मयखाने के शूरवीर

बेवड़ों के हलक से… दारु नीचे खिसकी नहीं … कि ये अपने आप को रॉबिनहुड से कम नहीं समझने लगते हैं | इनके अपने ही फंडे होते हैं | ये कहते हैं कि … इस धरती पर पहले सुरा हुई … फिर सुर हुए … फिर सुर से नर और फिर मुनि | मुझे नहीं मालूम ये कितना सही है कितना गलत | लेकिन ये सुनकर मैं सोचने लगा की इसमें असुर का नाम नहीं आया | सुर से डायरेक्ट नर और मुनि बन गए | ये ससुरा असुर कहाँ गया | बस यही सोचते सोचते … सुरा से उपजे इन महानुभावों से … मैं प्रेरित हुआ …. और व्यंग्य भाव से इनकी शान में कुछ स्वरचित पंक्तियाँ पेश करने की हिमाक़त कर रहा हूँ |

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chandra mohan katyal
chandra mohan katyal 20 Jul, 2026 | 1 min read

बेवड़ों के हलक से… दारु नीचे खिसकी नहीं कि ये अपने आप को

रॉबिनहुड से कम नहीं समझने लगते हैं |  

इनके अपने ही फंडे होते हैं | ये कहते हैं कि … इस धरती पर पहले सुरा हुई …  

फिर सुर हुए … फिर सुर से नर और फिर मुनि |  

मुझे नहीं मालूम ये कितना सही है कितना गलत | 

लेकिन ये सुनकर मैं सोचने लगा की इसमें असुर का नाम नहीं आया |  

सुर से डायरेक्ट नर और मुनि बन गए | ये ससुरा असुर कहाँ गया |  

बस यही सोचते सोचते … सुरा से उपजे इन महानुभावों से …

मैं प्रेरित हुआ …. और व्यंग्य भाव से इनकी शान में कुछ

स्वरचित पंक्तियाँ पेश करने की हिमाक़त कर रहा हूँ | 

ओ मयखाने के शूरवीर,

क्यूँ होता है इतना अधीर |

मत हो इतना संताप ग्रस्त,

होने को है अब सूर्य अस्त ||

 

चल भूले बिसरे गीत बजा,

कर दे अपनी रंगीन फ़िज़ा |

जब तेरे मन की यही रज़ा,

तो पी पी के खप जा मुक जा ||

 

तू भर प्याला न कर विचार ,

लब पे लगा नीचे उतार |

फिर दे उड़ेल तू बार बार ,

तू वीर न माने कभी हार ||

 

उठ देह दमन का दम्भ छोड़,

ये व्यर्थ के शिष्टाचार तोड़ |

बोतल पकड़ गर्दन मरोड़,

हर बूँद तू उसकी ले निचोड़ || 


ये नीम्बू पानी के कुनबे ,

सब खिन्न खिन्न ऊबे ऊबे |

इनके पीड़ाग्रस्त ख्यालों में ,

तू क्यों उत्पीड़ित हो डूबे ||

 

ये दूधपरस्ते क्या जाने,

इस सुरा सुरीली की चसक |

जब उठती है इसकी कसक

मन हौले हौले ले ठसक ||

 

जब इसकी महक घुसे तन में,

मन कुहू कुहू बोल उठे |

ये कामदेव का प्रेम बाण,

जब चले तो धरती डोल उठे ||

 

तेरे हृदय का दयाभाव,

हर घूंट घूंट बढ़ता जाए |

तू खम्बे से भी टकराये,

तो क्षमा याचना कर जाए ||

 

तू डगमग डगमग डोल चले ,

हर दिशा में तेरा कदम डले |

तू लहर लहर सा झूम झूम ,

उठते पड़ते ले हिचकोले ||

तू प्रकृति प्रेम से भरा हुआ,

दलदल में ऐसे पड़ा हुआ |

मानो धरती के मस्तक पर,

इक फूल सड़ा सा जड़ा हुआ | 


तू सुरा से उपजा जुगनू सा ,

कीचड़ में टिम टिम करता है|

वो गली का कुत्ता टांग उठा ,

तेरे पर रिम झिम करता है ||

 

यूँ एक छटंकी भर का तू ,

दो घूंट में होता सवा सेर |

इस सुरा की छींटें पड़ते ही ,

चूहे से उमड़ के बने शेर ||

 

अब आखिर में तू मेरी सुन,  

बस खींच दे अब अपनी लकीर |

इस नशे के टंटे में मिट कर,

मत पापी बन मत बन फ़कीर || 


मत पैमाने में डूब के मर,

कुछ तो सुन क्या कहता ज़मीर |

ओ मयखाने के शूरवीर,

ओ मयखाने के शूरवीर ||

 

चंद्र मोहन कत्याल

ग्रेटर नॉएडा, उत्तर प्रदेश-201310, भारत

ईमेल : katyalchandra@gmail.com





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