डिजिटल फास्टिंग: स्क्रीन से दूर..खुद के पास

हमारी लत के कारण, आजकल एक नया शब्द चलन में है — Digital Fasting। क्या है ये डिजिटल फास्टिंग? क्या फोन को भूखा रखना है?

Published By Paperwiff

Wed, Mar 25, 2026 6:15 PM

डिजिटल फास्टिंग: स्क्रीन से दूर..खुद के पास

हम हमेशा कहते हैं “बस पांच मिनट और…” और हमें खुद ही पता नहीं चलता कि कब घंटों गुजर जाते हैं, मोबाइल पर स्क्रोल करते हुए। मोबाइल ने हमारी जिंदगी में शरीर के किसी हिस्से की तरह जगह बना ली है। सुबह उठते ही स्क्रीन, रात को सोने से पहले स्क्रीन, और दिन भर हम हाथ में फोन थोड़े ही रखते हैं, लगता है जैसे फोन ने हमें पकड़ रखा है।

हमारी इसी लत के कारण, आजकल एक नया शब्द चलन में है — Digital Fasting।

क्या है ये डिजिटल फास्टिंग?

क्या फोन को भूखा रखना है?

नहीं...!

असल में ये खुद को स्क्रीन की गुलामी से आज़ाद करने की प्रैक्टिस है। यह कोई त्याग नहीं है, बल्कि वापसी है — अपनी ऊर्जा, अपने फोकस और अपनी असल ज़िंदगी की ओर।

इसकी सबसे मज़ेदार बात यह है कि डिजिटल फास्टिंग कोई टेक्निकल गाइड नहीं है। यह बस ऐसा है कि हम अपने मन को टैक्नोलॉजी से थोड़ा दूर रखकर उसे थोड़ी राहत देना चाहते हैं।

इसी विषय को लेकर हाल ही में एक सीरीज़ भी बनी है “थोड़ा दूर थोड़ा पास” ।

इसकी कहानी में दूसरे भी कईं पहलू जोड़ दिए गए हैं, लेकिन उसका मैसेज साफ है डिजिटल

एडिक्शन से बाहर निकल कर लाइफ़ को जीना।

कभी-कभी रिश्तें निभाने के लिए भी , फोन से दूरी जरूरी है, ताकि हम अपने अन्तर्मन की आवाज़ साफ़ सुन सकें।

क्यों ज़रूरी है यह थोड़ी दूरी?

हम सभी जानते हैं कि मन की शांति के लिए खुद के साथ बैठना बहुत जरूरी है। लेकिन इंटरनेट पर आजकल इतना और इस तरह का कंटेंट है जो मन को शोर से भर देता है, सूचनाओं का मायाजाल इतना उलझा देता है कि इंसान कन्फ्यूज़ हो जाता है, उसे समझ ही नहीं आता कि क्या करें? क्या न करें? अनजाने में ही हम सब इस अथाह शोर से प्रभावित होते हैं..

आइए देखते हैं कैसे..?

* नोटिफिकेशन का शोर बार बार ध्यान भटकाता है।

* कभी कभी दूसरों की लाइफ़ देखकर अपनी लाइफ़ को कमतर समझने का भाव भी आ जाता है।

* काम के बीच में बार-बार फोन चेक करने से फोकस टूटता है।

* देर रात तक स्क्रीन पर रहने से नींद खराब होती है।

* सुबह से शाम तक एक अजीब थकान बनी रहती है।

* आंखों पर ख़राब असर होता है।

ये सब समस्याएं एक दिन में सामने नहीं आती हैं, ये धीरे-धीरे मन को खोखला कर देती हैं। डिजिटल फास्टिंग.. एकदम से फोन का त्याग करने को नहीं कहता है, बल्कि मांइडफुलनेस से इसका प्रयोग करने की हिमायत करता है।

इसका संदेश सिर्फ इतना है कि..

"खुद के पास आना चाहते हो तो स्क्रीन से थोड़ा दूर रहो।"

शुरूआत कैसे करें?

इसकी कोई रूल-बुक नहीं है। अपने मन और काम के हिसाब से डिजिटल फास्टिंग की शुरुआत की जा सकती है। चलिए कुछ सामान्य नियमों को खुद बना लेते हैं....

1. सुबह उठकर फोन नहीं पकड़ें कम से कम 45 मिनट। सुबह की ऊर्जा स्क्रीन की नहीं, हमारी खुद की होनी चाहिए।

2. एक "फोन-रहित घंटा" रोज बितायें..चाहे शाम की चाय के समय या फिर रात के खाने के समय। अपने परिवार को, और खुद को बिना स्क्रीन के देखना एक अलग ही सुकून देता है।

3. सोशल मीडिया का डिटॉक्स डे सप्ताह में एक दिन तो कर ही सकते हैं। एक दिन की दूरी बहुत कुछ साफ कर देती है — जैसे कहानी में रिश्ते तब साफ होते हैं जब दोनों एक-दूसरे को थोड़ा स्पेस देते हैं।

4. बेवजह फोन उठाने की आदत पर नज़र रखें अक्सर हम बोरियत में, तनाव में या बस आदत की तरह फोन उठाते हैं। जैसे ही ऐसा करें—एक बार रुककर खुद से पूछें: “क्या ये ज़रूरी है?”

5. रात को ‘डिजिटल सनसेट’ बनाएं यानि सोने से एक घंटे पहले फोन बंद। इससे  नींद गहरी होगी और मन हल्का होगा।

Digital Fasting से क्या मिलता है?

* दिमाग शांत होता है।

* फोकस बढ़ता है।

* भावनाएँ स्थिर होती हैं।

* क्रिएटिविटी बढ़ती है।

* रिश्तों में मधुरता आती है।

* और सबसे ज़रूरी, खुद को आराम मिलता है।

डिजिटल फास्टिंग ख़राब नियम नहीं है। ये एक समझदारी है, रूककर सोचने के लिए ...कि हम अपनी ऊर्जा कहाँ दे रहे हैं और कहाँ से ले रहे हैं। कभी-कभी स्क्रीन से थोडा़ दूर रहना हमें खुद के बहुत पास ले आता है।

ज़िंदगी को महसूस करने के लिए बस इतना ही काफी है कि कभी-कभी फोन नीचे रख दें, और अपने होने को जी लें, अपनी सांसों पर ध्यान दें।