अति की भली न धूप

अति की भली न बरसना अति की भली न धूप |

Surabhi sharma
18 Apr, 2023 • 1 min read min read • hi
❤️ 1 💬 0 👁 1184
अति की भली न धूप

"कनक कनक ते सौ गुनी मादकता अधिकाय

वा पाए बौराए जग या खाए बौराए |"


विद्यार्थी जीवन में अलंकारों की परिभाषा समझते हुए ये दोहा पढ़ा था जो आजकल सोशल मीडिया के उपयोग पर बिल्कुल चरितार्थ होता दिखायी दे रहा है |


ऐसे तो अब सोशल मीडिया के उपयोग बिना एक पल की भी कल्पना थोड़ी मुश्किल सी है, पर कहते हैं न लत बहुत बुरी शय होती है |


विज्ञान जहां विकास को जन्म देता है वहीं दूसरी और अप्रत्यक्ष रूप से विनाश का भी कारक है |


इस डिजिटल युग ने मानव के भौतिक जीवन को जितना सहज सरल बनाया उतना ही उसे जटिल भी किया |


मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है पर सोशल मीडिया की उपलब्धता ने मनुष्यों की मनुष्यों पर निर्भरता बहुत हद तक कम कर दी है जिससे लोगों की एकाकी जीवन जीने में रुचि बढ़ती जा रही है |


सोशल मीडिया द्वारा भ्रामक प्रचार - प्रसार से भी बहुत तरह की गलत जानकारियां लोगों को कभी कभी दिशाहीन कर रही हैं |


लोग का रुझान गुणात्मक कलाओं में अब कम होता जा रहा है बस अब कैसे भी मोबाइल कैमरा, वीडियो और कुछ apps के प्रयोग कर क्षण भर में मशहूर हो जाने की इच्छा बलवती होती जा रही है |


सारी सुविधाएं ऑनलाइन उपलब्ध हो जाने के कारण मानवजनित सम्वेदना का विघटन हो रहा है |


शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य पर भी असर पड़ रहा है |


इसका सबसे बड़ा माइनस पॉइंट बच्चों के शारीरिक विकास को अवरुद्ध करना है, बच्चे अब विष - अमृत, पकडम पकड़ाई जैसे खेलों के नाम नहीं जानते गांव में भी बच्चों को पेड़ के झूले में कोई अभिरुचि नहीं सब बबल शूटर और 

       केन्डी क्रश सागा जैसे डिजिटल खेलों में व्यस्त हो चुके हैं. लूडो, केरम भी ऑनलाइन उपलब्ध हो चुके हैं |


युवा वर्ग पोर्न साइट, सट्टेबाजी और साइबर क्राइम के लपेट में आसानी से आ जा रहे हैं |


पर वहीं सोशल मीडिया के बहुत सारे फायदे भी हैं |


स्त्री वर्ग को सोशल - मीडिया का बहुत बड़ा लाभ मिला है, यहां तक की ग्रामीण क्षेत्र की स्त्रियां भी सोशल मीडिया का उपयोग कर खुद की आर्थिक आत्मनिर्भरता के साथ साथ अपनी पहचान भी बना रही हैं|


नयी - नयी जानकारी मिलती हैं देश - विदेश की खबरें क्षण भर में हमारी पहुंच में हो जाती हैं |


ऑनलाइन सामाजिक रिश्तों का दायरा बढ़ रहा है |


अपनी कला अपनी योग्यता को लोग इस माध्यम से वृहद तौर पर हस्तांतरित कर पा रहे हैं |


व्यवसाय को प्रोत्साहन मिल रहा है |साथ ही ऑनलाइन रोजगार भी उपलब्ध हो रहे हैं |


आज ये डिजिटल सुविधायें की ही विशेषता थी कि covid के दौरान घर में बंद रहते हुए भी लोगों की अनिवार्य आवश्यकताओं की पूर्ति हो जा रही थी, लोग पल पल चौकन्ने थे |


निष्कर्ष यही है कि कोई भी आविष्कार बुरे नहीं होते वो हमारे जीवन को सरल बनाने के लिए होते हैं पर हम उनका उपयोग किस तरह करते हैं ये उसकी गुणवत्ता को प्रभावित कर देते हैं |तो बस सोशल मीडिया का लाभकारी तरीके से उपयोग करें न कि उसे अपनी बुरी लत बना लें |


वो कबीरदास जी ने कहा है न कि - 


"अति की भली न बोलना, अति की भली न चुप

अति की भली न बरसना, अति की भली न धूप "


सुरभि शर्मा 

1 like
☕

Support Surabhi sharma

Appreciate this story? Send a small tip to encourage the author to write more great work!

Please login to tip the author.

Surabhi sharma
Published By

Surabhi sharma

@surabhisharma

Comments

Appreciate the author by telling what you feel about the post 💓

Please Login or Create a free account to comment.

★ Recommended For You

Stories tailored to your recent reading preferences

More stories in Social Media
Xleem • 01 Jul, 2026 • 1 min read min

Li3f

Just read it

99 1
More stories in Social Media
fazal Esaf • 02 Jun, 2025 • 1 min read min

एक मुस्लिम गरीब लड़के की कहानी जो पढ़ना चाहता है

यह कहानी रहीम नाम के एक गरीब और मेहनती मुस्लिम लड़के की है, जिसके जीवन में कम उम्र में ही मुश्किलों का पहाड़ टूट पड़ता है। जब वह सिर्फ तीन साल का था, तभी उसके अब्बा का इंतकाल हो जाता है, और घर की सारी ज़िम्मेदारी उसकी अम्मी, सकीना, पर आ जाती है। सकीना दूसरों के घरों में मेड का काम करती है, लेकिन उसकी कमाई इतनी कम होती है कि दो वक्त की रोटी भी मुश्किल से मिलती है, और रहीम को स्कूल भेजने का सपना अधूरा रह जाता है। इसके बावजूद, रहीम के अंदर पढ़ने की गहरी लगन है। उसकी आँखें ज्ञान की दुनिया को देखने का सपना देखती हैं और वह अपनी अम्मी को गरीबी और दूसरों के घरों में काम करने की मजबूरी से आज़ाद कराना चाहता है। अपनी इस इच्छा को पूरा करने के लिए, रहीम छोटी उम्र में ही काम करना शुरू कर देता है। वह शहर की एक छोटी सी परचून की दुकान पर दिन भर ईमानदारी और लगन से काम करता है। शाम होते ही, रहीम अपनी थकान को दरकिनार करते हुए पास के 'शाम के मदरसे' में पढ़ने चला जाता है, जहाँ गरीब बच्चों को मुफ्त शिक्षा दी जाती है। मदरसे से लौटने के बाद भी वह अपनी अम्मी की मदद करता है, घर के कामों में हाथ बँटाता है। रविवार का दिन उनके लिए खास होता है, जब रहीम अपनी अम्मी से अपने बड़े-बड़े सपने साझा करता है – खूब पढ़कर बड़ा आदमी बनना और अम्मी को आराम भरी ज़िंदगी देना। कहानी इस बात पर भी जोर देती है कि कैसे रहीम अपनी विपरीत परिस्थितियों के बावजूद अच्छी आदतों को बनाए रखता है। जहाँ उसके आस-पास के कई लड़के गरीबी से हार मानकर गलत रास्तों पर चले जाते हैं, वहीं रहीम न केवल खुद ईमानदार और नेक रहता है, बल्कि अपने दोस्तों और पड़ोस के लड़कों को भी पढ़ाई की अहमियत समझाता है और उन्हें सही रास्ता दिखाता है। वह उन्हें बताता है कि शिक्षा ही गरीबी से निकलने का एकमात्र ज़रिया है, न कि बुरे काम। यह कहानी मेहनत, लगन और नैतिक मूल्यों का एक सशक्त उदाहरण प्रस्तुत करती है, जो दर्शाती है कि दृढ़ इच्छाशक्ति और सही दिशा में प्रयास से कोई भी व्यक्ति अपनी मुश्किलों को पार कर सकता है।

883 0
More stories in Social Media
Smita Saksena • 17 Apr, 2023 • 1 min read min

सोशल मीडिया की प्रासंगिकता

सोशल मीडिया की प्रासंगिकता

914 1
Trending on Paperwiff
Rajesh Mohan V Rao • 03 Oct, 2026 • 1 min read min

Konkani

Our Konkani

15 0