शायरों की बस्ती....................

वो गली हमारी है, जहां हम और हमारी कलम रोज़ाना कुछ नया लिखते है, कुछ सुना देते है लोगों को, कुछ को ज़हन में ही दफन कर देते है.

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rashi sharma
rashi sharma 30 Nov, 2022 | 1 min read

ग़म में डूबे है मगर कलम से खुशियां लिखते है,

टूटे दिल से अटूट रिश्तों की कहानी लिखते है,

अलग ज़मीन है उनकी तन्हा बस्ती में रहते है,

भीड़ जाती है उन्हें सुनने,

वो जहाँ बैठ जाएं महफिल वहीं सजती है,


बेसुकून अल्फाज़ों में सुकून मिलता है,

लिखता तो शायर है मगर समझ कोई और ही रहा है,

तजुर्बेंकार शायर अनाड़ी को होशियार बना रहा है,

तू सुन ले किस राह पर है तू,

और तेरे साथ क्या होने वाला है,


ना पैसा मिलता है लिखने का,

ना वाह - वाही पर कुछ हाथ में आता है,

एक बाबा वो होते है जो छोला लिए घूमते है,

एक ऐ फकीर है जो शब्दों से मोती बिखेरने के बावजूद,

मोल के लिए तरसता है.

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