब्बु मंदिर जाता है और जोर से जयकारे लगाता है बजरंगबली की जय।

1 like
☕

Support Dr. Pratik Prabhakar

Appreciate this story? Send a small tip to encourage the author to write more great work!

Please login to tip the author.

Dr. Pratik Prabhakar
Published By

Dr. Pratik Prabhakar

@Drpratikprabhakar

Comments

Appreciate the author by telling what you feel about the post 💓

Please Login or Create a free account to comment.

★ Recommended For You

Stories tailored to your recent reading preferences

More stories in Fiction
fazal Esaf • 12 Jun, 2025 • 1 min read

बिल के उस पार"

सफ़दर अली को लीवर संक्रमण के कारण आईसीयू में भर्ती हुए छह दिन हो चुके थे। उनकी पत्नी ज़ेबा, एक स्कूल टीचर, इलाज के ₹2,83,000 के भारी बिल को देखकर परेशान थी, क्योंकि डॉक्टरों ने अगले दिन तक आईसीयू का भुगतान करने या सफ़दर को जनरल वार्ड में शिफ़्ट करने के लिए कहा था। उसकी मासिक आय इस बिल का एक तिहाई भी नहीं थी। मदद के लिए, ज़ेबा ने सबसे पहले मस्जिद के इमाम साहब को फ़ोन किया, जिन्होंने चंदा इकट्ठा करने का आश्वासन दिया। फिर उसने स्कूल की प्रिंसिपल को कॉल किया, जिन्होंने व्हाट्सएप ग्रुप में मैसेज डालने की पेशकश की, लेकिन कोई आधिकारिक मदद नहीं की। उसकी आख़िरी उम्मीद वक़्फ़ बोर्ड की वेबसाइट भी बेकार साबित हुई। अगले दिन, सफ़दर की हालत बिगड़ने पर, डॉक्टर ने बताया कि लीवर ट्रांसप्लांट ज़रूरी है और इसका खर्च लगभग ₹18 लाख होगा। यह सुनकर ज़ेबा पूरी तरह टूट गई। उसे याद आया कि कैसे समाज के लोग दूसरों की मदद करने में उदासीन रहते हैं। कहानी इन सवालों के साथ समाप्त होती है कि क्या मस्जिदें और वक़्फ़ संपत्तियाँ वास्तव में ज़रूरतमंदों के लिए उपलब्ध हैं, क्या मुस्लिम समुदाय ने स्वास्थ्य आपात स्थितियों के लिए ठोस व्यवस्थाएँ की हैं, और क्या हम केवल प्रार्थनाओं तक ही सीमित रह गए हैं जब किसी को वास्तविक सहायता की आवश्यकता होती है। यह इस बात पर भी विचार करती है कि क्या समाज में किसी "ज़ेबा" को अकेला छोड़ दिया जाना चाहिए। यह कहानी एक महत्वपूर्ण प्रश्न उठाती है: "जब कोई बीमार होता है, क्या हम केवल संवेदना भेजते हैं, या समाधान भी?"

573 0
More stories in Fiction
fazal Esaf • 11 Jun, 2025 • 1 min read

माफ़ी का मर्म

यह कहानी एक बुजुर्ग मुस्लिम इमाम हाजी यूसुफ़ साहब की है, जिनके बेटे की नृशंस हत्या पड़ोस में रहने वाले एक युवक ने कर दी। हत्या का कोई मजहबी या व्यक्तिगत कारण नहीं था — बस घृणा और ग़लतफहमी से उपजा हिंसक आवेग। पूरे मोहल्ले में शोक और ग़ुस्से का माहौल था। लेकिन जब अदालत में हाजी यूसुफ़ से यह पूछा गया कि वे क्या सज़ा चाहते हैं, तो उन्होंने हत्यारे को माफ कर दिया। उन्होंने कहा, "अगर मैं बदला लूंगा, तो मैं भी उसी घृणा में जीऊंगा जिसने मेरे बेटे की जान ली। लेकिन अगर मैं माफ कर दूं, तो शायद यह घृणा का अंत हो।" यह निर्णय सबको चौंका देता है — पड़ोसी, गैर-मुस्लिम मित्र, और समाज के वे लोग भी जो सोचते थे कि धर्म अलग करता है। इस माफ़ी ने लोगों को आत्म-चिंतन के लिए मजबूर कर दिया: जब ग़लती उसकी नहीं थी, तो वह फिर भी माफ कैसे कर सका? क्या हम दूसरों की गलतियों को इस तरह क्षमा कर सकते हैं? क्या हमारा धर्म, जाति, या पूर्वग्रह हमें मानवता से दूर कर रहे हैं? "माफ़ी का मर्म" सिर्फ एक कहानी नहीं, बल्कि आत्मा की गहराई से निकली इंसानियत की पुकार है — यह दिखाती है कि सच्ची शक्ति बंदूक में नहीं, माफ़ी में होती है।

572 0
More stories in Fiction
fazal Esaf • 06 Jun, 2025 • 1 min read

माँ हूँ मैं – सलमा की कहानी"

"माँ हूँ मैं – सलमा की कहानी" यह कहानी एक जुझारू माँ सलमा बी की है, जो अपने निर्दोष बेटे रामिज को झूठे चोरी के आरोप से बचाने के लिए अकेले लड़ती है। बिना पैसे, बिना सहारे, लेकिन सच्चाई और ममता के बल पर वह गवाह ढूंढती है, सबूत इकट्ठा करती है और अंततः अपने बेटे को जेल से आज़ाद कराती है। यह कहानी हर माँ के हौसले और हर बेगुनाह की उम्मीद का प्रतीक है।

474 0
More stories in Fiction
Frances Jean Albino • 18 Jul, 2024 • 1 min read

Someone once hurt me, but I choose to forgive

Choosing to forgive

1015 0