कायर नहीं हो तुम

उदासी के समन्दर में डूबती एक बेटी को पार लगाने की कहानी...

Seema sharma Srijita
16 Dec, 2020 • 1 min read min read • hi
❤️ 0 💬 0 👁 752
कायर नहीं हो तुम

Photo by Bence Halmosi on Unsplash

"कायर नहीं हो तुम, बहादुर है मेरी बेटी, याद नहीं मौहल्ले में बचपन में कोई हाथ भी लगा देता था तो कैसे उसके हाथ पैर तोड़ कर आ जाया करती थी |आज कहां गई तुम्हारी निडरता और निर्भीकता |बेचारी बनकर आ गई हो हमारे सामने, जबाब नहीं दिया गया तुमसे |जो हाथ तुम्हारी बिना गलती के तुम पर उठा वो तोडा़ नहीं गया तुमसे |" निरूपा जी रोती हुई संजना से चिल्लाकर कहती हैं |संजना की शादी को अभी 6 महीने ही हुये हैं |दहेज के लालची ससुराल वाले उसे किसी न किसी चीज को मायके से ले आने के लिए दबाब बनाते रहते हैं और मना करती है तो हाथ छोड़ देते हैं |कई बार सहन करने के बाद जब आज उसकी सहनशक्ति टूट गई तो चली आई रोती हुई अपने मम्मी पापा के पास और बता दी अपने ससुराल की सच्चाई |बडे़ अरमानों से अपनी औकात से ज्यादा धन दौलत खर्च कर अच्छे परिवार में शादी की थी संजना की मगर बाहर चमचमाती रोशनी के पीछे इतना गहन अंधेरा होगा, कभी सोचा नहीं था निरूपा जी और महेश जी ने |

"ये क्या सिखा रही हो बहुरिया लड़की को, ससुराल वालों के साथ बराबरी करेगी, मुंहतोड़ जबाब देगी |हर घर में होता है ऐसा नई उमर में अक्सर तहश में लड़के छोड़ जाते हैं हाथ, फिर पति है वो इसका इतना अधिकार तो बनता है उसका |लड़की को समझा बुझाकर ससुराल भेजने की बजाय तु तो उसे भड़काने में लगी है |दिमाग खराब हो गया है तेरा |लड़कियों को परिवार की शान्ति के लिए झुकना ही पड़ता है यही होता आया है सदियों से क्या तुने नहीं किया या मैंने नहीं किया | उसी घर में रहना है इसे महेश जा समझा बुझा कर छोड़ आ और कह दे लड़की से इतनी छोटी -2 बातों पर मायके ना आया करे थोडा़ सहन करना सीखे |"दादी के मुंह से निकला एक एक शब्द संजना के दिल को तार तार कर रहा था और उसकी आंखों से अविरल धारा बह रही थी |

क्यों मां अभी पिछले हफ्ते जब विमल मौहल्ले के कुछ लड़कों से पिटकर आ गया था वो भी बिना गलती के तो आप उसे खाये जा रही थी, आपकी नाक कट रही थी |आपके खानदान में कोई लड़का ऐसे चुपचाप पिट कर नहीं आया कहीं पीट भले ही आया हो |आप उसे कायर कह रही थी |न जाने कितनी बातें सुना रही थी |विमल और संजना दोनों ही हमारे बच्चे हैं तो दोनों में इतना भेदभाव क्यों |संजना क्यों पिटकर आयेगी |संजना क्यों झुकेगी |अगर संजना कुछ गलत कर रही है तो उसके सास ससुर और पति को पूरा अधिकार है उसे डांटकर सही रास्ते पर लाना लेकिन संजना ने तो कुछ किया नहीं फिर उनकी बेबुनियाद मांगें ना पूरी करने के लिए वो क्यों मार खाये |जैसा आप मेरे बेटे को कायर न बनने की सीख दे रही थी उसी तरह मेरी बेटी को भी दीजिए |अबला नारी की तरह बन्द कमरे में आँसू बहाने की नहीं |" महेश जी ने अपनी मां से कहा तो वो चुपचाप करम पर हाथ रखकर बैठ गई फिर महेश जी ने संजना का हाथ पकड़ा और बोले -

" चलो संजना मेरे साथ उन लोगों के नाम पुलिस कंप्लेन करनी है |कोई जरूरत नहीं है ऐसे लालची लोगों के साथ रहने की और ये रिश्ता ढोने की अगर वो तुम्हे दिल से नहीं अपना पाये |"

"नहीं पापा अभी नहीं ,अभी मैं जा रही हूँ अपने घर अगर जरूरत पडी़ तो आपको कॉल करूंगी |आप दोनों जैसे मां बाप अगर हर बेटी को मिलें तो कोई भी लड़की दहेज की बलि न चढे़ और नाहीं घुट घुट कर जीये |सच कहा मां आपने आपकी बेटी कायर नहीं है अपने ऊपर उठने वाले हर हाथ को मरोड़ने का जज्बा रखती है |"

संजना ने अपना बैग उठाया और चल दी ससुराल अबला नारी नहीं एक शेरनी का तरह |

निरूपा जी और महेश जी की समझदारी और प्रोत्साहन ने संजना को हिम्मत दी और गहरे समन्दर में डूब रही अपनी बेटी को तैरने के गुण सिखा दिये और विश्वास भी दिलाया कि उसके माता पिता हमेशा उसके साथ हैं उन्होनें अपनी बेटी को विदा किया है अलविदा नहीं |

नई सोच के साथ मेरी नई कहानी...... उम्मीद है आपको पसन्द आयेगी |

धन्यवाद |

सीमा शर्मा "सृजिता "

0 likes
☕

Support Seema sharma Srijita

Appreciate this story? Send a small tip to encourage the author to write more great work!

Please login to tip the author.

Seema sharma Srijita
Published By

Seema sharma Srijita

@seemasharmapathak

Comments

Appreciate the author by telling what you feel about the post 💓

Please Login or Create a free account to comment.

★ Recommended For You

Stories tailored to your recent reading preferences

More stories in Fiction
fazal Esaf • 12 Jun, 2025 • 1 min read min

बिल के उस पार"

सफ़दर अली को लीवर संक्रमण के कारण आईसीयू में भर्ती हुए छह दिन हो चुके थे। उनकी पत्नी ज़ेबा, एक स्कूल टीचर, इलाज के ₹2,83,000 के भारी बिल को देखकर परेशान थी, क्योंकि डॉक्टरों ने अगले दिन तक आईसीयू का भुगतान करने या सफ़दर को जनरल वार्ड में शिफ़्ट करने के लिए कहा था। उसकी मासिक आय इस बिल का एक तिहाई भी नहीं थी। मदद के लिए, ज़ेबा ने सबसे पहले मस्जिद के इमाम साहब को फ़ोन किया, जिन्होंने चंदा इकट्ठा करने का आश्वासन दिया। फिर उसने स्कूल की प्रिंसिपल को कॉल किया, जिन्होंने व्हाट्सएप ग्रुप में मैसेज डालने की पेशकश की, लेकिन कोई आधिकारिक मदद नहीं की। उसकी आख़िरी उम्मीद वक़्फ़ बोर्ड की वेबसाइट भी बेकार साबित हुई। अगले दिन, सफ़दर की हालत बिगड़ने पर, डॉक्टर ने बताया कि लीवर ट्रांसप्लांट ज़रूरी है और इसका खर्च लगभग ₹18 लाख होगा। यह सुनकर ज़ेबा पूरी तरह टूट गई। उसे याद आया कि कैसे समाज के लोग दूसरों की मदद करने में उदासीन रहते हैं। कहानी इन सवालों के साथ समाप्त होती है कि क्या मस्जिदें और वक़्फ़ संपत्तियाँ वास्तव में ज़रूरतमंदों के लिए उपलब्ध हैं, क्या मुस्लिम समुदाय ने स्वास्थ्य आपात स्थितियों के लिए ठोस व्यवस्थाएँ की हैं, और क्या हम केवल प्रार्थनाओं तक ही सीमित रह गए हैं जब किसी को वास्तविक सहायता की आवश्यकता होती है। यह इस बात पर भी विचार करती है कि क्या समाज में किसी "ज़ेबा" को अकेला छोड़ दिया जाना चाहिए। यह कहानी एक महत्वपूर्ण प्रश्न उठाती है: "जब कोई बीमार होता है, क्या हम केवल संवेदना भेजते हैं, या समाधान भी?"

564 0
More stories in Fiction
fazal Esaf • 11 Jun, 2025 • 1 min read min

माफ़ी का मर्म

यह कहानी एक बुजुर्ग मुस्लिम इमाम हाजी यूसुफ़ साहब की है, जिनके बेटे की नृशंस हत्या पड़ोस में रहने वाले एक युवक ने कर दी। हत्या का कोई मजहबी या व्यक्तिगत कारण नहीं था — बस घृणा और ग़लतफहमी से उपजा हिंसक आवेग। पूरे मोहल्ले में शोक और ग़ुस्से का माहौल था। लेकिन जब अदालत में हाजी यूसुफ़ से यह पूछा गया कि वे क्या सज़ा चाहते हैं, तो उन्होंने हत्यारे को माफ कर दिया। उन्होंने कहा, "अगर मैं बदला लूंगा, तो मैं भी उसी घृणा में जीऊंगा जिसने मेरे बेटे की जान ली। लेकिन अगर मैं माफ कर दूं, तो शायद यह घृणा का अंत हो।" यह निर्णय सबको चौंका देता है — पड़ोसी, गैर-मुस्लिम मित्र, और समाज के वे लोग भी जो सोचते थे कि धर्म अलग करता है। इस माफ़ी ने लोगों को आत्म-चिंतन के लिए मजबूर कर दिया: जब ग़लती उसकी नहीं थी, तो वह फिर भी माफ कैसे कर सका? क्या हम दूसरों की गलतियों को इस तरह क्षमा कर सकते हैं? क्या हमारा धर्म, जाति, या पूर्वग्रह हमें मानवता से दूर कर रहे हैं? "माफ़ी का मर्म" सिर्फ एक कहानी नहीं, बल्कि आत्मा की गहराई से निकली इंसानियत की पुकार है — यह दिखाती है कि सच्ची शक्ति बंदूक में नहीं, माफ़ी में होती है।

562 0
More stories in Fiction
fazal Esaf • 06 Jun, 2025 • 1 min read min

माँ हूँ मैं – सलमा की कहानी"

"माँ हूँ मैं – सलमा की कहानी" यह कहानी एक जुझारू माँ सलमा बी की है, जो अपने निर्दोष बेटे रामिज को झूठे चोरी के आरोप से बचाने के लिए अकेले लड़ती है। बिना पैसे, बिना सहारे, लेकिन सच्चाई और ममता के बल पर वह गवाह ढूंढती है, सबूत इकट्ठा करती है और अंततः अपने बेटे को जेल से आज़ाद कराती है। यह कहानी हर माँ के हौसले और हर बेगुनाह की उम्मीद का प्रतीक है।

464 0
More stories in Fiction
Frances Jean Albino • 18 Jul, 2024 • 1 min read min

Someone once hurt me, but I choose to forgive

Choosing to forgive

1004 0