MUKESH BISSA
09 Apr, 2026
मन
मन
मन एक अनजाना सागर है,
लहरों सा इसका स्वभाव,
कभी शांत गहराई लेकर,
कभी उठे तूफ़ानी चाव।
मन कभी धूप सा चमकता,
आशा की किरणें बिखेरता,
कभी बादल बनकर घिरता,
भीतर ही भीतर बरसता।
मन है पंछी आज़ाद गगन का,
सीमाओं से परे उड़ता,
पर जब बंध जाता बंधनों में,
खुद ही खुद से लड़ता।
मन में सपनों की नगरी है,
रंग-बिरंगे दृश्य बसे,
कुछ पूरे हो जाते हँसकर,
कुछ रह जाते अधूरे से।
मन कभी बचपन सा भोला,
छोटी-छोटी बातों में हँसता,
कभी अनुभवों का वृद्ध बन,
हर सच को चुपचाप सहता।
मन ही मंदिर, मन ही माया,
मन ही हर उलझन की डोर,
इसे साध ले जो इंसान,
उसके लिए नहीं कुछ भी कठिन और।
मन को समझना ही जीवन है,
मन से ही हर राह बने,
अगर ये साथ हो अपने,
तो अंधेरे में भी दीप जले।
Paperwiff
by mukeshbissa
09 Apr, 2026
मन
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