वक़्त की तेज रफ़्तार के साथ … हमारी ज़िन्दगी की गाडी इस कदर बिना किसी
आवाज के .. बिना किसी आहट के चलती है कि कब आप उम्र के आखिरी
पड़ाव पर आ पहुँचते है पता ही नहीं चलता …और फिर आपको याद आते
हैं… आपके बचपन और आपकी जवानी के वो गुजरे हुए.. खूबसूरत लम्हें |
इस एहसास को अपनी कुछ मौलिक स्वरचित पंक्तियों
के माध्यम से साझा कर रहा हूँ
***
वक़्त के वो लम्हें जाने कब गुजर गए,
बेफिक्री के वो आलम कब बिखर गए |
बचपन के वो ठाठ ठिठोले नादानी पल ,
लांघ के वो कब जवां उम्र में उभर गए ||
वक़्त के वो लम्हें जाने कब गुजर गए
वो गुस्ताख़ धड़कनों के आवारा मंजर,
दिलकश सपनों के सारे रंगीन समंदर |
कब सब हौले हौले धुंधले धुंधले होकर,
रफ्ता रफ्ता बह के जाने किधर गए ||
वक़्त के वो लम्हें जाने कब गुजर गए
अजब ख्वाहिशों की कमबख्ती मारामारी ,
मन की अल्हड़ता की वो मदमस्त खुमारी |
पंख लगे वो कदम कभी जो उड़ते रहते ,
थम गए धीमे धीमे और फिर ठहर गए ||
वक़्त के वो लम्हें जाने कब गुजर गए
इश्क मुहब्बत के दिन थे किसको थी फुर्सत,
कब सोचा था ये हसीन दिन होंगे रुखसत |
यारों की उधमी महफ़िल की चरस चकल्लस,
गुम हो गई और हम कहने को सुधर गए ||
वक़्त के वो लम्हें जाने कब गुजर गए
जीवन का सोंधा बसंत कब पार हो गया ,
भनक लगी न पतझड़ का दीदार हो गया |
नींद की मानो छोटी सी इक झपकी लग गई,
पता नहीं कब उम्र से हो बेखबर गए ||
वक़्त के वो लम्हें जाने कब गुजर गए
शेष रहा जीवन रस मस्तमलंग पिएंगे,
लचके तन और बहके मन के संग जियेंगे |
ग़मों को कम करने की खातिर याद करेंगे ,
वो रंगीं पल इधर उधर जो छितर गए ||
वक़्त के वो लम्हें जाने कब गुजर गए
वक़्त के वो लम्हें जाने कब गुजर गए
✍️ ༄ चन्द्र मोहन कत्याल ༄ कवी • लेखक
ग्रेटर नॉएडा, उत्तर प्रदेश-201310, भारत
ईमेल : katyalchandra@gmail.com
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