माफ कर दो मां...

जगतजननी मां दुर्गा सब देखती हैं, उनकी आंखों से कोई नही बचा आज तक..

Sonnu Lamba
12 Jul, 2020 • 1 min read min read • hi
❤️ 2 💬 7 👁 867
#Life #Sprituality #Fiction #Goddess durga #Navratr #Prayers #Worship #Story
माफ कर दो मां...

Photo by Soumik Dey on Unsplash

वो छैनी हथौड़ा लिए रात दिन अपने काम में लगा था,पहले उसके बाप दादा ये मूर्ति बनाने का काम करते थे, वो भी उनके साथ लगा रहता था, तरह तरह की मूर्तियाँ, पत्थर को को काटकर चाहे जैसा आका रदे देते थे ,उसके पिता चाहते थे कि वो अपने पुश्तैनी काम को आगे बढाए ,लेकिन वो शहर चला गया, वहां जी भर अय्याशी करता, घर में कहता कि काम ढूंढ रहा हूं, लेकिन ये कब तक चलता, पिताजी चल बसे ,आखिर अब पैसे कौन देता, इसलिए गांव वापस लौट आया और अपना पुश्तैनी काम ही आगे बढाने की सोची ,काम कुछ खास मिल नही रहा था, इसलिए नवरात्र आने का इंतजार था कि उससे पहले मां की मूर्ति बनाने के कुछ आर्डर मिलेंगे, और मिला भी, तीन दिन पहले ही ये काम मिला मंदिर के लिए एक भव्य मूर्ति तैयार करनी थी ....।


इसलिए वो रात दिन काम कर रहा था तब जाकर मां की ये मूर्ति पूरी हुयी, कल तक तैयार करके देनी है, कल मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा होगी इसकी.. बस रंग करना बाकी है, लेकिन कल के भरोसे नही छोड़ा जा सकता अभी शुरू कर देता हूँ..! 

देखते देखते सुबह हो गयी, मूरत भी लगभग पूरी हुयी, चेहरा रहता है केवल... !


मां की आंखो पर रंग भरने के लिए जैसे ही उसने कूचि चलायी, मन घबराने लगा उसका , ऐसा लगा कि मां की आंखों में क्रोध उतर आया हो जैसे, वो डर के मारे थर थर कांपने लगा, बेहोश सा जमीन पर बैठ गया, 

 उसने अपनी अभी तक की जिंदगी में औरतो को कब , कितना और कहां कहां सताया था, रह रह कर हर मंजर उसे याद आने लगा..।

मां की आंखों से आंख मिलाने की उसकी हिम्मत ही नही हो रही थी, डर के मारे कूचि हाथ से छूटती जा रही थी, वो मन ही मन प्रार्थना करने लगा, मां. ..माफ कर दो, ये मूरत पूरी ना कर पाया तो परिवार भूखो मर जायेगा, उसकी आंख से आंसू बहते जा रहे थे, वो चुपचाप आंख बंद करके बैठा था, तभी एक पडोस की छोटी बच्ची का स्वर उसके कानो में पडा .."चाचाजी "

चाचाजी. .बैठे बैठे सो रहे हो...! 

लो चाय पीओ ..मां ने भिजवाई है. .!

मम्मी कह रही थी कि पूरी रात से आप काम कर रहे हो दुर्गा मां की मूर्ति देनी है, आज तैयार करके, मुझे भी दिखाओ कैसी बनी है...?


" बेटा... बस आंखो में अभी रंग नही हुआ. ."

"तो कर दीजिए.. मैं यहीं खडी हूं , देखकर ही जाऊंगी अब तो, फिर तो ये मूर्ति चली जायेगी, "

वो बच्ची की ओर एकटक देखता रहा, 

"बच्ची ने फिर कहा. .उठाइये कूचि, थोडा ही तो काम बचा है, "

उसने डरते डरते कूचि उठायी और धीरे धीरे मां की आंखों पर रंग करने लगा, बच्ची कुछ कुछ बोले जा रही थी और वो सोच रहा था... मां माफ तो कर दिया ना ,,मुझे.. "

तभी बच्ची ने तालियाँ बजायी ,हो गयी पूरी मूरत. ."

देखो, कितनी सुन्दर बनी है.. चाचाजी आपने तो कमाल कर दिया.. !

आंखे तो बहुत ही सुन्दर बनी हैं, देखिए तो एक बार ,चाचाजी, लड़की ने उसे झिंझोडा. .."

"हां हां बेटा. ..ये इसलिए सुंदर बनी हैं क्योंकि तू यहां खडी है, मेरे साथ...मां के सामने..! 

अब वो मां की आंखों में देख पा रहा था.. और बच्ची के सिर पर हाथ फेरता हुआ बडबडा रहा था, मां तेरी लीला अद्भुत है ..मां...!! 


 ©®sonnu Lamba 

2 likes
☕

Support Sonnu Lamba

Appreciate this story? Send a small tip to encourage the author to write more great work!

Please login to tip the author.

Sonnu Lamba
Published By

Sonnu Lamba

@sonnulamba

Comments

Appreciate the author by telling what you feel about the post 💓

  • Namrata Pandey · 6 years ago last edited 6 years ago

    Heart touching story

  • Kumar Sandeep · 6 years ago last edited 6 years ago

    हृदयस्पर्शी कथा! एक गूढ़ संदेश समेटे हुई है यह रचना।

  • Sonia Madaan · 6 years ago last edited 6 years ago

    Nice

  • Sonnu Lamba · 6 years ago last edited 6 years ago

    Thanks @sonia

  • Sonnu Lamba · 6 years ago last edited 6 years ago

    Thanks @sandeep

  • Sonnu Lamba · 6 years ago last edited 6 years ago

    Thanks @namrta pandey ji

  • Shubha Pathak · 5 years ago last edited 5 years ago

    बहुत खूब और प्रेरक???

Please Login or Create a free account to comment.

★ Recommended For You

Stories tailored to your recent reading preferences

More stories in Fiction
fazal Esaf • 05 Jul, 2025 • 1 min read min

"मदीना को लिखे गए ख़त"

हर जुमे की सुबह एक बूढ़ा आदमी अपने दिल के टुकड़े काग़ज़ पर रख देता था — मदीना के नाम।" ‘मदीना को लिखे गए ख़त’ एक रूहानी, मोहब्बत-भरी कहानी है, जो इबादत और इंतज़ार के धागों से बुनी गई है। गुलज़ार की नज़्मों की तरह नरम, और दिल को छू लेने वाली इस कहानी में, एक पोती अपने दादा के उन ख़ामोश ख़तों को पढ़ती है, जो मदीना को नहीं, बल्कि अल्लाह से की गई एक धीमी, टूटती बातचीत होते हैं। यह कहानी है उन अल्फ़ाज़ों की जो कभी भेजे नहीं जाते, उन दुआओं की जो जवाब नहीं मांगतीं—बस यकीन रखती हैं।

315 0
More stories in Fiction
fazal Esaf • 12 Jun, 2025 • 1 min read min

बिल के उस पार"

सफ़दर अली को लीवर संक्रमण के कारण आईसीयू में भर्ती हुए छह दिन हो चुके थे। उनकी पत्नी ज़ेबा, एक स्कूल टीचर, इलाज के ₹2,83,000 के भारी बिल को देखकर परेशान थी, क्योंकि डॉक्टरों ने अगले दिन तक आईसीयू का भुगतान करने या सफ़दर को जनरल वार्ड में शिफ़्ट करने के लिए कहा था। उसकी मासिक आय इस बिल का एक तिहाई भी नहीं थी। मदद के लिए, ज़ेबा ने सबसे पहले मस्जिद के इमाम साहब को फ़ोन किया, जिन्होंने चंदा इकट्ठा करने का आश्वासन दिया। फिर उसने स्कूल की प्रिंसिपल को कॉल किया, जिन्होंने व्हाट्सएप ग्रुप में मैसेज डालने की पेशकश की, लेकिन कोई आधिकारिक मदद नहीं की। उसकी आख़िरी उम्मीद वक़्फ़ बोर्ड की वेबसाइट भी बेकार साबित हुई। अगले दिन, सफ़दर की हालत बिगड़ने पर, डॉक्टर ने बताया कि लीवर ट्रांसप्लांट ज़रूरी है और इसका खर्च लगभग ₹18 लाख होगा। यह सुनकर ज़ेबा पूरी तरह टूट गई। उसे याद आया कि कैसे समाज के लोग दूसरों की मदद करने में उदासीन रहते हैं। कहानी इन सवालों के साथ समाप्त होती है कि क्या मस्जिदें और वक़्फ़ संपत्तियाँ वास्तव में ज़रूरतमंदों के लिए उपलब्ध हैं, क्या मुस्लिम समुदाय ने स्वास्थ्य आपात स्थितियों के लिए ठोस व्यवस्थाएँ की हैं, और क्या हम केवल प्रार्थनाओं तक ही सीमित रह गए हैं जब किसी को वास्तविक सहायता की आवश्यकता होती है। यह इस बात पर भी विचार करती है कि क्या समाज में किसी "ज़ेबा" को अकेला छोड़ दिया जाना चाहिए। यह कहानी एक महत्वपूर्ण प्रश्न उठाती है: "जब कोई बीमार होता है, क्या हम केवल संवेदना भेजते हैं, या समाधान भी?"

564 0
More stories in Fiction
fazal Esaf • 11 Jun, 2025 • 1 min read min

माफ़ी का मर्म

यह कहानी एक बुजुर्ग मुस्लिम इमाम हाजी यूसुफ़ साहब की है, जिनके बेटे की नृशंस हत्या पड़ोस में रहने वाले एक युवक ने कर दी। हत्या का कोई मजहबी या व्यक्तिगत कारण नहीं था — बस घृणा और ग़लतफहमी से उपजा हिंसक आवेग। पूरे मोहल्ले में शोक और ग़ुस्से का माहौल था। लेकिन जब अदालत में हाजी यूसुफ़ से यह पूछा गया कि वे क्या सज़ा चाहते हैं, तो उन्होंने हत्यारे को माफ कर दिया। उन्होंने कहा, "अगर मैं बदला लूंगा, तो मैं भी उसी घृणा में जीऊंगा जिसने मेरे बेटे की जान ली। लेकिन अगर मैं माफ कर दूं, तो शायद यह घृणा का अंत हो।" यह निर्णय सबको चौंका देता है — पड़ोसी, गैर-मुस्लिम मित्र, और समाज के वे लोग भी जो सोचते थे कि धर्म अलग करता है। इस माफ़ी ने लोगों को आत्म-चिंतन के लिए मजबूर कर दिया: जब ग़लती उसकी नहीं थी, तो वह फिर भी माफ कैसे कर सका? क्या हम दूसरों की गलतियों को इस तरह क्षमा कर सकते हैं? क्या हमारा धर्म, जाति, या पूर्वग्रह हमें मानवता से दूर कर रहे हैं? "माफ़ी का मर्म" सिर्फ एक कहानी नहीं, बल्कि आत्मा की गहराई से निकली इंसानियत की पुकार है — यह दिखाती है कि सच्ची शक्ति बंदूक में नहीं, माफ़ी में होती है।

561 0
More stories in Fiction
fazal Esaf • 06 Jun, 2025 • 1 min read min

माँ हूँ मैं – सलमा की कहानी"

"माँ हूँ मैं – सलमा की कहानी" यह कहानी एक जुझारू माँ सलमा बी की है, जो अपने निर्दोष बेटे रामिज को झूठे चोरी के आरोप से बचाने के लिए अकेले लड़ती है। बिना पैसे, बिना सहारे, लेकिन सच्चाई और ममता के बल पर वह गवाह ढूंढती है, सबूत इकट्ठा करती है और अंततः अपने बेटे को जेल से आज़ाद कराती है। यह कहानी हर माँ के हौसले और हर बेगुनाह की उम्मीद का प्रतीक है।

464 0