मैं हूँ नारी एक, चढ़ते सूरज से लालिमा मेरी,घिस कर सोने सी तपती हूँ मैं एक नारी,
क्या कहूं उस परमेश्वर की इस रचना को,
जितना घिसो चमकती ही जाये हूँ मैं एक नारी,
खुद को हर सांचे में ढाल लूँ हूँ मैं एक नारी,
पिघलते मोम सी कोमल फिर भी बहुत सख्त हूँ मैं नारी,
किसी को जीवन देकर छीनने की आदत नहीं हूँ मैं ऐसी नारी,
हज़ार गलतियों को माफ़ कर दूँ हूँ मैं ऐसी नारीसंस्कारों की पाठशाला, शुरू हो जिससे प्रथम पाठशाला,
सूरज सी तपिश भी है, चन्द्रमा सी शीतलता,
इस धरा की खूबसूरत संरचना हूँ मैं एक नारी,
निर्भया हूँ अब नहीं कोई अबला मैं नारी हूँ,
ऐ इंसान मत देख मुझे यूँ हेय नज़रों से,हूँ नारी तो क्या तुझसे अधिक निभाती मैं किरदार हूँ,
मैं हूँ तो पीढ़ी है, मैं हूँ तो वंशज चलते है,चंचल दीप शिखाओं सी, लहराती हवाओं सी,
बल और सहनशीलता की खान हूँ मैं नारी
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