लघु कथाएं

लघु कथाएं

Babita Kushwaha
17 Jun, 2020 • 1 min read min read • hi
❤️ 0 💬 0 👁 1082
लघु कथाएं

Photo by timJ on Unsplash

काश मेरे पास जादू की छड़ी होती तो मैं बदल देती उस रिवाज को जो कहता है बेटियां पराई होती है। सदियों से बेटियां ही विदा होती है ससुराल जाती है। अरे! लड़के क्यों नही आ जाते अपने ससुराल में रहने। सारे आदर्श, रिवाज, संस्कार सिर्फ औरतों के लिए ही क्यों.?

अपना घर परिवार माता-पिता, भाई-बहन, या यूं कहो अपनी आधी जिंदगी छोड़ कर वो ही क्यों जाए। अगर कुछ बदलने का मौका मिले तो मैं बदल दूँगी उस समाज को जहाँ नारी को अबला समझा जाता है, उसे पराया कहा जाता है, उसे बोझ कहा जाता है।


कोरोना के चलते सभी को बाहर जाने की मनाही थी। ऐसे में रिया को घर मे बोर लग रहा था। न तो वो बाहर खेलने जा सकती थी और न ही अपने दोस्तो को घर बुला सकती थी। रिया का उतरा चेहरा देखकर माँ बोली चलो आज हम घर-घर खेलते है। माँ-बेटी ने मिलकर कपड़ो का घर बनाया और लाइट्स से उसको सजाया, बाद में माँ ने अपने बचपन की फ़ोटो भी रिया को दिखाई। पापा को भी अब रहा न गया और भी उनमे शामिल हो गए। दिन कैसे निकल गया रिया को पता ही नही चला।

@बबिता कुशवाहा

0 likes
☕

Support Babita Kushwaha

Appreciate this story? Send a small tip to encourage the author to write more great work!

Please login to tip the author.

Babita Kushwaha
Published By

Babita Kushwaha

@Babitakushwaha

Comments

Appreciate the author by telling what you feel about the post 💓

Please Login or Create a free account to comment.

★ Recommended For You

Stories tailored to your recent reading preferences

More stories in Fiction
wayne travel log • 31 Dec, 2025 • 1 min read min

The goth gouls of horror

fun gothic tale of horror

319 0
More stories in Fiction
Subhashree Banik • 03 Nov, 2025 • 9 mins read min

For the contest 'Disasters don't discriminate but humanity unites'

Hard times teach people a lot and they continue to guide us throughout the life. It's a story of transformation and how disaster changed the perspective of people altogether.

317 1
More stories in Fiction
fazal Esaf • 12 Jun, 2025 • 1 min read min

बिल के उस पार"

सफ़दर अली को लीवर संक्रमण के कारण आईसीयू में भर्ती हुए छह दिन हो चुके थे। उनकी पत्नी ज़ेबा, एक स्कूल टीचर, इलाज के ₹2,83,000 के भारी बिल को देखकर परेशान थी, क्योंकि डॉक्टरों ने अगले दिन तक आईसीयू का भुगतान करने या सफ़दर को जनरल वार्ड में शिफ़्ट करने के लिए कहा था। उसकी मासिक आय इस बिल का एक तिहाई भी नहीं थी। मदद के लिए, ज़ेबा ने सबसे पहले मस्जिद के इमाम साहब को फ़ोन किया, जिन्होंने चंदा इकट्ठा करने का आश्वासन दिया। फिर उसने स्कूल की प्रिंसिपल को कॉल किया, जिन्होंने व्हाट्सएप ग्रुप में मैसेज डालने की पेशकश की, लेकिन कोई आधिकारिक मदद नहीं की। उसकी आख़िरी उम्मीद वक़्फ़ बोर्ड की वेबसाइट भी बेकार साबित हुई। अगले दिन, सफ़दर की हालत बिगड़ने पर, डॉक्टर ने बताया कि लीवर ट्रांसप्लांट ज़रूरी है और इसका खर्च लगभग ₹18 लाख होगा। यह सुनकर ज़ेबा पूरी तरह टूट गई। उसे याद आया कि कैसे समाज के लोग दूसरों की मदद करने में उदासीन रहते हैं। कहानी इन सवालों के साथ समाप्त होती है कि क्या मस्जिदें और वक़्फ़ संपत्तियाँ वास्तव में ज़रूरतमंदों के लिए उपलब्ध हैं, क्या मुस्लिम समुदाय ने स्वास्थ्य आपात स्थितियों के लिए ठोस व्यवस्थाएँ की हैं, और क्या हम केवल प्रार्थनाओं तक ही सीमित रह गए हैं जब किसी को वास्तविक सहायता की आवश्यकता होती है। यह इस बात पर भी विचार करती है कि क्या समाज में किसी "ज़ेबा" को अकेला छोड़ दिया जाना चाहिए। यह कहानी एक महत्वपूर्ण प्रश्न उठाती है: "जब कोई बीमार होता है, क्या हम केवल संवेदना भेजते हैं, या समाधान भी?"

567 0
More stories in Fiction
fazal Esaf • 11 Jun, 2025 • 1 min read min

माफ़ी का मर्म

यह कहानी एक बुजुर्ग मुस्लिम इमाम हाजी यूसुफ़ साहब की है, जिनके बेटे की नृशंस हत्या पड़ोस में रहने वाले एक युवक ने कर दी। हत्या का कोई मजहबी या व्यक्तिगत कारण नहीं था — बस घृणा और ग़लतफहमी से उपजा हिंसक आवेग। पूरे मोहल्ले में शोक और ग़ुस्से का माहौल था। लेकिन जब अदालत में हाजी यूसुफ़ से यह पूछा गया कि वे क्या सज़ा चाहते हैं, तो उन्होंने हत्यारे को माफ कर दिया। उन्होंने कहा, "अगर मैं बदला लूंगा, तो मैं भी उसी घृणा में जीऊंगा जिसने मेरे बेटे की जान ली। लेकिन अगर मैं माफ कर दूं, तो शायद यह घृणा का अंत हो।" यह निर्णय सबको चौंका देता है — पड़ोसी, गैर-मुस्लिम मित्र, और समाज के वे लोग भी जो सोचते थे कि धर्म अलग करता है। इस माफ़ी ने लोगों को आत्म-चिंतन के लिए मजबूर कर दिया: जब ग़लती उसकी नहीं थी, तो वह फिर भी माफ कैसे कर सका? क्या हम दूसरों की गलतियों को इस तरह क्षमा कर सकते हैं? क्या हमारा धर्म, जाति, या पूर्वग्रह हमें मानवता से दूर कर रहे हैं? "माफ़ी का मर्म" सिर्फ एक कहानी नहीं, बल्कि आत्मा की गहराई से निकली इंसानियत की पुकार है — यह दिखाती है कि सच्ची शक्ति बंदूक में नहीं, माफ़ी में होती है।

566 0