किस्सा एक अनकहा अनसुना 4

लूसिफ़र....मात्र एक भ्रम या....?

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AM 05 Oct, 2022 | 1 min read

लूसिफ़र कौन है? कहाँ से आया है? पहले वो कौन था और क्या था? अब वो कौन है? क्यों वो पाताल का शासक बना, क्यों उसके हिस्से नर्क आया?

इन सभी सवालों का जवाब समय की अथाह जल राशि में छुपा है। आज जैसे वर्तमान है वैसे वर्तमान का कारक अतीत है। और इन सवालों का जवाब उसी अतीत में है।





हम जिसे लूसिफ़र, शैतान , बीलज़ेबब, मेफ़ेस्टोफ़ील्स,म़ाऱा, दैत्य आदि नामों से बुलाते हैं और जिसे अपने सभी दुःखों और संसार में व्याप्त बुराइयों का मूल समझते हैं वो स्वयं कभी एक शक्तिशाली तपस्वी देव था। तपस्वी इसलिए कि उसके पिता एक ब्रह्मर्षि थे और उन्होंने उसे अपने चार पुरुषार्थों में से एक पुरूषार्थ- काम, से उत्पन्न किया था, अपने तपोबल द्वारा।


(यहाँ मैं एक लेखिका होने के नाते क्रिएटिव लिबर्टी ले रही हूँ और लूसिफ़र के किरदार को एक दम नए रूप में एवं भारतीय संस्कृति, पृष्टभूमि और परिप्रेक्ष्य के अनुसार गढ़ रहीं हूँ, तो अभी तक आपने जो कुछ भी लूसिफ़र के बारे में पढ़, सुन या जान रखा है कृपया वो सब कुछ अपने ध्यान से हटा के पढ़ें क्योंकि यहाँ आप एक दम अलग और नये व्यक्तित्व के स्वामी से मिलने वाले हैं जिसका नाम लूसिफ़र है)



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वर्तमान काल से अट्ठाइस युग पहले अर्थात्‌ सात चतुर्युग से पहले के सतयुग का समय:



"पुत्रों! तुम्हारी शिक्षा-दीक्षा पूरी हो चुकी है। आज तुम्हारा दीक्षांत समारोह है। अब तक तुम चारों ने समाज के, मानवता के, प्रकृति एवं संसार के कल्याणार्थ बहुत कुछ सीखा। अब समय है कि जो कुछ तुमने सीखा उसे संसार के कल्याण में उसका उपयोग करो। "


"जी गुरुदेव! आप हम पर सदैव कृपा बनाए रखिए। हम आवश्य अपने लक्ष्य को पूरा कर लेंगे।" चार शिष्य एक पंक्ति में अपने गुरुदेव और गुरू माता के चरणों में बैठ उनके आशीर्वाद और प्रेम की छत्र छाया में स्वयं को सुरक्षित एवं सौभाग्यशाली प्रतीत कर रहे थे। हो भी क्यों ना! क्योंकि:

देवो रुष्टे गुरुस्त्राता गुरो रुष्टे न कश्चन:।

गुरुस्त्राता गुरुस्त्राता गुरुस्त्राता न संशयः।।

अर्थात् – भाग्य रूठ जाने पर गुरू रक्षा करता है। गुरू रूठ जाये तो कोई रक्षक नहीं होता। गुरू ही रक्षक है, गुरू ही शिक्षक है, इसमें कोई संदेह नहीं।


"तुम चारों, जय,विजय,किसलय एवं तनय! आगे क्या करने का विचार है? "

गुरुदेव ने जब अपने शिष्यों से पूछा तो चारों शिष्यों ने अपने नाम क्रमानुसार हाथ जोड़े उत्तर दिया:

जय "गुरुदेव! आप को तो पता है मेरा मूल स्वभाव धर्म है।व्यक्ति के चार पुरुषार्थों में से धर्म मेरा प्रधान पुरूषार्थ है सो तप करके त्रिदेव से धर्म की रक्षा, संवर्धन एवं प्रसार के लिए वर मांगूंगा।"

जय का उत्तर सुन गुरुदेव प्रसन्न हो बोले "अति उत्तम!" फिर वो विजय की तरफ़ मुड़े।

विजय "गुरुदेव! मेरा मूल स्वभाव काम अर्थात्‌ कामना एवं भावना का है इसलिये मैं तप करके त्रिदेव से भावना एवं कामना के माध्यम से संसार के उत्थान के लिए वर मांगूंगा।"

विजय का उत्तर सुन गुरुदेव फिर बोले "अति उत्तम!" और किसलय से उत्तर पाने के लिए उसकी तरफ़ देखा।

किसलय "गुरुदेव! मेरा प्रधान पुरूषार्थ अर्थ है इसलिए मैं त्रिदेव से तप करके सारे संसार के लिए श्री का वर मांगूंगा।"

किसलय का उत्तर सुन वो एक बार फ़िर बोले "अति उत्तम।" और तनय से उत्तर पाने के लिए उसकी ओर देखने लगे।

तनय "गुरुदेव! मेरा प्रधान पुरूषार्थ मोक्ष है इसलिए मैं त्रिदेव से सारे संसार के लिए मोक्ष का वर मांगूंगा।"


तनय और अपने बाकी सब शिष्यों के उत्तर सुन गुरुदेव अत्यंत प्रसन्न थे जो उनके मुख पर साफ़ दिख रहा था। वो प्रसन्नतापूर्वक तनय और बाकी तीनों से बोले "अति उत्तम! सर्वोत्तम! तुम चारों मेरे सबसे योग्य शिष्यों में से हो! परंतु मैंने तुम चारों को मनुष्य जीवन के चारों पुरुषार्थों पर बराबर परिश्रम करने को कहा परंतु तुमने आपने आपने स्वभाव और मूल गुण तत्त्व अनुसार अपने पुरूषार्थ चुन लिए ठीक वैसे ही जैसे:

यथायथा मतयः सन्ति नृणाम् ( -ऋग्वेद से )

अर्थात्‌- मनुष्य अपनी बुद्धि के अनुसार ज्ञान ग्रहण करते हैं।

इसलिए तुम्हारा गुरु एवं अभिभावक होने के नाते मैं तुम्हें यशस्वी होने का, विजयश्री पाने का आशीर्वाद देता हूँ।

तुम चारों सदैव धर्म, सद्,सत्य, कल्याण एवं सुमंगल के पथ पर अग्रसर रहो ऐसा मैं तुम्हारे परिश्रम एवं एकनिष्ठ प्रयासों से प्रसन्न हो तुम चारों को वरदान देता हूँ।"

गुरुदेव महर्षि ने जब ये कहा तो चारों शिष्यों के चेहरे खिल गये। गुरुदेव के इस वरदान का ये अर्थ था कि तीनों कभी भी अपने पथ से नहीं भटकेंगे। और सफलता की इच्छा रखने वालों को और क्या चाहिए भला?

जय, विजय, किसलय और तनय चारों गुरु भाई होने के साथ-साथ पक्के मित्र भी थे।

चारों का एक जैसा दुर्भाग्य था और एक जैसा सौभाग्य भी। चारों ने ही अपने-अपने परिजनों को बचपन में ही खो दिया था। फिर उन्हें गुरुदेव मिले। महर्षि नंदी को जब दीन-हीन दशा में ये बालक मिले तो उनके अंदर के पिता ने सिर उठा लिया। उन्होंने इन बालकों को ना सिर्फ़ अपने आश्रम अपितु अपने जीवन में भी स्थान दे दिया। चारों अत्याधिक परिश्रमी और सत्यनिष्ठ थे। गुरु के प्रति समर्पण भी समुद्र जैसे था सो गुरुदेव ने शिक्षा-दीक्षा देकर चारों को योग्य बना दिया। चारों को संसार और मानवता के लिए कुछ करना था। कुछ ऐसा की सभी जीवों का जीवन एकदम बदल जाये....पर सकारात्मक रूप से, कुछ ऐसे की सभी जीव आत्मिक उन्नति के पथ पर अग्रसर हों, ऋषि दत्तक पुत्र होने के कारण उनका संसार कल्याण के प्रति कुछ कर गुजरने की इच्छा होना अतिशयोक्ति नहीं थी सो निकल पड़े संसार कल्याण के लिए तपस्या में....


चारों सघन वन क्षेत्र में समाधि ले कर तपस्या में लीन हो गए।


....दिन बदले,फिर माह, फिर साल,फिर युग और फिर चार चतुर्युग यानी सोलह युग यूँ ही बीत गए.... चारों मित्र घोर तपस्या में लीन रहे! ईश्वर भी इनके समाज कल्याण के संकल्प की दृढ़ता परख रहे थे, क्योंकि ये चारों संसार में आने वाले एक बड़े बदलाव का कारण बनने वाले थे!

जब सोलह युग की घोर तपस्या की अवधि पूर्ण हुयी तो त्रिदेव अर्थात्‌ ब्रह्मा, विष्णु, महेश ने निश्चय किया कि अब इन चार तपस्वियों का जन्म जिस हेतु हुआ है वो कारण अब पूरा किया जाये और इस उद्धेश्य से उन्होंने चारों को दर्शन देने का निश्चय किया।



रात्रि का तीसरा पहर था। चारों मित्र तपस्या में लीन थे। तभी हर ओर एक दिव्य प्रकाश फैल गया।


और चारों के कान में एक मधुर स्वर वाली वाणी गूँजी।



"वत्स आँखें खोलो! तुम्हारी तपस्या हमें स्वीकार है।"त्रिदेव स्वयं पधार चुके थे । "अपनी कामना अनुसार वर मांगो!" त्रिदेव अपनी दिव्य वाणी में बोले।



"प्रभु! आपसे क्या छुपा है। हम तो युगों से यहाँ संसार के कल्याणार्थ तप कर रहें हैं। हमें अपने लिए कुछ नहीं चाहिए अपितु संसार के जीवों के कल्याण के लिए आपसे आशीर्वाद चाहिए। सो आशीर्वाद के रूप में आपको जो देना उचित लगे, आप संसार को दे दें। " चारों मित्र उस दिव्य आभा को देख हाथ जोड़े बोल उठे।


"उचित है! फिर संसार के कल्याणार्थ हम तुम चारों को चार ऐसे दिव्य पुत्रों का वर देते हैं जो इस संसार में मनुष्य के चार पुरूषार्थ धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष के स्वरूप एवं रक्षक होंगे। वो चार पुत्र तुम चारों की संसार के समस्त जीवों के कल्याण करने की प्रबल इच्छा एवं संकल्प को पूरा करेंगे।" उस दिव्य आभा से निकलती त्रिदेव की मधुर वाणी बोली। इतना सुनना था कि चारों मित्रों की खुशी का ठिकाना नहीं रहा।

फिर उस दिव्य आभा से एक अलग प्रकार की ऊर्जा निकलने लगी,,,, चारों तरफ़ कंपन होने लगा।

,,,,,,,,धरती हिलने लगी। चारों मित्र कुछ समझ नहीं पा रहे थे। वो भी कंपन के कारण गिरने लगे।

,,,,,,,,धरती के समस्त जीव व्याकुल हो उठे। पक्षी भयभीत हो शोर मचाते उस रात के अंधेरे में उड़ने लगे। सब कुछ बहुत ज़ोरों से हिलने लगा।,,,,,,,,और धीरे-धीरे ये कंपन बढ़ता ही चला गया।

,,,,,,,,,फिर अचानक वो कंपन रुक गया। सब कुछ एकदम से शांत हो गया।

,,,,,एकदम पूर्ववत हो गया।

उस दिव्य आभा से एक और दिव्य प्रकाश निकलने लगा। और फिर उस दिव्य प्रकाश से चार दिव्य बालक प्रकट हुए।

उन्होंने पहले उस दिव्य आभा को प्रणाम किया और फिर चारों ऋषियों के सामने हाथ जोड़ कर खड़े हो गए। उनके मुख पर एक दिव्य तेज था, आँखों में विशेष चमक।

फिर त्रिदेव की दिव्य वाणी बोली"ये रहे तुम चारों ब्रह्मर्षियों के चार तपस्वी, यशस्वी और तेजस्वी पुत्र।"

सभी ऋषि चौंक जाते हैं जब त्रिदेव उन्हें ब्रह्मर्षि कह पुकारते हैं। उनकी उत्सुकता जान वो दिव्य वाणी कहती है:

"तुम चारों ने सोलह युगों तक अथक तपस्या की है इसलिये तुम्हें ब्रह्मर्षि की उपाधि दी जाती है। "

इतना सुन के उन्हें विश्वास नहीं होता कि स्वयं त्रिदेव यहाँ पधार उन्हें इतना बड़ा वर भी दे रहे हैं और इतना बड़ा सम्मान भी! उन्हें तो मात्र संसार हित हेतु आशीर्वाद चाहिए था पर यहाँ तो उन्हें स्वयं त्रिदेव के आशीर्वाद रूपी पुत्र मिले और ब्रह्मर्षि के पद का सम्मान भी। ये सब उनकी इच्छा एवं कामना से कहीं बढ़कर था!

त्रिदेव की दिव्य वाणी जय से कहती है "हे जय! तुम्हारा पुत्र धर्म का साक्षात स्वरूप होगा। ये तीनों ही लोकों के सभी जीवों के धर्म रूपी पुरूषार्थ का संरक्षक होगा।"

जय आगे बढ़ता है और उस आभा को प्रणाम कर "जो आज्ञा प्रभु!" कहकर अपने पुत्र को हृदय से लगा लेता है।

फिर वो दिव्य वाणी विजय से बोली "हे विजय! तुम्हारा पुत्र कामना, आकांक्षाओं, इच्छाओं एवं भावनाओं का साक्षात स्वरूप होगा। ये तीनों ही लोकों के सभी जीवों के काम रूपी पुरूषार्थ का संरक्षक होगा।"

विजय आगे बढ़ता है और उस आभा को प्रणाम कर "जो आज्ञा प्रभु!" कहकर अपने पुत्र को हृदय से लगा लिया।

ऐसे ही किसलय को सारे संसार के धन, सम्पदा, श्री और अर्थ का साक्षात स्वरूप और अर्थ रूपी पुरूषार्थ का संरक्षण करने वाला सौभाग्यशाली पुत्र प्राप्त हुआ और तनय को मुक्ति और कल्याण का साक्षात स्वरूप और मोक्ष रूपी पुरूषार्थ का संरक्षण करने वाला तेजस्वी पुत्र प्राप्त हुआ।

चारों ऋषि जो अब ब्रह्मर्षि थे और चार प्रतापी पुत्रों के पिता भी थे, स्वयं को अति भाग्यशाली और संतुष्ट मान रहे थे, पर उनके स्वभाव में अपनी अर्जित उपलब्धियों के कारण लेशमात्र बदलाव नहीं आया, कारण था उनके गुरुदेव का वरदान। आज जब अपने पिता स्वरूप गुरुदेव के आशीर्वाद से उन्होंने इतना कुछ अर्जित कर लिया था तब उन्हें उनकी बहुत याद आयी। आज अगर वो होते तो अपने शिष्यों की उपलब्धि देखकर कितना प्रसन्न होते!


धीरे-धीरे समय बीतने लगा। चारों ब्रह्मर्षियों के चारों पुत्र बड़े होने लगे। चारों की शिक्षा-दीक्षा की कमान चारों पिताओं ने अपने हाँथों में ले ली। इसके अतिरिक्त उन्हें शस्त्रों के ज्ञान में भी अपराजेय बनाया। चारों पुत्र दिव्य तो थे ही, साथ-ही-साथ अत्यंत परिश्रमी और कुशाग्र बुद्धि वाले थे। वे चारों बहुत जल्दी ही सब कुछ सीख जाते थे। अपने गुरु रूपी पिताओं का आदर और सम्मान करना हो चाहें उनके सुख-दुख एवं इच्छाओं का मान रखना हो, चारों ही हर प्रकार से आदर्श थे।

जय के पुत्र का नाम था दिवित (अर्थात्‌ आकाश, स्वर्ग) जोकि चारों में सबसे बड़ा था।

विजय के पुत्र का नाम था इप्सित जो दिवित से छोटा परंतु अर्थ और मोक्ष से बड़ा था।

किसलय के पुत्र का नाम अर्थ था जो सिर्फ मोक्ष से बड़ा था और तनय के पुत्र का नाम मोक्ष था जोकि सबसे छोटा था।

वैसे तो चारों गुरु भाईयों के पुत्र अलग-अलग थे पर वो सभी को बराबर प्रेम करते थे। आठों का एक प्यारा छोटा-सा परिवार था, जिसमें एक-दूसरे के लिए अथाह प्रेम और सम्मान था। जैसे-जैसे ये आठों समाज कल्याण और प्राणी मात्र की सेवा में रमते जा रहे थे, इनका छोटा परिवार वैसे-वैसे बड़ा होता जा रहा था।

दिवित अपने स्वरूप के कारण एक दम सत्यनिष्ठ और सीधे स्वाभाव का था। ज्ञान और विनम्रता उसके गुण थे। पर बात यदि परिवार पर आ जाये तो वो कुछ भी कर सकता था।

इप्सित स्वाभाव से शांत पर अत्यंत स्नेही था। उसमें चतुराई कूट-कूट के भरी थी। उसकी बुद्धि अत्यंत कुशाग्र थी। उसकी बोली अत्यंत मीठी थी। और उसका रूप अत्यंत सुंदर था। इच्छा एवं काम के रूप इप्सित में बहुत कुछ विशेष था। परिवार के लिए उसका स्नेह किसी से छुपा नहीं था। उसके प्राण उसके तीनों भाई थे। वो जितना दिवित का सम्मान करता था उतना ही अपने छोटे भाइयों अर्थ एवं मोक्ष से स्नेह ।

अर्थ स्वाभाव से चुलबुला, शरारती और चंचल था। वो भी बहुत चतुर था। उसके प्राण भी अपने परिवार एवं भाइयों में बसते थे।

मोक्ष स्वाभाव से बहुत भोला था। वो अत्यंत ज्ञानी था पर साथ-ही-साथ संवेदनशील भी था। सब से छोटा होने के कारण सब उसे बहुत स्नेह करते थे।


चारों भाइयों के बीच एक-दूसरे के लिए अपूर्व स्नेह एवं सम्मान था।

धर्म के बिना काम दिशाहीन है। काम के बिना अर्थ का कोई मूल्य नहीं और किसी को भी धर्म, अर्थ एवं काम की आवश्यकता ही नहीं होती अगर मोक्ष नहीं चाहिए होता तो। ठीक यही संबंध दिवित, इप्सित, अर्थ और मोक्ष के बीच था।

चारों भाई अपने दायित्वों एवं कर्त्तव्यों का बहुत अच्छे से पालन कर रहे थे। चारों की कीर्ति तीनों लोकों में फैल गई थी, और दिन-प्रतिदिन बढ़ती ही जा रही थी। चारों का प्रताप फैलता ही जा रहा था। चारों सभी जीवों के प्रिय देव थे जो किसी स्वर्ग में नहीं अपितु उनके साथ धरती पर ही रहते थे, उनकी समस्याओं का हल निकालते थे। जो अत्यंत विनम्र और मृदुभाषी थे।

उनकी ख्याति धीरे-धीरे अन्य लोकों और ब्रह्मांडों में फैल रही थी। दिन-प्रतिदिन उनके प्रति जीवों के हृदय में प्रेम और सम्मान बढ़ता ही जा रहा था।

और साथ-ही-साथ कोई ऐसा भी था जो अपने मन में वैर दिन-प्रतिदिन हलाहला की भाँति बढ़ा रहा था इन चारों के लिए.....!


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आख़िर ऐसा क्या हुआ कि एक शक्तिशाली तपस्वी देव इप्सित को नर्क का स्वामी बनना पड़ा.....?



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