तारीफ के दो बोल

पोस्ट प्रेगनेंसी में भी औरतें अवसाद से घर जाती है जरूरत है तो उन्हें प्यार से संभालने की

Varsha Sharma
22 Nov, 2020 • 1 min read min read • hi
❤️ 0 💬 0 👁 883
##fear ## motivational ##problam#
तारीफ के  दो बोल

Photo by KAL VISUALS on Unsplash

यह अलग नखरे हैं...महारानी के चार जनों का काम नहीं होता हमारे जमाने में देखो हम कितना काम करते थे आजकल तो नई-नई नई बीमारी चली है |

संयुक्त परिवार है शोभा घर की बड़ी बहू है ... अभी शादी को 2 साल ही हुए हैं एक छोटी बिटिया है जिसके काम में बहुत व्यस्त हो जाती है और थक भी जाती है तो घर का काम जैसे पहले कर पाती थी वह नहीं कर पाती|

आए दिन घर में छोटी-छोटी बातों को लेकर क्लेश होता रहता है अगर पति से कुछ कहने जाती है तो वह अपने ऑफिस की टेंशन में रहते हैं वह भी नहीं सुनते

पहले तो जब शोभा ध्यान रखती थी तो तारीफ करते नहीं थकते थे|


कभी-कभी जब सासू मां खुश रहती हैं तो दोनों एक दूसरे की बातें बैठकर कर लेती है लेकिन काम को लेकर फिर शुरू हो जाती है|

अपने मायके में भी ज्यादा नहीं बताती क्योंकि पिताजी है नहीं और मां बूढ़ी है , वह भी क्या मदद करेंगे और सुनने के बाद परेशान ही होगी..

उसके साथ के दोस्त भी जो है वह ज्यादातर अकेले परिवार में है तो उन्हें इतनी प्रॉब्लम नहीं है|

उनके पति भी उनके साथ बराबर काम करते हैं और वह भी जॉब करती हैं | लेकिन शोभा ने अभी जब तक बच्ची छोटी है नौकरी ना करने का निर्णय लिया है|

फिर भी जब से बिटिया हुई है पता नहीं शरीर वैसे काम नहीं करता जैसे पहले करता था|

अगर बिटिया के साथ सो गई तो सोती ही रहती है|

आज फोन पर सासुमा बात कर रही थी ननंद से ,"अच्छा हैं बच्चे के साथ सोती रहती है.... क्यों मम्मी पहले तो ऐसा नहीं करती थी भाभी ?अब क्या हुआ? ? ? पता नहीं नए-नए नखरे हैं..... नहीं मम्मी आप ऐसा मत सोचो एक बार डॉक्टर को दिखा दो... अरेें डॉक्टर क्या ध्यान देंगे? ??खाओ पियो और काम करो???

नहीं मां मैंने कई बार देखा है औरते डिलीवरी के बाद डिप्रेशन में चली जाती हैं |

,"मतलब तुझे मैं गलत लग रही हूं क्या तूने और हमने नहीं किया काम तू ये नये नये चोचले अपने पास रख. . . . मां ने कहकर फोन काट दिया बिटिया को लगा मां गुस्सा हो गई तो बिटिया ने भाई से बात करने की सोची

उसने भाई को फोन किया था बोला, "शोभा ठीक है"

, "हां शोभा ठीक है उसे क्या प्रॉब्लम है आराम करती रहती है

नहीं भाई ऐसा नहीं है एक बार उसको डॉक्टर को दिखा ले क्या पता कोई मानसिक अवसाद दो, "अरे !!!मैं खुद रोज-रोज की झिक झिक से तंग आ गया हूं ऐसी जिंदगी भी क्या जिंदगी होती है अब तक तो इतना ध्यान रखती थी हां तो भाई जब तुम्हारा ध्यान रखती थी अब ध्यान रखने की बारी तुम्हारी है ,"|

हां तो ध्यान तो रखता हूं क्या कमी छोड़ रखी है मैंने???एक से एक चीज की सुविधा है और अब तो काम वाली भी लगा दी है |

लेकिन सब सुविधाएं देना ही सब कुछ नहीं होता, तुम्हें उसका दिल खुश रख करने के तरीके आने चाहिए, "

और वही कैसे दिल खुश होगा मुझे नहीं पता मैं तो अपनी तरफ से पूरी कोशिश करता हूँ अब कोई दिल खुश करना ही ना चाहे तो मैं क्या कर सकता हूं?????

अच्छा सबसे पहले तो तुम मुझे बताओ कि उसे क्या खाने में क्या पसंद है|

मुझे क्या पता ,"

अरे!!तुम्हारी शादी को 2 साल हो गए तुम्हें यही नहीं पता

यह छोटी-छोटी बातें हैं जो हम औरतों को बहुत अच्छे लगते हैं जरूरी नहीं कि तुम्हारे जीजा जी ने हमारे साथ नहीं किया हमारी पसंद का ख्याल नहीं रखा तो तुम भी ना रखो हम तो तुम्हें यह सलाह देंगे कि जो चीजें हमें अच्छी लगती है वह तुम हमारी भाभी के लिए करो, "जैसे आदमी के दिल का रास्ता खाने  से खुश हो जाता है ऐसी औरत थोड़े थोड़े से ख्याल से ही खुश हो जाती है अगर तुम उसकी पसंद का कोई भी काम करोगे तो वह बहुत खुश हो जाएगी कभी उसकी पसंद की जगह घुमा लाओ ,"

अरे उसे घूमना कहां पसंद है ??तुम्हें तो पता है अकेले बैठना ज्यादा पसंद है , "


हाँ तो सबकी अपनी-अपनी पसंद होती है|

अकेले में कभी पूछो बैठकर साथ में कोई प्रॉब्लम है तो हम अपना देख लेंगे भाई ने भी फोन काट दिया, "

लड़कियां भी एक समय पर पराई ही हो जाती वह चाह कर भी भाभी की मदद नहीं कर पा रही थी|


एक दिन शोभा सीढ़ियां उतरते हुए फिसल गई उसके पैर में फ्रैक्चर आ गया अब उसे डॉक्टर के पास जाना एक तो फ्रैक्चर के दर्द के कारण और कुछ अपने शरीर से परेशान होकर रोते ही जा रही थी|

सही है अभी फिक्र थी कि अब बच्ची के काम कौन करेगा और सासू मां तो उसको बहुत सुनाएंगे पैर के चोट से ज्यादा , उसे इस बात का ख्याल था कि घर में और क्लेश हो जाएगा| डॉक्टर ने दवाई दी तब जाकर शोभा चैन से सो गई ...डॉक्टर ने शोभा के पति को बुलाया और बोला कि इतनी सी उम्र में ऐसी परेशानी प्लास्टर तो लग जाता लेकिन वह तो ठीक ही नहीं होना चाहती ऐसा लग रहा है अंदर से परेशान है |क्या यह शुरू से ही ऐसी है'????

"नहीं नहीं पहले तो पूरा घर का खूब अच्छे से ध्यान रख ती थी,दिल से काम करती थी अब तो चार रोटियां भी बना ले तो बहुत है" नमन बोला


ऐसा कई बार हो जाता है डिलीवरी के बाद कई औरतों में डिप्रेशन के लक्षण दिखाई देते हैं ,इनको एक तो जिम्मेदारी बढ़ जाती है आप इन को मेरे पास लेकर आइए 6 महीने में यह सही हो जाएंगे आपको इनके दिल का ख्याल रखना होगा जैसे अब तक यह आपका ख्याल रख ती थी|

अब नमन को ध्यान आया कि वह काम तो सारा कर लेते थे लेकिन तारीफ के दो बोल बोलने से दोबारा से उसमें काम करने की ताकत आ जाती थी लेकिन आजकल अपने बिजी वक्त में वह तारीफ के दो बोल नहीं बोल पा रहा.....

इस बात को अपने दिल में इतने अंदर तक बैठा लिया जबकि कई दिलों को तो जन्म देने वाली है वह

अभी भी देर नहीं हुई है उसका इलाज भी करवा लूंगा और उसके दिल तक जाने का रास्ता भी बनाऊंगा |

आधी जिम्मेदारी में भी लूंगा आखिर पिता तो मैं भी बना हूँ | अब सोते हुए शोभा को निहार रहा है कितने आराम से सो रही है अब इसकी जिंदगी मुझे ही खुशगवार बनानी है


सखियों पोस्ट प्रेगनेंसी अवसाद एक बीमारी है जिसे घरों में बीमारी नहीं माना जाता,,अगर आपका कोई अपना इस बीमारी से जूझ रहा है तो उसे प्यार दे रिश्तो में कोई कंपटीशन नहीं होता बस प्यार होता है और औरतें तो थोड़े थोड़े से प्यार से घर को संभाल देती है ....तो उनके दिल का रास्ता प्यार और ख्याल से भरा होना चाहिए....



0 likes
☕

Support Varsha Sharma

Appreciate this story? Send a small tip to encourage the author to write more great work!

Please login to tip the author.

Varsha Sharma
Published By

Varsha Sharma

@varshau8hkd

Comments

Appreciate the author by telling what you feel about the post 💓

Please Login or Create a free account to comment.

★ Recommended For You

Stories tailored to your recent reading preferences

More stories in Culture
fazal Esaf • 05 Jul, 2025 • 1 min read min

"मदीना को लिखे गए ख़त"

हर जुमे की सुबह एक बूढ़ा आदमी अपने दिल के टुकड़े काग़ज़ पर रख देता था — मदीना के नाम।" ‘मदीना को लिखे गए ख़त’ एक रूहानी, मोहब्बत-भरी कहानी है, जो इबादत और इंतज़ार के धागों से बुनी गई है। गुलज़ार की नज़्मों की तरह नरम, और दिल को छू लेने वाली इस कहानी में, एक पोती अपने दादा के उन ख़ामोश ख़तों को पढ़ती है, जो मदीना को नहीं, बल्कि अल्लाह से की गई एक धीमी, टूटती बातचीत होते हैं। यह कहानी है उन अल्फ़ाज़ों की जो कभी भेजे नहीं जाते, उन दुआओं की जो जवाब नहीं मांगतीं—बस यकीन रखती हैं।

315 0
More stories in Culture
fazal Esaf • 18 Jun, 2025 • 1 min read min

कहानी का शीर्षक: "मिट्टी के साथी"

"मिट्टी और मनुष्य" एक मार्मिक कहानी है जो शहरी जीवन की भागदौड़ और प्रकृति से अलगाव के बीच, मिट्टी और उसके सबसे छोटे जीवों — केंचुओं — के महत्व को दर्शाती है। कहानी फ़ज़ल एसाफ नाम के एक युवा, संस्कारी किसान के बेटे के इर्द-गिर्द घूमती है, जो अपनी गाँव की मिट्टी और उसके अनदेखे नायकों के प्रति गहरी समझ रखता है। कहानी की शुरुआत ठाणे के एक छोटे से कस्बे में बारिश के बाद की सुबह से होती है, जहाँ फ़ज़ल सड़क पर रेंगते केंचुओं को देखकर विचलित हो जाता है, क्योंकि लोग उन्हें बिना सोचे-समझे कुचल रहे हैं। वह एक केंचुए को उठाकर सुरक्षित स्थान पर रखता है और मन ही मन बुदबुदाता है कि लोग इस "कीड़े" की अहमियत नहीं समझते, जबकि यही उनकी "रोटियों" से जुड़ा है। आगे चलकर, फ़ज़ल का सामना तीन अलग-अलग राहगीरों से होता है: एक तेज़-तर्रार कॉर्पोरेट महिला, अदिति मैडम; एक अनुभवी बुज़ुर्ग, शास्त्री जी; और एक नन्हा लड़का, आर्यन। सबसे पहले, अदिति मैडम अनजाने में एक केंचुए को कुचल देती हैं। फ़ज़ल उन्हें रोकता है और विनम्रता से समझाता है कि यह "कीड़ा" नहीं, बल्कि "किसान का दोस्त" है जो मिट्टी को साँस देता है और ज़मीन को उपजाऊ बनाता है। अदिति शुरुआत में झिझकती हैं, लेकिन फ़ज़ल के शब्दों में छिपी सच्चाई उन्हें सोचने पर मजबूर कर देती है। इसके बाद, शास्त्री जी फ़ज़ल की बात का समर्थन करते हैं और अपने पुराने दिनों को याद करते हैं जब केंचुए को खेत में देखना अच्छी फसल का संकेत माना जाता था। वे आधुनिक समाज में मिट्टी से बढ़ती दूरी पर चिंता व्यक्त करते हैं। फ़ज़ल उन्हें समझाता है कि लोग मिट्टी को गंदगी समझते हैं, जबकि वही "गंदगी" उनकी थाली में गेहूं बनकर आती है, और केंचुए ही बिना किसी स्वार्थ के ज़मीन को जोतते हैं। कहानी में एक मार्मिक मोड़ तब आता है जब आर्यन, एक छोटा लड़का, केंचुए को "साँप जैसा कुछ" समझता है। फ़ज़ल धैर्य से उसे बताता है कि यह एक अर्थवर्म है जो मिट्टी को अंदर से जोतता है, हवा, पानी और बीज को पनपने में मदद करता है। वह आर्यन को समझाता है कि वह जो सब्ज़ियाँ खाता है, वे कहीं न कहीं केंचुए के कारण ही उगती हैं, जिससे आर्यन केंचुए को अपना दोस्त समझने लगता है। आर्यन की माँ भी इस छोटे लेकिन गहरे सबक के लिए फ़ज़ल को धन्यवाद देती हैं। एक छोटी सभा में, फ़ज़ल अदिति, शास्त्री जी और आर्यन को संबोधित करते हुए कहते हैं कि भले ही वे शहर में रहते हों और वह गाँव से हो, लेकिन "मिट्टी" ही वह धागा है जो उन सबको जोड़ता है। वह शहरी लोगों से मिट्टी के प्रति संवेदना रखने और छोटे जीवों को बचाने की अपील करता है। शास्त्री जी भावुक होकर कहते हैं कि जो समाज ज़मीन से रिश्ता तोड़ता है, वह रिश्तों की अहमियत भी भूल जाता है। कहानी का चरमोत्कर्ष तब आता है जब फ़ज़ल अपने झोले से एक मुट्ठी मिट्टी उठाता है जिसमें एक केंचुआ रेंग रहा होता है। वह भावनात्मक स्वर में समझाता है कि यह मिट्टी केवल मिट्टी नहीं, बल्कि "जीवन" है, जिसमें "मेहनत" और "उम्मीद" है। वह चेतावनी देता है कि जिस दिन केंचुए कम हुए, उस दिन रोटी भी महंगी हो जाएगी, मिट्टी बंजर हो जाएगी, और दिल भी। यह सुनकर आर्यन अब हर केंचुए को ध्यान से देखता है और वादा करता है कि वह उन्हें कुचलेगा नहीं। कहानी एक शक्तिशाली मोनोलॉग के साथ समाप्त होती है, जिसमें फ़ज़ल की आवाज़ बताती है कि शहर भले ही चमकता हो, लेकिन उसकी नींव वही मिट्टी है जो गाँवों में साँस लेती है। वह जोर देता है कि अगर हम मिट्टी को मारते रहेंगे, तो हम भी धीरे-धीरे मरेंगे, "बिना आवाज़ के, बिना मिट्टी के।" अंतिम पंक्तियाँ एक काव्यात्मक संदेश देती हैं: "जो रेंगता है ज़मीन पर, वो थामे है आसमान को। न कुचलिए उसे, क्योंकि वो पालता है हमें… चुपचाप।" संदेश: यह पटकथा एक सरल लेकिन गहन संदेश देती है: "ज़मीन पर चलिए, मगर ज़मीन को समझकर चलिए। क्योंकि वहीं से जीवन उगता है।" यह कहानी हमें प्रकृति के सबसे छोटे सदस्यों के महत्व को पहचानने और उसके साथ हमारे संबंध को फिर से स्थापित करने के लिए प्रेरित करती है।

364 0
More stories in Culture
fazal Esaf • 02 Jun, 2025 • 1 min read min

गांव और इंसाफ़

यह कहानी पंडित रामलाल और उनकी पत्नी सीता देवी की है, जो एक ऐसे गाँव में रहते हैं जहाँ हिंदू और मुस्लिम समुदाय सदियों से शांति और सौहार्द से रह रहे थे। एक दिन, देश के किसी दूसरे हिस्से में हुए एक आतंकवादी हमले के बाद, गाँव का माहौल बिगड़ जाता है। कुछ कट्टरपंथी ग्रामीण गुस्से में आकर गाँव के मुस्लिम परिवारों को धमकाने लगते हैं और उन्हें अपने घर खाली करने का आदेश देते हैं, उन पर आतंकवादी होने का आरोप लगाते हैं। गाँव के मुस्लिम परिवारों में से एक, सलमा बेगम और उनके परिवार को विशेष रूप से निशाना बनाया जाता है। जब भीड़ उन्हें उनके घर से निकालने की कोशिश करती है, तो पंडित रामलाल और सीता देवी उनके बचाव में आगे आते हैं। पंडित रामलाल भीड़ से सवाल करते हैं कि क्या किसी एक व्यक्ति के गलत काम के लिए पूरे समुदाय को दोषी ठहराना सही है। वह तर्क देते हैं कि अगर ऐसा होता है, तो हिंदुओं द्वारा किए गए बुरे कामों के लिए पूरे हिंदू समुदाय को भी दोषी ठहराया जाना चाहिए। उनकी पत्नी, सीता देवी, भी अपनी बात रखती हैं और सलमा बेगम के गाँव के प्रति योगदान और मदद को याद दिलाती हैं। वे दोनों स्पष्ट करते हैं कि आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता; आतंकवादी सिर्फ़ मानवता के दुश्मन होते हैं। वे गाँव वालों को समझाते हैं कि उन्हें आपस में नफ़रत फैलाने के बजाय ऐसे बुरे लोगों का मिलकर विरोध करना चाहिए। पंडित रामलाल और सीता देवी की बुद्धिमान और दृढ़ बातों का गाँव के लोगों पर गहरा असर होता है। उन्हें अपनी गलती का एहसास होता है और भीड़ शांत हो जाती है। इस घटना से गाँव वालों को यह महत्वपूर्ण सबक मिलता है कि किसी एक व्यक्ति के कृत्य के लिए पूरे समुदाय को दोषी ठहराना अन्याय है और धर्म के नाम पर नफ़रत फैलाना गलत है। यह कहानी सच्ची इंसानियत, समझदारी और मुश्किल समय में एक-दूसरे का साथ देने के महत्व को दर्शाती है।

461 0
More stories in Culture
fazal Esaf • 02 Jun, 2025 • 1 min read min

हिजाब वाली लड़की

कहानी का विस्तृत सारांश यह कहानी आयशा नाम की एक युवा मुस्लिम छात्रा के बारे में है जो मुंबई के एक आधुनिक कॉलेज में हिजाब पहनकर आती है, लेकिन उसे अपने पहनावे के कारण सहपाठियों के उपहास और पूर्वाग्रह का सामना करना पड़ता है। शुरुआत में आयशा इन टिप्पणियों को नज़रअंदाज़ करती है, लेकिन एक दिन कैंटीन में कुछ छात्रों द्वारा उसके हिजाब और उसकी बौद्धिक क्षमता को लेकर की गई आपत्तिजनक टिप्पणी उसे बोलने पर मजबूर कर देती है। आयशा बड़े ही शांत और दृढ़ स्वर में उन छात्रों को चुनौती देती है। वह सवाल करती है कि क्या हिजाब पहनने से "न्यूरॉन्स" काम करना बंद कर देते हैं और क्या विज्ञान में ऐसा कोई प्रमाण है जो यह बताता हो कि कपड़ों का एक टुकड़ा सोचने की क्षमता को प्रभावित करता है। वह स्पष्ट करती है कि हिजाब उसकी आस्था का प्रतीक है और इसे पहनकर वह सुरक्षित और सहज महसूस करती है। आयशा के सवाल केवल उसके व्यक्तिगत अनुभव तक ही सीमित नहीं रहते, बल्कि वे समाज के सामने व्यापक प्रश्न उठाते हैं। वह पूछती है कि यदि एक महिला अपने चुने हुए परिधान में सहज महसूस करती है तो दूसरों को इसमें क्या समस्या होनी चाहिए। वह आज़ादी के सही अर्थ पर प्रकाश डालती है, जो न केवल अपनी पसंद को व्यक्त करने की स्वतंत्रता है, बल्कि दूसरों की पसंद का सम्मान करने की भी। वह इस बात पर जोर देती है कि लोगों को उनके कपड़ों के आधार पर नहीं, बल्कि उनके विचारों और गुणों के आधार पर आंका जाना चाहिए। आयशा के सवालों से कॉलेज के छात्र शर्मिंदा होते हैं और उसके प्रति उनका नज़रिया बदलता है। कुछ छात्र उससे माफ़ी भी माँगते हैं। आयशा का यह कार्य न केवल उसके आत्मविश्वास को दर्शाता है बल्कि यह भी साबित करता है कि अज्ञानता और पूर्वाग्रह को समझ और सम्मान से ही हराया जा सकता है। कहानी इस बात पर ज़ोर देती है कि आयशा एक मेधावी छात्रा थी और हिजाब उसकी बौद्धिक क्षमता या पहचान के आड़े कभी नहीं आया।

473 0