इस राखी पर

राखी के त्यौहार पर एक बहन अपने भाई को... अपने मन में दबे हुए भावों को प्रकट करती है ... इस एहसास को कुछ मौलिक स्वरचित पंक्तियों के माध्यम से प्रस्तुत कर रहा हूँ |

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chandra mohan katyal
chandra mohan katyal 24 Aug, 2026 | 1 min read
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#chandramohankatyal, #HindiPoetry, #हिंदीकविता

राखी के त्यौहार पर एक बहन अपने भाई को... अपने मन में दबे हुए

भावों को प्रकट करती है ... इस एहसास को कुछ मौलिक स्वरचित 

पंक्तियों के माध्यम से प्रस्तुत कर रहा हूँ |

 

इस राखी पर मेरे भैय्या ,

तू कह दे तो में कुछ बोलूं |

दबी पुरानी परतें मन की ,

खोलूं थोड़ा हल्की हो लूँ || 


तेरे आने पर इस घर से ,

गली मोहल्ले बंटी मिठाई |

लेकिन क्यों मेरे आने पर ,

मेरी माई थी मुरझाई ||

 

बंधन और पाबन्दी सारी ,

क्यों मेरे हिस्से में आई |

तुझे बनाया कुल का दीपक ,

में जन्मीं और हुई पराई ||

 

जिसने ऐसी रीत बनाई ,

उनसे मेरी यही लड़ाई |

भेदभाव की रीत बना के ,

क्यूँकर उनको लाज न आई ||

 

सब समझें सब जाने बूझें ,

फिर भी ढाकें मेरी कहानी |

क्यों न बोलें मेरे अपने ,

माई बाबा नाना नानी ||

 

में रौशनी इस आँगन की ,

क्यों न चमकूं जी भर खेलूं |

घूमूं बन के घर की रानी ,

क्यों चुप रहूं या थोड़ा बोलूं ||

 

मेरी बातें सुन कर तेरी ,

क्यूँकर आँखें नम हो आईं |

जुदा न हो पाएंगे रिश्ते ,

मिलकर पाटेंगे हम खाई ||

 

चल भैय्या दिल छोटा न कर ,

आज में देती यही दुहाई |

सदा मिलें और खुशियां लाएं ,

मेरी राखी तेरी कलाई ||

 

✍️ ༄ चन्द्र मोहन कत्याल ༄ कवी • लेखक

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