अक्सर जब कोई व्यक्ति सेवानिवृत होता है तो वो अपनी बाकी की ज़िंदगी को गुजारने के जाने कैसे कैसे सपने देखता है | अपने मन की इच्छाओं आकांछाओं को व्यक्त करते हुए वो वक़्त से क्या कहता है .. कुछ स्वरचित पंक्तियों के माध्यम से साझा कर रहा हूँ |
रुक जा थम जा वक़्त जरा सा धीरे चल तू ,
धीरज रख मत शोर मचा मत कर हलचल तू |
तू कुछ ठहरे तो थोड़ा सा में भी जी लूँ ,
बची खुची जीवन अमृत की बूंदें पी लूँ ||
अभी तलक तो दौड़ दौड़ के जान खपाई,
आपाधापी की भगदड़ में उम्र गँवाई |
भागमभाग का तूफां अभी अभी ठहरा है ,
जीवन की ठंडी संध्या बस अभी है आई ||
बस अब मस्ती के झोंके अंदर आने दो,
जीवन की मीठी धुन मुझको सुन पाने दो |
खो न जाए चैन कहीं ये पल दो पल का,
छेड़ो न मुझको गुम इसमें हो जाने दो ||
फुर्सत से अब अपनों को में पास बिठा लूँ,
रिश्तों की गर्मी का कुछ अहसास दिला लूँ |
ग़मों की अदला बदली कर रिश्ते सुलझा लूँ ,
थोड़ा मानूं में थोड़ा सा उन्हें मना लूँ ||
रुक पिछली भूलों का में इकरार तो कर लूँ ,
अपनें जज्बातों का कुछ इज़हार तो कर लूँ |
रेत की माफिक मुट्ठी से क्यूँ रहा फिसल तू ,
रुक जा थम जा वक़्त जरा सा धीरे चल तू ||
चंद्र मोहन कत्याल
एल्डेको ग्रीन मीडोज,
ग्रेटर नॉएडा, उत्तर प्रदेश-201310, भारत
ईमेल : katyalchandra@gmail.com
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