फौजी भाईयों के लिए पत्र

आर्मी डे पर सभी सैनिको के लिए ये पत्र..!

Sonnu Lamba
15 Jan, 2021 • 1 min read min read • hi
❤️ 0 💬 2 👁 2607
#Indian army #Armyday
फौजी भाईयों के लिए पत्र

Photo by Mitul Gajera on Unsplash

फौजी भाईयों, 

आपके बारे में और आपकी कठिन दिनचर्या के बारे में जितना सोचती हूं, उतना ही श्रद्धा से भर जाती हूं, आज मैं जब सात डिग्री तापमान में ये पत्र लिख रही हूं, तब सियाचीन में ड्यूटी दे रहे जवानों के बारे में सोचती हूं, तो सिंहर जाती हूं, आप लोग एक तरफ माइनस तापमान में अपनी ड्यूटी करते हो दूसरी ओर रेगिस्तान की सीमाओं पर गरमियों में तपते रेत पर पचास डिग्री तापमान में डयूटी देते हो।

सीमाओं पर ऐसी ही विसंगतियां हमेशा रहती है,कुछ लोग कहते हैं कि प्रशिक्षण से सब संभव है, हां, मानती हूं, लेकिन उससे पहले जज्बा होता है, जो करने या मरने को प्रेरित करता है, और कौन सी नौकरी ऐसी है जिसमें पहले ही ये बता दिया जाता हो कि आप जान भी गंवा सकते हैं या आपको हंसते हंसते शहीद भी होना होगा.. ।

यकीन मानिए, मुझे सीमा पर कोई युद्ध या उपद्रव इसलिए अच्छा नही लगता कि उसके बाद तिंरगे में लिपट लिपटकर जो शहीद, गांव, मौहल्ले, शहर तक आते हैं, उनके परिजनों के लिए मन बहुत रोता है, कि कैसे कोई स्वीकार करे कि उसके घर का एक जवान व्यक्ति यूं चला गया..।

ऐसा नही कि सैनिकों की शहादत पर गर्व नही होता, होता है कि वो अपनी जान पर खेल कर भी देश की रक्षा करते हैं और कोई भी बात, कोई भी रिश्ता उन्हें देश से ऊपर नहीं लगता, लेकिन मेरा साधारण स्त्री मन, मां, बहन, पत्नी के मन की कवायद भी करता है। 

इसलिए मैं चाहती हूं कि सभी फौजी भाई सुरक्षित रहें और अपनी सेवाओं से अपने जीते जी रिटायर हों, और पारिवारिक जीवन भी जीयें..। 

मेरे पिता फौज में थे, लेकिन जब मैने होश संभाला, वे रिटायर हो चुके थे, इसलिए फौज के प्रति लगाव और आदर जन्म से ही हैं, फिर मेरे पापा ने गांव आकर खेती की, और किसान बनकर हमें पाला, एक फौजी कुछ भी बन जाए लेकिन उसके जीवन में अनुशासन का महत्व वही रहता है, जो उसने फौज में सीखा होता है, इसलिए उनसे भी हमने बहुत कुछ जाना, समझा..। आप लोगो कि सुरक्षा और सलामती की कामना के साथ मैं ये पत्र बंद करती हूं,और अभी तक जो फौजी भाई शहीद हुए हैं, उनको नमन करती हूं, इन चार लाइनों के साथ. .!


है नमन उनको कि जो इस देह को अमरत्व देकर

इस जगत में शौर्य की जीवित कहानी हो गये हैं..!

है नमन उनको कि जिनके सामने बौना हिमालय

जो धरा पर गिर पड़े और आसमानी हो गये हैं..!

~कुमार विश्वास 

अपना ख्याल रखिए....आप बहुत महत्वपूर्ण हैं, राष्ट्र के लिए, हम सबके लिए..!! 

बहुत बहुत आदर के साथ आप सभी को प्रणाम..।। 

आपकी बहन सोनू ?

©®sonnu Lamba 



0 likes
☕

Support Sonnu Lamba

Appreciate this story? Send a small tip to encourage the author to write more great work!

Please login to tip the author.

Sonnu Lamba
Published By

Sonnu Lamba

@sonnulamba

Comments

Appreciate the author by telling what you feel about the post 💓

  • Kumar Sandeep · 5 years ago last edited 5 years ago

    भावपूर्ण पत्र

  • Sonnu Lamba · 5 years ago last edited 5 years ago

    Thank you @Kumar sandeep

Please Login or Create a free account to comment.

★ Recommended For You

Stories tailored to your recent reading preferences

More stories in Non-fiction
Saurabh Kumar Gautam • 09 Apr, 2026 • 1 min read min

नई दुर्गा

अन्याय के खिलाफ खड़े होने के लिए साहस जरूरी है, और रौशनी इसी साहस के कारण एक “नई दुर्गा” बनकर उभरती है।

203 0
More stories in Non-fiction
Adhiraj • 31 Oct, 2025 • 2 mins read min

कचरा

भेद भाव व असमानता अभी भी समाज को विभाजित किए हुए है | एक सत्य घटना पर आधारित लघु कहानी |

275 0
More stories in Non-fiction
fazal Esaf • 18 Jun, 2025 • 1 min read min

कहानी का शीर्षक: "मिट्टी के साथी"

"मिट्टी और मनुष्य" एक मार्मिक कहानी है जो शहरी जीवन की भागदौड़ और प्रकृति से अलगाव के बीच, मिट्टी और उसके सबसे छोटे जीवों — केंचुओं — के महत्व को दर्शाती है। कहानी फ़ज़ल एसाफ नाम के एक युवा, संस्कारी किसान के बेटे के इर्द-गिर्द घूमती है, जो अपनी गाँव की मिट्टी और उसके अनदेखे नायकों के प्रति गहरी समझ रखता है। कहानी की शुरुआत ठाणे के एक छोटे से कस्बे में बारिश के बाद की सुबह से होती है, जहाँ फ़ज़ल सड़क पर रेंगते केंचुओं को देखकर विचलित हो जाता है, क्योंकि लोग उन्हें बिना सोचे-समझे कुचल रहे हैं। वह एक केंचुए को उठाकर सुरक्षित स्थान पर रखता है और मन ही मन बुदबुदाता है कि लोग इस "कीड़े" की अहमियत नहीं समझते, जबकि यही उनकी "रोटियों" से जुड़ा है। आगे चलकर, फ़ज़ल का सामना तीन अलग-अलग राहगीरों से होता है: एक तेज़-तर्रार कॉर्पोरेट महिला, अदिति मैडम; एक अनुभवी बुज़ुर्ग, शास्त्री जी; और एक नन्हा लड़का, आर्यन। सबसे पहले, अदिति मैडम अनजाने में एक केंचुए को कुचल देती हैं। फ़ज़ल उन्हें रोकता है और विनम्रता से समझाता है कि यह "कीड़ा" नहीं, बल्कि "किसान का दोस्त" है जो मिट्टी को साँस देता है और ज़मीन को उपजाऊ बनाता है। अदिति शुरुआत में झिझकती हैं, लेकिन फ़ज़ल के शब्दों में छिपी सच्चाई उन्हें सोचने पर मजबूर कर देती है। इसके बाद, शास्त्री जी फ़ज़ल की बात का समर्थन करते हैं और अपने पुराने दिनों को याद करते हैं जब केंचुए को खेत में देखना अच्छी फसल का संकेत माना जाता था। वे आधुनिक समाज में मिट्टी से बढ़ती दूरी पर चिंता व्यक्त करते हैं। फ़ज़ल उन्हें समझाता है कि लोग मिट्टी को गंदगी समझते हैं, जबकि वही "गंदगी" उनकी थाली में गेहूं बनकर आती है, और केंचुए ही बिना किसी स्वार्थ के ज़मीन को जोतते हैं। कहानी में एक मार्मिक मोड़ तब आता है जब आर्यन, एक छोटा लड़का, केंचुए को "साँप जैसा कुछ" समझता है। फ़ज़ल धैर्य से उसे बताता है कि यह एक अर्थवर्म है जो मिट्टी को अंदर से जोतता है, हवा, पानी और बीज को पनपने में मदद करता है। वह आर्यन को समझाता है कि वह जो सब्ज़ियाँ खाता है, वे कहीं न कहीं केंचुए के कारण ही उगती हैं, जिससे आर्यन केंचुए को अपना दोस्त समझने लगता है। आर्यन की माँ भी इस छोटे लेकिन गहरे सबक के लिए फ़ज़ल को धन्यवाद देती हैं। एक छोटी सभा में, फ़ज़ल अदिति, शास्त्री जी और आर्यन को संबोधित करते हुए कहते हैं कि भले ही वे शहर में रहते हों और वह गाँव से हो, लेकिन "मिट्टी" ही वह धागा है जो उन सबको जोड़ता है। वह शहरी लोगों से मिट्टी के प्रति संवेदना रखने और छोटे जीवों को बचाने की अपील करता है। शास्त्री जी भावुक होकर कहते हैं कि जो समाज ज़मीन से रिश्ता तोड़ता है, वह रिश्तों की अहमियत भी भूल जाता है। कहानी का चरमोत्कर्ष तब आता है जब फ़ज़ल अपने झोले से एक मुट्ठी मिट्टी उठाता है जिसमें एक केंचुआ रेंग रहा होता है। वह भावनात्मक स्वर में समझाता है कि यह मिट्टी केवल मिट्टी नहीं, बल्कि "जीवन" है, जिसमें "मेहनत" और "उम्मीद" है। वह चेतावनी देता है कि जिस दिन केंचुए कम हुए, उस दिन रोटी भी महंगी हो जाएगी, मिट्टी बंजर हो जाएगी, और दिल भी। यह सुनकर आर्यन अब हर केंचुए को ध्यान से देखता है और वादा करता है कि वह उन्हें कुचलेगा नहीं। कहानी एक शक्तिशाली मोनोलॉग के साथ समाप्त होती है, जिसमें फ़ज़ल की आवाज़ बताती है कि शहर भले ही चमकता हो, लेकिन उसकी नींव वही मिट्टी है जो गाँवों में साँस लेती है। वह जोर देता है कि अगर हम मिट्टी को मारते रहेंगे, तो हम भी धीरे-धीरे मरेंगे, "बिना आवाज़ के, बिना मिट्टी के।" अंतिम पंक्तियाँ एक काव्यात्मक संदेश देती हैं: "जो रेंगता है ज़मीन पर, वो थामे है आसमान को। न कुचलिए उसे, क्योंकि वो पालता है हमें… चुपचाप।" संदेश: यह पटकथा एक सरल लेकिन गहन संदेश देती है: "ज़मीन पर चलिए, मगर ज़मीन को समझकर चलिए। क्योंकि वहीं से जीवन उगता है।" यह कहानी हमें प्रकृति के सबसे छोटे सदस्यों के महत्व को पहचानने और उसके साथ हमारे संबंध को फिर से स्थापित करने के लिए प्रेरित करती है।

365 0
More stories in Non-fiction
fazal Esaf • 02 Jun, 2025 • 1 min read min

गांव और इंसाफ़

यह कहानी पंडित रामलाल और उनकी पत्नी सीता देवी की है, जो एक ऐसे गाँव में रहते हैं जहाँ हिंदू और मुस्लिम समुदाय सदियों से शांति और सौहार्द से रह रहे थे। एक दिन, देश के किसी दूसरे हिस्से में हुए एक आतंकवादी हमले के बाद, गाँव का माहौल बिगड़ जाता है। कुछ कट्टरपंथी ग्रामीण गुस्से में आकर गाँव के मुस्लिम परिवारों को धमकाने लगते हैं और उन्हें अपने घर खाली करने का आदेश देते हैं, उन पर आतंकवादी होने का आरोप लगाते हैं। गाँव के मुस्लिम परिवारों में से एक, सलमा बेगम और उनके परिवार को विशेष रूप से निशाना बनाया जाता है। जब भीड़ उन्हें उनके घर से निकालने की कोशिश करती है, तो पंडित रामलाल और सीता देवी उनके बचाव में आगे आते हैं। पंडित रामलाल भीड़ से सवाल करते हैं कि क्या किसी एक व्यक्ति के गलत काम के लिए पूरे समुदाय को दोषी ठहराना सही है। वह तर्क देते हैं कि अगर ऐसा होता है, तो हिंदुओं द्वारा किए गए बुरे कामों के लिए पूरे हिंदू समुदाय को भी दोषी ठहराया जाना चाहिए। उनकी पत्नी, सीता देवी, भी अपनी बात रखती हैं और सलमा बेगम के गाँव के प्रति योगदान और मदद को याद दिलाती हैं। वे दोनों स्पष्ट करते हैं कि आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता; आतंकवादी सिर्फ़ मानवता के दुश्मन होते हैं। वे गाँव वालों को समझाते हैं कि उन्हें आपस में नफ़रत फैलाने के बजाय ऐसे बुरे लोगों का मिलकर विरोध करना चाहिए। पंडित रामलाल और सीता देवी की बुद्धिमान और दृढ़ बातों का गाँव के लोगों पर गहरा असर होता है। उन्हें अपनी गलती का एहसास होता है और भीड़ शांत हो जाती है। इस घटना से गाँव वालों को यह महत्वपूर्ण सबक मिलता है कि किसी एक व्यक्ति के कृत्य के लिए पूरे समुदाय को दोषी ठहराना अन्याय है और धर्म के नाम पर नफ़रत फैलाना गलत है। यह कहानी सच्ची इंसानियत, समझदारी और मुश्किल समय में एक-दूसरे का साथ देने के महत्व को दर्शाती है।

463 0