Digital Arrest - लूट का नया खेल

डिजिटल अरेस्ट लूट का नया खेल है, जिसमें हथियार बंदूक या चाकू नहीं, डर होता है। इसलिए इस खेल का सबसे मजबूत तोड़ है, जागरूकता और संयम।

Published By Paperwiff

Wed, Feb 11, 2026 2:07 PM

Digital Arrest - लूट का नया खेल

पिछले कुछ महीनों में एक शब्द बहुत तेज़ी से सुनाई दे रहा है — डिजिटल अरेस्ट।

नाम सुनते ही ऐसा लगता है जैसे यह कोई कानूनी प्रक्रिया हो, लेकिन सच्चाई इसके बिल्कुल उलट है। डिजिटल अरेस्ट ठगी का नया और बेहद खतरनाक तरीका है। इसमें इंसान के शरीर को नहीं, उसकी सोच और समझ को कैद किया जाता है। डर, भ्रम और मानसिक दबाव की आड़ में व्यक्ति से उसकी मेहनत की कमाई निकलवा ली जाती है।

डिजिटल अरेस्ट का सबसे घटिया पहलू यह है कि इसमें ठग खुद को कानून का प्रतिनिधि बताकर सामने आते हैं।

खुद को असली साबित करने के लिए वे वर्दी, पहचान पत्र, गंभीर आवाज़, कानूनी शब्दावली और नकली सेटअप तक का इस्तेमाल करते हैं। सब कुछ इतना वास्तविक दिखाया जाता है कि एक सामान्य व्यक्ति घबरा जाता है और डर के मारे अपनी सोचने-समझने की क्षमता खो बैठता है।

आइए समझते हैं कि यह ठगी कैसे की जाती है।

अक्सर इसकी शुरुआत एक फोन कॉल या वीडियो कॉल से होती है। कॉल करने वाला खुद को पुलिस, CBI, ED या किसी सरकारी एजेंसी का अधिकारी बताता है। वह कहता है कि आपके आधार, पैन या बैंक खाते से अवैध लेन-देन हुआ है, किसी बड़े अपराध में आपका नाम जुड़ गया है और इस समय आप डिजिटल अरेस्ट में हैं।

फिर सख़्त लहजे में आदेश दिया जाता है ...फोन मत काटिए, किसी और से बात मत कीजिए।

यहीं से असली खेल शुरू होता है।

डर का खेल।

विक्टिम (पीड़ित) को बताया जाता है कि अगर उसने सहयोग नहीं किया तो उसकी तुरंत गिरफ्तारी कर ली जाएगी, फिर उसकी बदनामी होगी और परिवार को भारी परेशानी झेलनी पड़ेगी। इसके बाद “जांच” के नाम पर बैंक विवरण, OTP या पैसे ट्रांसफर करने को कहा जाता है। भरोसा दिलाया जाता है कि यह केवल वेरिफिकेशन (जाँच) है और पैसे वापस मिल जाएंगे। लेकिन जैसे ही कॉल कटती है, सच्चाई सामने आ जाती है — पैसा चला जाता है और ठग गायब हो जाते हैं।

यह ठगी इसलिए सफल हो जाती है क्योंकि डर में इंसान अपनी सोच-समझ खो बैठता है। वह यह तक नहीं सोच पाता कि कोई अधिकारी फोन पर गिरफ्तारी कैसे कर सकता है, या अगर जांच करनी भी है तो उसका खर्च सरकार उठाएं , हमसे पैसे क्यों लिए जा रहे हैं।

अब कुछ जरूरी बातें जो साफ़-साफ़ समझना और याद रखना ज़रूरी है...

1- भारत में डिजिटल अरेस्ट नाम की कोई कानूनी प्रक्रिया नहीं है।

2- कोई भी पुलिस या एजेंसी फोन या वीडियो कॉल पर गिरफ्तारी नहीं करती है।

3- किसी भी जांच या केस में पैसे फोन पर नहीं लिए जाते है।

4- असली कार्रवाई हमेशा लिखित नोटिस और आधिकारिक प्रक्रिया से होती है।

डिजिटल अरेस्ट (Digital Arrest) का असली मतलब है — आपको डराना और मानसिक रूप से अकेला कर देना।

इसीलिए ठग सबसे पहले यही कहते हैं कि किसी से बात मत कीजिए। वे जानते हैं कि जैसे ही आप किसी अपने से बात करेंगे, आपका डर कमजोर पड़ जाएगा और उनकी ठगी असफल हो जाएगी।

डिजिटल अरेस्ट से बचाव के उपाय मुश्किल नहीं हैं, बस उन्हें याद रखना ज़रूरी है..

1- डर पैदा करने वाली किसी भी कॉल को गंभीरता से नहीं, संदेह की नज़र से देखें।

2- वर्दी, आईडी या वीडियो कॉल देखकर घबराएँ नहीं।

3- कोई भी जानकारी, ओटीपी (OTP) या पैसा फोन पर बिल्कुल न दें।

4- तुरंत कॉल काट दें, चाहे सामने वाला कितना भी कहे कि कॉल मत काटना।

5- परिवार के किसी सदस्य या भरोसेमंद व्यक्ति से तुरंत बात करें।

6-साइबर ठगी की स्थिति में 1930 पर कॉल करें या cybercrime.gov.in पर शिकायत दर्ज करें।

बुजुर्गों को इस बारे में बार-बार समझाना बेहद ज़रूरी है, क्योंकि ठग सबसे पहले उन्हीं को अपना निशाना बनाते हैं। डिजिटल जानकारी की कमी के कारण वे डर या भरोसे में जल्दी आ जाते हैं।

डिजिटल अरेस्ट लूट का नया खेल है, जिसमें हथियार बंदूक या चाकू नहीं, डर होता है।

इसलिए इस खेल का सबसे मजबूत तोड़ है, जागरूकता और संयम।

डिजिटल फ्रॉड के हर मामले में जानकारी ही सबसे बड़ा बचाव है। अगर किसी बात की जानकारी न हो, तो भी घबराएँ नहीं। शांति रखें और किसी विश्वसनीय व्यक्ति को बीच में लाने की कोशिश करें।

अगर आपके आसपास इस तरह की कोई घटना हुई हो, तो आप हमारे साथ साझा कर सकते हैं।
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