नई दुर्गा

अन्याय के खिलाफ खड़े होने के लिए साहस जरूरी है, और रौशनी इसी साहस के कारण एक “नई दुर्गा” बनकर उभरती है।

Saurabh Kumar Gautam
09 Apr, 2026 • 1 min read min read • hi
❤️ 0 💬 1 👁 203
नई दुर्गा

अपनों के खिलाफ भी हिम्मत दिखनी पड़ती है!

रौशनी हमारी कक्षा की सबसे दबंग छात्राओं में से थी। पढ़ने में अच्छी थी, प्रथम तो नहीं आती थी लेकिन पहले चार-पांच बच्चों में जरूर रहती थी। पर उसका असली हुनर खेलकूद और भाषण- निबंध जैसी प्रतियोगिताओं में निखर कर सामने आता था । 200 मीटर दौड़ में राष्ट्रीय स्तर पर भाग लेकर आई थी । भाषण प्रतियोगिताओं में भी उसके प्रभावशाली और ओजपूर्ण भाषणों को कई बार सुना था मैंने प्रशंसा और ईर्ष्या के मिले-जुले मनोभावों के साथ ।

पढ़ाई के बाद भी निरंतर किसी न किसी प्रतियोगिता की तैयारी के कारण वह छुट्टी के नियत समय से देर ही घर जाती थी । सुबह भी स्कूल सबसे पहले आने वालों में रौशनी होती थी ।मुझे कभी-कभी लगता था उसे घर जाना पसंद ही नहीं। अगर उसे कोई कारण मिल जाता जिससे वह पूरी शाम स्कूल में रह पाती तो शायद वह घर सिर्फ सोने जाती।

उसकी उपस्थिति भी निरंतर थी। सभी दोस्तों में यह मजाक प्रचलित था की रोशनी का जन्म स्कूल जाने के लिए ही हुआ है । बचपन में सभी का बीमारी, शादी- विवाह, तीज- त्यौहार किसी न किसी कारण से स्कूल एकाध दिन छूटता ही है। पर रौशनी का नहीं ।शत प्रतिशत उपस्थिति के कितने ही प्रमाण पत्र उसके पास पड़े थे और उसे जैसे यह कोई उपलब्धि भी नहीं लगती थी।

हम आठवीं में पहुंच गए थे रोशनी अपनी सहपाठियों में दूर से ही दिख जाती थी । लड़कियों सुलभ कोमलता की जगह उसका बदन गठीला था । उसकी चाल ढाल बहुत कुछ मर्दाना दिखती थी । बाल लंबे थे परंतु उन्हें कसकर बांधे रखा जाता था। चेहरा लंबा था आंखें बड़ी-बड़ी और हमेशा जैसे गुस्से में रहती थी ।

उस रोज मैं स्कूल नहीं आया था घर के किसी काम से। किस काम से यह याद नहीं पर इतना याद है की रौशनी के घर के बाहर दुकान से कुछ सामान लेने गया था जब घर के अंदर से किसी महिला के चीखने और रोने की आवाज़ आ रही थी । शायद झगड़ा और मारपीट हो रही हो। असमंजस में की क्या करना सही होगा मैंने दरवाजे को खटखटाया। कोई जवाब नहीं ।

कुछ समझ नहीं आ रहा था ,क्या करूं ? दौड़ता हुआ स्कूल पहुंचा। रोशनी कक्षा में ही थी ।उसे बुलाया और उसके कान में मैंने सारी बातें कह दीं । वह रुकी नहीं दौड़ पड़ी। उसके पीछे मैं भी दौड़ा। लेकिन उससे काफी पीछे रह गया था । रास्ते में उसने लकड़ी का एक मोटा सा टुकड़ा कहीं से उठा लिया।

यह क्या करने वाली है? जब हम घर पहुंचे तब तक शांति थी कोई आवाज नहीं आ रही थी दरवाजा खुला था। रौशनी घर के अंदर चली गई और दरवाजा बंद कर दिया । कुछ पल बाद चिल्लाने की आवाज़ फिर से आने लगी । इस बार कोई मर्द चीख रहा था । शायद! शायद नहीं निश्चित ही उसके पापा थे। मैंने वहां से चले जाना ही ठीक समझा । इस मामले में मैंने फिर कोई पूछताछ नहीं की।

दो साल बीत गए हम दसवीं की परीक्षा पास कर गए थे। परिणाम का प्रमाण पत्र लेने जब पहुंचा, रौशनी भी आई हुई थी। मुझे देखकर मुस्कुराई तो मैं भी मुस्कुरा दिया। उसने अपनी जानी पहचानी आवाज में कहा , "थैंक यू" मैंने पूछा

"किस लिए?" "उस दिन की बातें स्कूल में किसी से न कहने के लिए।"

"अच्छा उस दिन की! वैसे सच बताओ उस दिन हुआ क्या था ?"

"पापा मम्मी को अक्सर मारते रहते थे, खासकर जब शराब पी लेते थे । ये घटनाएं ज्यादातर रात में होती थी पर उस रोज वह दिन में ही शुरू हो गए थे। तुमने जब बताया तो मेरे दिल में बस इतना आया कि अब बहुत हो गया घर पहुंची तो मम्मी पलंग पर पड़ी रो रही थीं । पापा वहीं आंगन में बैठे थे । रास्ते से मैंने एक लकड़ी का टुकड़ा उठा लिया था शायद तुमने देखा हो। उनके पैरों पर वह टुकड़ा मैंने दे मारा । फिर पता नहीं कहां-कहां मारा ।मैं पागलों की तरह हाथ चला रही थी । रुकी नहीं जब तक थक नहीं गई । "

मैं उसे आश्चर्य से देख रहा था । उसके चुप हो जाने पर अनायास ही मुंह से निकल गया , "फिर ?"

"फिर क्या! उसके बाद उन्होंने फिर कभी मम्मी पर हाथ नहीं उठाया । मुझे लोग भला- बुरा कह सकते हैं ,पर मुझे कोई अफसोस नहीं ।"

मैं इस नई दुर्गा को देखकर हैरत में था।

0 likes
☕

Support Saurabh Kumar Gautam

Appreciate this story? Send a small tip to encourage the author to write more great work!

Please login to tip the author.

Saurabh Kumar Gautam
Published By

Saurabh Kumar Gautam

@saurabhkumargautam

Comments

Appreciate the author by telling what you feel about the post 💓

Please Login or Create a free account to comment.

★ Recommended For You

Stories tailored to your recent reading preferences

More stories in Non-fiction
Adhiraj • 31 Oct, 2025 • 2 mins read min

कचरा

भेद भाव व असमानता अभी भी समाज को विभाजित किए हुए है | एक सत्य घटना पर आधारित लघु कहानी |

275 0
More stories in Non-fiction
fazal Esaf • 18 Jun, 2025 • 1 min read min

कहानी का शीर्षक: "मिट्टी के साथी"

"मिट्टी और मनुष्य" एक मार्मिक कहानी है जो शहरी जीवन की भागदौड़ और प्रकृति से अलगाव के बीच, मिट्टी और उसके सबसे छोटे जीवों — केंचुओं — के महत्व को दर्शाती है। कहानी फ़ज़ल एसाफ नाम के एक युवा, संस्कारी किसान के बेटे के इर्द-गिर्द घूमती है, जो अपनी गाँव की मिट्टी और उसके अनदेखे नायकों के प्रति गहरी समझ रखता है। कहानी की शुरुआत ठाणे के एक छोटे से कस्बे में बारिश के बाद की सुबह से होती है, जहाँ फ़ज़ल सड़क पर रेंगते केंचुओं को देखकर विचलित हो जाता है, क्योंकि लोग उन्हें बिना सोचे-समझे कुचल रहे हैं। वह एक केंचुए को उठाकर सुरक्षित स्थान पर रखता है और मन ही मन बुदबुदाता है कि लोग इस "कीड़े" की अहमियत नहीं समझते, जबकि यही उनकी "रोटियों" से जुड़ा है। आगे चलकर, फ़ज़ल का सामना तीन अलग-अलग राहगीरों से होता है: एक तेज़-तर्रार कॉर्पोरेट महिला, अदिति मैडम; एक अनुभवी बुज़ुर्ग, शास्त्री जी; और एक नन्हा लड़का, आर्यन। सबसे पहले, अदिति मैडम अनजाने में एक केंचुए को कुचल देती हैं। फ़ज़ल उन्हें रोकता है और विनम्रता से समझाता है कि यह "कीड़ा" नहीं, बल्कि "किसान का दोस्त" है जो मिट्टी को साँस देता है और ज़मीन को उपजाऊ बनाता है। अदिति शुरुआत में झिझकती हैं, लेकिन फ़ज़ल के शब्दों में छिपी सच्चाई उन्हें सोचने पर मजबूर कर देती है। इसके बाद, शास्त्री जी फ़ज़ल की बात का समर्थन करते हैं और अपने पुराने दिनों को याद करते हैं जब केंचुए को खेत में देखना अच्छी फसल का संकेत माना जाता था। वे आधुनिक समाज में मिट्टी से बढ़ती दूरी पर चिंता व्यक्त करते हैं। फ़ज़ल उन्हें समझाता है कि लोग मिट्टी को गंदगी समझते हैं, जबकि वही "गंदगी" उनकी थाली में गेहूं बनकर आती है, और केंचुए ही बिना किसी स्वार्थ के ज़मीन को जोतते हैं। कहानी में एक मार्मिक मोड़ तब आता है जब आर्यन, एक छोटा लड़का, केंचुए को "साँप जैसा कुछ" समझता है। फ़ज़ल धैर्य से उसे बताता है कि यह एक अर्थवर्म है जो मिट्टी को अंदर से जोतता है, हवा, पानी और बीज को पनपने में मदद करता है। वह आर्यन को समझाता है कि वह जो सब्ज़ियाँ खाता है, वे कहीं न कहीं केंचुए के कारण ही उगती हैं, जिससे आर्यन केंचुए को अपना दोस्त समझने लगता है। आर्यन की माँ भी इस छोटे लेकिन गहरे सबक के लिए फ़ज़ल को धन्यवाद देती हैं। एक छोटी सभा में, फ़ज़ल अदिति, शास्त्री जी और आर्यन को संबोधित करते हुए कहते हैं कि भले ही वे शहर में रहते हों और वह गाँव से हो, लेकिन "मिट्टी" ही वह धागा है जो उन सबको जोड़ता है। वह शहरी लोगों से मिट्टी के प्रति संवेदना रखने और छोटे जीवों को बचाने की अपील करता है। शास्त्री जी भावुक होकर कहते हैं कि जो समाज ज़मीन से रिश्ता तोड़ता है, वह रिश्तों की अहमियत भी भूल जाता है। कहानी का चरमोत्कर्ष तब आता है जब फ़ज़ल अपने झोले से एक मुट्ठी मिट्टी उठाता है जिसमें एक केंचुआ रेंग रहा होता है। वह भावनात्मक स्वर में समझाता है कि यह मिट्टी केवल मिट्टी नहीं, बल्कि "जीवन" है, जिसमें "मेहनत" और "उम्मीद" है। वह चेतावनी देता है कि जिस दिन केंचुए कम हुए, उस दिन रोटी भी महंगी हो जाएगी, मिट्टी बंजर हो जाएगी, और दिल भी। यह सुनकर आर्यन अब हर केंचुए को ध्यान से देखता है और वादा करता है कि वह उन्हें कुचलेगा नहीं। कहानी एक शक्तिशाली मोनोलॉग के साथ समाप्त होती है, जिसमें फ़ज़ल की आवाज़ बताती है कि शहर भले ही चमकता हो, लेकिन उसकी नींव वही मिट्टी है जो गाँवों में साँस लेती है। वह जोर देता है कि अगर हम मिट्टी को मारते रहेंगे, तो हम भी धीरे-धीरे मरेंगे, "बिना आवाज़ के, बिना मिट्टी के।" अंतिम पंक्तियाँ एक काव्यात्मक संदेश देती हैं: "जो रेंगता है ज़मीन पर, वो थामे है आसमान को। न कुचलिए उसे, क्योंकि वो पालता है हमें… चुपचाप।" संदेश: यह पटकथा एक सरल लेकिन गहन संदेश देती है: "ज़मीन पर चलिए, मगर ज़मीन को समझकर चलिए। क्योंकि वहीं से जीवन उगता है।" यह कहानी हमें प्रकृति के सबसे छोटे सदस्यों के महत्व को पहचानने और उसके साथ हमारे संबंध को फिर से स्थापित करने के लिए प्रेरित करती है।

365 0
More stories in Non-fiction
fazal Esaf • 02 Jun, 2025 • 1 min read min

बेघर: एक परिवार की अनकही पीड़ा

यह कहानी शम्सुद्दीन साहब और उनके परिवार के इर्द-गिर्द घूमती है, जिनका पुश्तैनी घर, जो उनके जीवन का केंद्र था, को सरकारी बुलडोजर द्वारा बिना किसी चेतावनी के ढहा दिया जाता है। कहानी उनके दर्द, बेबसी और सदमे को बयां करती है। शम्सुद्दीन साहब और उनकी पत्नी, ज़ुबैदा खातून, अपने बच्चों और पोते-पोतियों के साथ, अचानक बेघर हो जाते हैं। कहानी में उनके परिवार के सदस्यों की अलग-अलग प्रतिक्रियाओं को दिखाया गया है - बच्चों का डर और भ्रम, ज़ुबैदा खातून का दर्द, और शम्सुद्दीन साहब का भीतर का संघर्ष। कहानी में यह भी दर्शाया गया है कि कैसे यह घटना सिर्फ एक घर का नुकसान नहीं है, बल्कि उनके सपनों, सुरक्षा और पहचान का भी नुकसान है। यह कहानी उन अनगिनत मुस्लिम परिवारों की पीड़ा को उजागर करती है, जिन्हें अक्सर अन्याय और बेबसी का सामना करना पड़ता है, और उनकी उस भावना को व्यक्त करती है कि यह देश उनका भी उतना ही है, जितना किसी और का। कहानी में दर्द के साथ-साथ, फिर से खड़े होने और जीवन को फिर से शुरू करने की प्रेरणा भी है।

516 0
More stories in Non-fiction
fazal Esaf • 10 May, 2025 • 1 min read min

हसन की उम्मीद

हसन की कहानी हमें यह सिखाती है कि हमारी सामाजिक स्थिति, धर्म, और समुदाय हमें हमारे सपनों को पूरा करने से रोकने का अधिकार नहीं रखते। संघर्ष, मेहनत, और एक मजबूत आत्मविश्वास के साथ हम किसी भी बुरे समय को पार कर सकते हैं। हसन का जीवन यह दर्शाता है कि सच्ची सफलता तब मिलती है, जब हम किसी भी हालात में हार मानने की बजाय, खुद को और अपने सपनों को जीने की हिम्मत रखते हैं।

561 0