मुझे तुम्हारे पैसे नहीं तुम्हारा वक्त चाहिए!!

Relationship value is higher in compare of money

Manisha Bhartia
04 Jun, 2020 • 1 min read min read • hi
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मुझे तुम्हारे पैसे नहीं तुम्हारा वक्त चाहिए!!

Photo by Nathan McBride on Unsplash

सपना एक मध्यमवर्गीय परिवार से थी। ," लेकिन उसकी शादी एक रहीस खानदान में हुई थी। ,उसे सब कुछ एक सपने जैसा लग रहा था, जैसा गुड्डे गुड़ियों के खेल में होता है.. आलीशान घर, चार- चार,गाड़ी , नौकर- चाकर।" ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे वो कोई महल में आ गई हो, और वहां की रानी हो, एक हुकुम करो हर चीज हाजिर। उसके घर में तो सब मिलकर ही काम करते थे। , इसलिए उसे ऐशो आराम शुरू शुरू में तो बहुत अच्छे लगे,ं पैसों की चमक-दमक और मोहित का साथ पाकर वह अपने आप को दुनिया की सबसे खूशनशीब लड़की समझ रही थी। लेकिन धीरे-धीरे मोहित ने अपना बिजनेस बहुत एक्सपेंड कर दिया। बह घर से ज्यादा बाहर रहने लगा, शुरुआती दौर में वह एक एक-दो दिन के पश्चात आता था, फिर धीरे-धीरे तो 1 सप्ताह के बाद आने लगा, रात को आता और सुबह सपना की नींद खुलने से पहले ही निकल जाता। बह पैसे कमाने और नंबर वन बिजनेसमैन बनने की जुनून में इस हद तक पागल हो चुका था,की उसे किसी चीज की कोई सुध- बूध ही नही थी। , सपना को भी टालने लगा। वक्त बीतते बीतते1 साल गुजर गया, 1 साल के अंतराल में सपना उम्मीद से थी। सपना को उम्मीद थी कि जब यह खबर वह मोहित को देगी, दौड़ा-दौड़ा अगली फ्लाइट से आ जाएगा, लेकिन उसकी उम्मीदों पर पानी फिर गया, उसने सपना को बधाइयां देते हुए कहा, कि तुम अपना ध्यान रखो समय पर चेकअप कराती रहो और हां,ज्यादा बाहर जाने की जरूरत नहीं है ,हो सके तो डॉक्टर को घर पर ही बुला लो। मोहित के इस व्यवहार से वो धीरे धीरे दुखी रहने लगी।, उसके साथ ससुर भी परेशान थे ।,लेकिन समझाये भी तो किसको, मोहित तो किसी की बात सुनने के लिए तैयार नहीं था।  , सपना जब प्रसव की पीड़ा में दर्द से करा रही थी, जिस समय हर औरत की तरह उसे भी मोहित की जरूरत थी, बह उस समय भी उसके साथ नहीं था, उसने बहुत मिन्नतें की कम से कम आज तो तुम आ जाओ, मुझे तुम्हारे साथ की जरूरत है,मैं चाहती हूं कि दुनिया में जब हमारा बच्चा आए तो सबसे पहले तुम उसे देखो।, लेकिन वह हर बार की तरह यही कह कर टाल गया यह कहकर की मेरी बहुत महत्वपूर्ण मीटिंग है, इसे छोड़कर मैं नहीं आ सकता, मैंने तुम्हारे इलाज के लिए बेहतर से बेहतर डॉक्टर भेज दिए। रूपये ,पैसे और चाहिए तो बोलो मैं इंतजाम कर देता हूं। वैसे भी मां बाबूजी तो है ही तुम्हारे साथ , मेरी मीटिंग आज शाम तक खत्म हो जाएगी ,"मैं अगली फ्लाइट पकड़ कर आ जाऊंगा तुम्हारे और मुन्ने के पास।सपना ने गुस्से से फोन पटक दिया और, कहां नहीं चाहिए रुपए पैसै।    फिर जब मोहित रात को आया, दुनिया भर के खेल खिलौनों के साथ सपना ने उससे बात भी नहीं की। वह चुपचाप अपने बच्चे के साथ खेलने लगा, और सपना को मनाने की कोशिश करने लगा।, आगे से ऐसा नहीं होगा। भरी तो बैठी ही थी।,"सपना , उसने गुस्से में कहा, तुम बदल जाओगे तुम । मेरी बर्थडे पार्टी हो या तुम्हारी , शानदार पार्टी का इंतजाम हो जाता है सारे मेहमान आ कर चले जाते है, लेकिन तुम्हारा पता नहीं रहता, अभी पिछले हफ्ते ही मां बाबूजी की एनिवर्सरी आकर गई, उसके पहले हमारी एनिवर्सरी आई, हर दिन, हर दिन तुम सारे मेहमान जाने के बाद रात को लौटते हो। सबके सामने हमारा मजाक बन जाता है। अरे इतने पैसों का हमें क्या करना है पहले से हमारे पास बहुत पैसे हैं, इंसान पैसे कमाता है जीने के लिए , पैसे कमाने के लिए नहीं जीता। अब तो तुम ने हद ही कर दी, हमारा बच्चा जब दुनिया में आने वाला था।, उस समय भी तुम मेरे पास नही थे। क्या विश्वास करूं और कैसे विश्वास करू तुम पर। मोहित ने डरते हुये कहा एक आखरी मौका मुझे दे दो ,इस बार मैं तुम्हें शिकायत का मौका नहीं दूंगा। ठीक है कहकर सपना ने उसे माफ कर दिया।वक्त अपनी रफ्तार से आगे बढ़ रहा था। लेकिन मोहित में कोई बदलाव नहीं आ रहा था। उसके पैसे कमाने का जुनून दिन प्रतिदिन और बढ़ रहा था। पहले तो वह हफ्ते हफ्ते आता।" लेकिन अब तो 1 महीने के अंतराल पर आता था। सपना बार बार फोन कर के वक्त पर याद दिलाती रहती ।लेकिन वह हर बार यही कहता की मेरी बहुत महत्वपूर्ण मीटिंग है तुम पेरेंट्स मीटिंग अटेंड कर लो। अगली बार मैं कर लूंगा। सपना के सब्र का बांध अब टूट चुका था। , सपना ने एक फैसला लिया, और मोहित को फोन किया। ,और कहा कि मोहित अब मैं और तुम्हारे साथ नहीं रह सकती। मैंने तुम्हें आखिरी मौका दिया लेकिन तुम आज भी वैसे के वैसे ही हो, कोई बदलाव नहीं आया तुममें। तुम कोई भी रिश्ता अच्छे से निभा नहीं सके। तुम ना एक अच्छे बेटे, ना अच्छे पति, न अच्छे पिता, कुछ नहीं बन पाए। बस पैसों के पुजारी ही बने हो। मुझे तुम्हारे पैसे नहीं तुम्हारा वक्त चाहिए!

पैसे कमाने के जुनून में इस कदर पागल हो गये की तुम्हें यह तक समझ में नहीं आया की तुम्हारे वक्त पर किसी और का भी हक है। एक बच्चा अपने पिता के साथ खेलने के लिए तरसता है। हर दिन यह सवाल करता है।, मम्मी सबके पापा रात को रोज घर आते हैं मेरे पापा क्यों नहीं आते। मां बाबूजी की भी उम्र हो चली है वह भी अपने बेटे का साथ चाहते है। ," और मेरा ,मेरा क्या ?मेरे लिए तुम्हारा कोई फर्ज नहीं बनता । मैं यहां सात फेरे लेकर खुशियां पाने आई थी। लेकिन तुमने तो मुझे गम के अंधेरे दे दिए। मुझे पैसों की सेज पर नही सोना मुझे तुम्हारी बाहों का हार चाहिए। जो तुम मुझे दे नहीं सकते। इससे तो अच्छा मैं अपने पीहर में हीं थी ,पैसे भले ही कम थे।,' लेकिन हम सब साथ साथ थे।इसलिए मैं अभी इसी वक्त अपने बेटे को साथ लेकर घर को छोड़कर जा रही हूं ।तलाक की नोटिस भिजवा दी है।दोस्तों मेरी नई कहानी नई उम्मीद ,और संदेश के साथ आशा करती हूं कि आप लोगों को पसंद आएगी।

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मेरी कहानी पढ़ने के लिए धन्यवाद।

स्वरचित व मौलिक।

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मनीषा भरतीया

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कहानी का शीर्षक: "मिट्टी के साथी"

"मिट्टी और मनुष्य" एक मार्मिक कहानी है जो शहरी जीवन की भागदौड़ और प्रकृति से अलगाव के बीच, मिट्टी और उसके सबसे छोटे जीवों — केंचुओं — के महत्व को दर्शाती है। कहानी फ़ज़ल एसाफ नाम के एक युवा, संस्कारी किसान के बेटे के इर्द-गिर्द घूमती है, जो अपनी गाँव की मिट्टी और उसके अनदेखे नायकों के प्रति गहरी समझ रखता है। कहानी की शुरुआत ठाणे के एक छोटे से कस्बे में बारिश के बाद की सुबह से होती है, जहाँ फ़ज़ल सड़क पर रेंगते केंचुओं को देखकर विचलित हो जाता है, क्योंकि लोग उन्हें बिना सोचे-समझे कुचल रहे हैं। वह एक केंचुए को उठाकर सुरक्षित स्थान पर रखता है और मन ही मन बुदबुदाता है कि लोग इस "कीड़े" की अहमियत नहीं समझते, जबकि यही उनकी "रोटियों" से जुड़ा है। आगे चलकर, फ़ज़ल का सामना तीन अलग-अलग राहगीरों से होता है: एक तेज़-तर्रार कॉर्पोरेट महिला, अदिति मैडम; एक अनुभवी बुज़ुर्ग, शास्त्री जी; और एक नन्हा लड़का, आर्यन। सबसे पहले, अदिति मैडम अनजाने में एक केंचुए को कुचल देती हैं। फ़ज़ल उन्हें रोकता है और विनम्रता से समझाता है कि यह "कीड़ा" नहीं, बल्कि "किसान का दोस्त" है जो मिट्टी को साँस देता है और ज़मीन को उपजाऊ बनाता है। अदिति शुरुआत में झिझकती हैं, लेकिन फ़ज़ल के शब्दों में छिपी सच्चाई उन्हें सोचने पर मजबूर कर देती है। इसके बाद, शास्त्री जी फ़ज़ल की बात का समर्थन करते हैं और अपने पुराने दिनों को याद करते हैं जब केंचुए को खेत में देखना अच्छी फसल का संकेत माना जाता था। वे आधुनिक समाज में मिट्टी से बढ़ती दूरी पर चिंता व्यक्त करते हैं। फ़ज़ल उन्हें समझाता है कि लोग मिट्टी को गंदगी समझते हैं, जबकि वही "गंदगी" उनकी थाली में गेहूं बनकर आती है, और केंचुए ही बिना किसी स्वार्थ के ज़मीन को जोतते हैं। कहानी में एक मार्मिक मोड़ तब आता है जब आर्यन, एक छोटा लड़का, केंचुए को "साँप जैसा कुछ" समझता है। फ़ज़ल धैर्य से उसे बताता है कि यह एक अर्थवर्म है जो मिट्टी को अंदर से जोतता है, हवा, पानी और बीज को पनपने में मदद करता है। वह आर्यन को समझाता है कि वह जो सब्ज़ियाँ खाता है, वे कहीं न कहीं केंचुए के कारण ही उगती हैं, जिससे आर्यन केंचुए को अपना दोस्त समझने लगता है। आर्यन की माँ भी इस छोटे लेकिन गहरे सबक के लिए फ़ज़ल को धन्यवाद देती हैं। एक छोटी सभा में, फ़ज़ल अदिति, शास्त्री जी और आर्यन को संबोधित करते हुए कहते हैं कि भले ही वे शहर में रहते हों और वह गाँव से हो, लेकिन "मिट्टी" ही वह धागा है जो उन सबको जोड़ता है। वह शहरी लोगों से मिट्टी के प्रति संवेदना रखने और छोटे जीवों को बचाने की अपील करता है। शास्त्री जी भावुक होकर कहते हैं कि जो समाज ज़मीन से रिश्ता तोड़ता है, वह रिश्तों की अहमियत भी भूल जाता है। कहानी का चरमोत्कर्ष तब आता है जब फ़ज़ल अपने झोले से एक मुट्ठी मिट्टी उठाता है जिसमें एक केंचुआ रेंग रहा होता है। वह भावनात्मक स्वर में समझाता है कि यह मिट्टी केवल मिट्टी नहीं, बल्कि "जीवन" है, जिसमें "मेहनत" और "उम्मीद" है। वह चेतावनी देता है कि जिस दिन केंचुए कम हुए, उस दिन रोटी भी महंगी हो जाएगी, मिट्टी बंजर हो जाएगी, और दिल भी। यह सुनकर आर्यन अब हर केंचुए को ध्यान से देखता है और वादा करता है कि वह उन्हें कुचलेगा नहीं। कहानी एक शक्तिशाली मोनोलॉग के साथ समाप्त होती है, जिसमें फ़ज़ल की आवाज़ बताती है कि शहर भले ही चमकता हो, लेकिन उसकी नींव वही मिट्टी है जो गाँवों में साँस लेती है। वह जोर देता है कि अगर हम मिट्टी को मारते रहेंगे, तो हम भी धीरे-धीरे मरेंगे, "बिना आवाज़ के, बिना मिट्टी के।" अंतिम पंक्तियाँ एक काव्यात्मक संदेश देती हैं: "जो रेंगता है ज़मीन पर, वो थामे है आसमान को। न कुचलिए उसे, क्योंकि वो पालता है हमें… चुपचाप।" संदेश: यह पटकथा एक सरल लेकिन गहन संदेश देती है: "ज़मीन पर चलिए, मगर ज़मीन को समझकर चलिए। क्योंकि वहीं से जीवन उगता है।" यह कहानी हमें प्रकृति के सबसे छोटे सदस्यों के महत्व को पहचानने और उसके साथ हमारे संबंध को फिर से स्थापित करने के लिए प्रेरित करती है।

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