यह धूप छाँव से भरी ज़िंदगी जितनी खूबसूरत है उतनी ही गहरी और जटिल भी |
इसी सिलसिले में एक स्वरचित कविता प्रस्तुत कर रहा हूँ |
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ऐ ज़िन्दगी तेरे मायने से अन्जान रहे हम,
ये सयानों की दुनियां में नादान रहे हम |
होकर अपनों से अपने से बेसुध बेखबर ,
लगाके गैरों से ये दिल पशेमान रहे हम ||
ऐ ज़िन्दगी तेरे मायने से अन्जान रहे हम
न तो उतरे न समझे तेरी गहराइयों को ,
रहे भटकते बस यहाँ वहां यूँ ही हरदम |
न तो तुझे न तेरे हम दस्तूर को समझे ,
बस बहक गए उधर जिधर ले गए कदम ||
ऐ ज़िन्दगी तेरे मायने से अन्जान रहे हम
थी हसरतें कि मिलें कुछ लम्हें सुकून के,
बस इतना ही पाने को परेशान रहे हम |
सोचा था जियेंगे ज़िंदादिली से हर रोज़,
जिंदा रहने को हर पल हैरान रहे हम ||
ऐ ज़िन्दगी तेरे मायने से अन्जान रहे हम
रहे आसमाँ पे छोड़ के पैरों से ये ज़मीं,
रखीं ख्वाहिशें बहुत पर सब्र बहुत कम |
जब छूट गई ख्वाहिशें तो देखिये मज़ा,
क्या मस्ती से ज़िन्दगी गुजार रहे हम ||
ऐ ज़िन्दगी तेरे मायने से अन्जान रहे हम
ऐ ज़िन्दगी तेरे मायने से अन्जान रहे हम
चंद्र मोहन कत्याल
ग्रेटर नॉएडा, उत्तर प्रदेश-201310, भारत
ईमेल : katyalchandra@gmail.com
मोबाइल नंबर : 9005050840
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