आज की भागदौड़ और आडम्बरी ज़िंदगी में एक दिली अपनापन, मेलजोल, हंसी ठट्ठा ...
ये सब दुर्लभ वस्तुएं हो गई हैं | इस एहसास को अपनी
कुछ मौलिक स्वरचित पंक्तियों के माध्यम से साझा कर रहा हूँ |
***
मरघट जैसी इस दुनियां में,
हल्ला गुल्ला करने वाले |
गुलगपाड़ा धमा चौकड़ी,
जम कर शोर मचाने वाले ||
मुझको अच्छे लगते हैं
कम पैसे का गम न रखकर,
दिलों में दम को रखने वाले |
लाफ्टर क्लब का छोड़ भरोसा,
हरदम खुल कर हंसने वाले ||
मुझको अच्छे लगते हैं
बार औ पब से नज़र हटा के,
देसी ढाबे जाने वाले |
घर कुटुंब संग बैठ वहां पे,
दाल रोटी खाने वाले ||
मुझको अच्छे लगते हैं
कुल्हड़ की सोंधी खुशबु में,
चाय की चुस्की लेने वाले |
मटके और सुराही का बस,
तर शीतल जल पीने वाले ||
मुझको अच्छे लगते हैं
सूट बूट में धंसे हुओं से,
कुर्ते और पायजामे वाले |
बैठ ज़मीं पे मार पालथी,
पंगत में जम जाने वाले ||
मुझको अच्छे लगते हैं
घर को बना के एक घराना,
भोले भाव में जीने वाले |
गुणा भाग छोड़ आपस का,
सह अस्त्तित्व में जीने वाले ||
मुझको अच्छे लगते हैं
मुझको अच्छे लगते हैं
✍️ ༄ चन्द्र मोहन कत्याल ༄ कवी • लेखक
ग्रेटर नॉएडा, उत्तर प्रदेश-201310, भारत
ईमेल : katyalchandra@gmail.com
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