बाबुल एक बार मुझे गले से लगा लो

पिता और बेटी के प्यार और टूटते - बिखरते रिश्तों की कहानी।

Pragati tripathi
09 Aug, 2020 • 1 min read min read • hi
❤️ 0 💬 2 👁 1258

"प्रेम विवाह करना इतना बड़ा पाप है कि मुझसे शादी के आठ साल बाद भी परायों जैसा व्यवहार किया जा रहा है, मां आखिर कब-तक मुझसे नफरत करेगी। काश पापा होते तो वो मुझे जरूर माफ कर देते और मुझे और मनोज को अपना लेते। मां से अधिक उन्होंने हम बच्चों को समझा है" मीता दुःख में बड़बड़ा रही थी।

 आज मीता के छोटे भाई की शादी थी, आज मिथलेश दुल्हा बन दुल्हन को लेने जा रहा था। मीता ने अपनी भाभी और भाई के लिए सारी तैयारियां कर ली थी भाभी की मुंहदिखाई के लिए झुमके लिए थे और मिथलेश के लिए शेरवानी ली थी, मीता की खुशी का ठिकाना न था कि उसका छोटा सा भाई आज दुल्हा राजा बनेगा लेकिन अभी तक उसके ससुराल बुलावे की कोई खबर नहीं आई। आज उसकी नजरें दरवाजे पर टिकी थी जब भी डोरबेल की आवाज आती वो सब काम छोड़ दौड़कर दरवाजा खोलती और फिर निराशा हाथ लगती लेकिन उम्मीद न छोड़ी जा रही थी कमब्खत ये उम्मीद ना जाने कितनों को जीने नहीं देती, कभी तो उम्मीद ढ़ेरों खुशियां देती है तो कभी ढ़ेर सारे गम। आज मीता के साथ भी वही हो रहा था जैसे-जैसे दिन बीत रहा था उम्मीद की लौ धीरे-धीरे बुझती जा रही थी।

मीता का ससुराल, मायके के पास वाले मुहल्ले में था जहां से उसे लाउडस्पीकर पर गाने की आवाज भी सुनाई दे रही थी। मन में तो इतनी छटपटाहट हो रही थी कि बस कैसे भी वो वहां पहुंच जाती, एक एक रश्म की उसे अनुभूति हो रही थी और खुद से ही बड़बड़ाये जा रही थी। मनोज उसकी मनोदशा समझ रहा था लेकिन वो भी कुछ नहीं कर पा रहा था स्वत वह अतीत में खो गया , जब मीता ने मनोज के बारे में घर पर बताया तो हंगामा मच गया था लेकिन मीता के कहने पर मनोज और उसके पापा मीता के घर उसका हाथ मांगने गए तो उनका अपमान कर उन्हें घर से निकाल दिया गया था क्योंकि उनकी जात और स्टेटस में कोई मेल नहीं था। उस समय मीता के पापा - मम्मी ने साफ कह दिया था कि अगर उस लड़के से शादी करनी है तो खुद कर लो हम नहीं करेंगे उस लड़के से तुम्हारी शादी। उनके कहने पर मीता ने ये बड़ा कदम भी उठा लिया और घर वालों की मर्जी के खिलाफ जाकर दोनों ने शादी कर ली फिर तो मीता के घरवालों ने कभी मुड़कर उसकी तरह देखा ही नहीं कि वो किस हाल में हैं। सबने उससे रिश्ता तोड़ लिया लेकिन मीता हर पल उनको ही जीती रही।

दो साल पहले मीता के पापा चल बसे। अंत समय में वह मीता को देखना चाहते थे लेकिन उसकी मां ने उसे घर की दहलीज पर आने नहीं दिया। अब तो ऐसा लगता है कि शायद ही वो हमें माफ करेंगे। "सुनो.. सुनो कहां खोए हो?" मीता ने मनोज के कंधे पर हाथ रखते हुए बोला। "अरे कहीं नहीं तुम बताओ क्या कह रही हो?"

"आपको मिथलेश का फोन आया था क्या?"

"नहीं मीता मुझे तो कोई फोन नहीं आया। मीता तुम्हारे घर वाले हमें नहीं बुलायेंगे, तुम इतना मत सोचो जाओ आराम करों।"

" कैसे न सोचूं, मैं बड़ी बहन हूं मुझे तो ही बहुत से रश्म करने हैं, मेरे बिना कौन..", इतना बोलते ही गला भर आया उसका और बाकि आंखों से बहते हुए आँसू ने सबकुछ कह दिया।

सुबह से रात हो गई और साथ ही साथ मीता की उम्मीदों ने दम तोड़ दिया। मीता रोते-रोते यही कह रही थी पापा मुझे माफ़ कर दो, एक बार मुझे गले लगा लो .. मां मुझे अब तो गले लगा लो...। शायद अभी बहुत लंबा इंतजार लिखा था उसके नसीब में अपनों का प्यार और सम्मान को वापस पाने में.............


0 likes
☕

Support Pragati tripathi

Appreciate this story? Send a small tip to encourage the author to write more great work!

Please login to tip the author.

Pragati tripathi
Published By

Pragati tripathi

@pragatitripathi

Comments

Appreciate the author by telling what you feel about the post 💓

Please Login or Create a free account to comment.

★ Recommended For You

Stories tailored to your recent reading preferences

More stories in Relationship
fazal Esaf • 18 Jun, 2025 • 1 min read min

कहानी का शीर्षक: "मिट्टी के साथी"

"मिट्टी और मनुष्य" एक मार्मिक कहानी है जो शहरी जीवन की भागदौड़ और प्रकृति से अलगाव के बीच, मिट्टी और उसके सबसे छोटे जीवों — केंचुओं — के महत्व को दर्शाती है। कहानी फ़ज़ल एसाफ नाम के एक युवा, संस्कारी किसान के बेटे के इर्द-गिर्द घूमती है, जो अपनी गाँव की मिट्टी और उसके अनदेखे नायकों के प्रति गहरी समझ रखता है। कहानी की शुरुआत ठाणे के एक छोटे से कस्बे में बारिश के बाद की सुबह से होती है, जहाँ फ़ज़ल सड़क पर रेंगते केंचुओं को देखकर विचलित हो जाता है, क्योंकि लोग उन्हें बिना सोचे-समझे कुचल रहे हैं। वह एक केंचुए को उठाकर सुरक्षित स्थान पर रखता है और मन ही मन बुदबुदाता है कि लोग इस "कीड़े" की अहमियत नहीं समझते, जबकि यही उनकी "रोटियों" से जुड़ा है। आगे चलकर, फ़ज़ल का सामना तीन अलग-अलग राहगीरों से होता है: एक तेज़-तर्रार कॉर्पोरेट महिला, अदिति मैडम; एक अनुभवी बुज़ुर्ग, शास्त्री जी; और एक नन्हा लड़का, आर्यन। सबसे पहले, अदिति मैडम अनजाने में एक केंचुए को कुचल देती हैं। फ़ज़ल उन्हें रोकता है और विनम्रता से समझाता है कि यह "कीड़ा" नहीं, बल्कि "किसान का दोस्त" है जो मिट्टी को साँस देता है और ज़मीन को उपजाऊ बनाता है। अदिति शुरुआत में झिझकती हैं, लेकिन फ़ज़ल के शब्दों में छिपी सच्चाई उन्हें सोचने पर मजबूर कर देती है। इसके बाद, शास्त्री जी फ़ज़ल की बात का समर्थन करते हैं और अपने पुराने दिनों को याद करते हैं जब केंचुए को खेत में देखना अच्छी फसल का संकेत माना जाता था। वे आधुनिक समाज में मिट्टी से बढ़ती दूरी पर चिंता व्यक्त करते हैं। फ़ज़ल उन्हें समझाता है कि लोग मिट्टी को गंदगी समझते हैं, जबकि वही "गंदगी" उनकी थाली में गेहूं बनकर आती है, और केंचुए ही बिना किसी स्वार्थ के ज़मीन को जोतते हैं। कहानी में एक मार्मिक मोड़ तब आता है जब आर्यन, एक छोटा लड़का, केंचुए को "साँप जैसा कुछ" समझता है। फ़ज़ल धैर्य से उसे बताता है कि यह एक अर्थवर्म है जो मिट्टी को अंदर से जोतता है, हवा, पानी और बीज को पनपने में मदद करता है। वह आर्यन को समझाता है कि वह जो सब्ज़ियाँ खाता है, वे कहीं न कहीं केंचुए के कारण ही उगती हैं, जिससे आर्यन केंचुए को अपना दोस्त समझने लगता है। आर्यन की माँ भी इस छोटे लेकिन गहरे सबक के लिए फ़ज़ल को धन्यवाद देती हैं। एक छोटी सभा में, फ़ज़ल अदिति, शास्त्री जी और आर्यन को संबोधित करते हुए कहते हैं कि भले ही वे शहर में रहते हों और वह गाँव से हो, लेकिन "मिट्टी" ही वह धागा है जो उन सबको जोड़ता है। वह शहरी लोगों से मिट्टी के प्रति संवेदना रखने और छोटे जीवों को बचाने की अपील करता है। शास्त्री जी भावुक होकर कहते हैं कि जो समाज ज़मीन से रिश्ता तोड़ता है, वह रिश्तों की अहमियत भी भूल जाता है। कहानी का चरमोत्कर्ष तब आता है जब फ़ज़ल अपने झोले से एक मुट्ठी मिट्टी उठाता है जिसमें एक केंचुआ रेंग रहा होता है। वह भावनात्मक स्वर में समझाता है कि यह मिट्टी केवल मिट्टी नहीं, बल्कि "जीवन" है, जिसमें "मेहनत" और "उम्मीद" है। वह चेतावनी देता है कि जिस दिन केंचुए कम हुए, उस दिन रोटी भी महंगी हो जाएगी, मिट्टी बंजर हो जाएगी, और दिल भी। यह सुनकर आर्यन अब हर केंचुए को ध्यान से देखता है और वादा करता है कि वह उन्हें कुचलेगा नहीं। कहानी एक शक्तिशाली मोनोलॉग के साथ समाप्त होती है, जिसमें फ़ज़ल की आवाज़ बताती है कि शहर भले ही चमकता हो, लेकिन उसकी नींव वही मिट्टी है जो गाँवों में साँस लेती है। वह जोर देता है कि अगर हम मिट्टी को मारते रहेंगे, तो हम भी धीरे-धीरे मरेंगे, "बिना आवाज़ के, बिना मिट्टी के।" अंतिम पंक्तियाँ एक काव्यात्मक संदेश देती हैं: "जो रेंगता है ज़मीन पर, वो थामे है आसमान को। न कुचलिए उसे, क्योंकि वो पालता है हमें… चुपचाप।" संदेश: यह पटकथा एक सरल लेकिन गहन संदेश देती है: "ज़मीन पर चलिए, मगर ज़मीन को समझकर चलिए। क्योंकि वहीं से जीवन उगता है।" यह कहानी हमें प्रकृति के सबसे छोटे सदस्यों के महत्व को पहचानने और उसके साथ हमारे संबंध को फिर से स्थापित करने के लिए प्रेरित करती है।

367 0
More stories in Relationship
fazal Esaf • 02 Jun, 2025 • 1 min read min

गांव और इंसाफ़

यह कहानी पंडित रामलाल और उनकी पत्नी सीता देवी की है, जो एक ऐसे गाँव में रहते हैं जहाँ हिंदू और मुस्लिम समुदाय सदियों से शांति और सौहार्द से रह रहे थे। एक दिन, देश के किसी दूसरे हिस्से में हुए एक आतंकवादी हमले के बाद, गाँव का माहौल बिगड़ जाता है। कुछ कट्टरपंथी ग्रामीण गुस्से में आकर गाँव के मुस्लिम परिवारों को धमकाने लगते हैं और उन्हें अपने घर खाली करने का आदेश देते हैं, उन पर आतंकवादी होने का आरोप लगाते हैं। गाँव के मुस्लिम परिवारों में से एक, सलमा बेगम और उनके परिवार को विशेष रूप से निशाना बनाया जाता है। जब भीड़ उन्हें उनके घर से निकालने की कोशिश करती है, तो पंडित रामलाल और सीता देवी उनके बचाव में आगे आते हैं। पंडित रामलाल भीड़ से सवाल करते हैं कि क्या किसी एक व्यक्ति के गलत काम के लिए पूरे समुदाय को दोषी ठहराना सही है। वह तर्क देते हैं कि अगर ऐसा होता है, तो हिंदुओं द्वारा किए गए बुरे कामों के लिए पूरे हिंदू समुदाय को भी दोषी ठहराया जाना चाहिए। उनकी पत्नी, सीता देवी, भी अपनी बात रखती हैं और सलमा बेगम के गाँव के प्रति योगदान और मदद को याद दिलाती हैं। वे दोनों स्पष्ट करते हैं कि आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता; आतंकवादी सिर्फ़ मानवता के दुश्मन होते हैं। वे गाँव वालों को समझाते हैं कि उन्हें आपस में नफ़रत फैलाने के बजाय ऐसे बुरे लोगों का मिलकर विरोध करना चाहिए। पंडित रामलाल और सीता देवी की बुद्धिमान और दृढ़ बातों का गाँव के लोगों पर गहरा असर होता है। उन्हें अपनी गलती का एहसास होता है और भीड़ शांत हो जाती है। इस घटना से गाँव वालों को यह महत्वपूर्ण सबक मिलता है कि किसी एक व्यक्ति के कृत्य के लिए पूरे समुदाय को दोषी ठहराना अन्याय है और धर्म के नाम पर नफ़रत फैलाना गलत है। यह कहानी सच्ची इंसानियत, समझदारी और मुश्किल समय में एक-दूसरे का साथ देने के महत्व को दर्शाती है।

465 0
More stories in Relationship
Ruchika Rai • 19 Mar, 2023 • 0 mins read min

लिव इन के प्रति राय

लिव इन

719 0
More stories in Relationship
Kumar Sandeep • 22 Feb, 2023 • 1 min read min

प्रार्थना यही है ईश्वर से

Dad please come back

932 1