अच्छे लगते हैं

आज की भागदौड़ और आडम्बरी ज़िंदगी में एक दिली अपनापन, मेलजोल, हंसी ठट्ठा ... ये सब दुर्लभ वस्तुएं हो गई हैं | इस एहसास को अपनी कुछ मौलिक स्वरचित पंक्तियों के माध्यम से साझा कर रहा हूँ |

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chandra mohan katyal
chandra mohan katyal 19 Aug, 2026 | 1 min read
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#chandramohankatyal, #HindiPoetry, #हिंदीकविता

आज की भागदौड़ और आडम्बरी ज़िंदगी में एक दिली अपनापन, मेलजोल, हंसी ठट्ठा ...

ये सब दुर्लभ वस्तुएं हो गई हैं | इस एहसास को अपनी

कुछ मौलिक स्वरचित पंक्तियों के माध्यम से साझा कर रहा हूँ |

*** 

मरघट जैसी इस दुनियां में,

हल्ला गुल्ला करने वाले |

गुलगपाड़ा धमा चौकड़ी,

जम कर शोर मचाने वाले ||

 

मुझको अच्छे लगते हैं 

 

कम पैसे का गम न रखकर,

दिलों में दम को रखने वाले |

लाफ्टर क्लब का छोड़ भरोसा,

हरदम खुल कर हंसने वाले ||

 

मुझको अच्छे लगते हैं 

 

बार औ पब से नज़र हटा के,

देसी ढाबे जाने वाले |

घर कुटुंब संग बैठ वहां पे,

दाल रोटी खाने वाले ||

 

मुझको अच्छे लगते हैं

 

कुल्हड़ की सोंधी खुशबु में,

चाय की चुस्की लेने वाले |

मटके और सुराही का बस,

तर शीतल जल पीने वाले ||

 

मुझको अच्छे लगते हैं 

 सूट बूट में धंसे हुओं से,

कुर्ते और पायजामे वाले |

बैठ ज़मीं पे मार पालथी,

पंगत में जम जाने वाले ||

 

मुझको अच्छे लगते हैं

 

 घर को बना के एक घराना,

भोले भाव में जीने वाले |

गुणा भाग छोड़ आपस का,

सह अस्त्तित्व में जीने वाले ||

 

मुझको अच्छे लगते हैं

मुझको अच्छे लगते हैं

 

✍️ ༄ चन्द्र मोहन कत्याल ༄ कवी • लेखक

ग्रेटर नॉएडा, उत्तर प्रदेश-201310, भारत

  ईमेल : katyalchandra@gmail.com

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