नई दुर्गा

अन्याय के खिलाफ खड़े होने के लिए साहस जरूरी है, और रौशनी इसी साहस के कारण एक “नई दुर्गा” बनकर उभरती है।

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Saurabh Kumar Gautam
Saurabh Kumar Gautam 09 Apr, 2026 | 1 min read

रौशनी हमारी कक्षा की सबसे दबंग छात्राओं में से थी। पढ़ने में अच्छी थी, प्रथम तो नहीं आती थी लेकिन पहले चार-पांच बच्चों में जरूर रहती थी। पर उसका असली हुनर खेलकूद और भाषण- निबंध जैसी प्रतियोगिताओं में निखर कर सामने आता था । 200 मीटर दौड़ में राष्ट्रीय स्तर पर भाग लेकर आई थी । भाषण प्रतियोगिताओं में भी उसके प्रभावशाली और ओजपूर्ण भाषणों को कई बार सुना था मैंने प्रशंसा और ईर्ष्या के मिले-जुले मनोभावों के साथ ।

पढ़ाई के बाद भी निरंतर किसी न किसी प्रतियोगिता की तैयारी के कारण वह छुट्टी के नियत समय से देर ही घर जाती थी । सुबह भी स्कूल सबसे पहले आने वालों में रौशनी होती थी ।मुझे कभी-कभी लगता था उसे घर जाना पसंद ही नहीं। अगर उसे कोई कारण मिल जाता जिससे वह पूरी शाम स्कूल में रह पाती तो शायद वह घर सिर्फ सोने जाती।

उसकी उपस्थिति भी निरंतर थी। सभी दोस्तों में यह मजाक प्रचलित था की रोशनी का जन्म स्कूल जाने के लिए ही हुआ है । बचपन में सभी का बीमारी, शादी- विवाह, तीज- त्यौहार किसी न किसी कारण से स्कूल एकाध दिन छूटता ही है। पर रौशनी का नहीं ।शत प्रतिशत उपस्थिति के कितने ही प्रमाण पत्र उसके पास पड़े थे और उसे जैसे यह कोई उपलब्धि भी नहीं लगती थी।

हम आठवीं में पहुंच गए थे रोशनी अपनी सहपाठियों में दूर से ही दिख जाती थी । लड़कियों सुलभ कोमलता की जगह उसका बदन गठीला था । उसकी चाल ढाल बहुत कुछ मर्दाना दिखती थी । बाल लंबे थे परंतु उन्हें कसकर बांधे रखा जाता था। चेहरा लंबा था आंखें बड़ी-बड़ी और हमेशा जैसे गुस्से में रहती थी ।

उस रोज मैं स्कूल नहीं आया था घर के किसी काम से। किस काम से यह याद नहीं पर इतना याद है की रौशनी के घर के बाहर दुकान से कुछ सामान लेने गया था जब घर के अंदर से किसी महिला के चीखने और रोने की आवाज़ आ रही थी । शायद झगड़ा और मारपीट हो रही हो। असमंजस में की क्या करना सही होगा मैंने दरवाजे को खटखटाया। कोई जवाब नहीं ।

कुछ समझ नहीं आ रहा था ,क्या करूं ? दौड़ता हुआ स्कूल पहुंचा। रोशनी कक्षा में ही थी ।उसे बुलाया और उसके कान में मैंने सारी बातें कह दीं । वह रुकी नहीं दौड़ पड़ी। उसके पीछे मैं भी दौड़ा। लेकिन उससे काफी पीछे रह गया था । रास्ते में उसने लकड़ी का एक मोटा सा टुकड़ा कहीं से उठा लिया।

यह क्या करने वाली है? जब हम घर पहुंचे तब तक शांति थी कोई आवाज नहीं आ रही थी दरवाजा खुला था। रौशनी घर के अंदर चली गई और दरवाजा बंद कर दिया । कुछ पल बाद चिल्लाने की आवाज़ फिर से आने लगी । इस बार कोई मर्द चीख रहा था । शायद! शायद नहीं निश्चित ही उसके पापा थे। मैंने वहां से चले जाना ही ठीक समझा । इस मामले में मैंने फिर कोई पूछताछ नहीं की।

दो साल बीत गए हम दसवीं की परीक्षा पास कर गए थे। परिणाम का प्रमाण पत्र लेने जब पहुंचा, रौशनी भी आई हुई थी। मुझे देखकर मुस्कुराई तो मैं भी मुस्कुरा दिया। उसने अपनी जानी पहचानी आवाज में कहा , "थैंक यू" मैंने पूछा

"किस लिए?" "उस दिन की बातें स्कूल में किसी से न कहने के लिए।"

"अच्छा उस दिन की! वैसे सच बताओ उस दिन हुआ क्या था ?"

"पापा मम्मी को अक्सर मारते रहते थे, खासकर जब शराब पी लेते थे । ये घटनाएं ज्यादातर रात में होती थी पर उस रोज वह दिन में ही शुरू हो गए थे। तुमने जब बताया तो मेरे दिल में बस इतना आया कि अब बहुत हो गया घर पहुंची तो मम्मी पलंग पर पड़ी रो रही थीं । पापा वहीं आंगन में बैठे थे । रास्ते से मैंने एक लकड़ी का टुकड़ा उठा लिया था शायद तुमने देखा हो। उनके पैरों पर वह टुकड़ा मैंने दे मारा । फिर पता नहीं कहां-कहां मारा ।मैं पागलों की तरह हाथ चला रही थी । रुकी नहीं जब तक थक नहीं गई । "

मैं उसे आश्चर्य से देख रहा था । उसके चुप हो जाने पर अनायास ही मुंह से निकल गया , "फिर ?"

"फिर क्या! उसके बाद उन्होंने फिर कभी मम्मी पर हाथ नहीं उठाया । मुझे लोग भला- बुरा कह सकते हैं ,पर मुझे कोई अफसोस नहीं ।"

मैं इस नई दुर्गा को देखकर हैरत में था।

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