जाने भी दो (Let Go): सबसे ज़रूरी समझ

आज हम जिस समय में जी रहे हैं, वहाँ जानकारी बहुत है, सलाह भी बहुत है, लेकिन सुकून कम होता जा रहा है। हर कोई आगे जाना चाहता है और इसी होड़ में कितने ही लोग दूसरों को कुचलकर भी आगे बढ़ने से नहीं हिचकते।

Published By Paperwiff

Mon, Jan 19, 2026 6:54 PM

जाने भी दो (Let Go): सबसे ज़रूरी समझ

जाने भी दो (Let Go): सबसे ज़रूरी समझ

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आज इंसान खुद को काफ़ी थका हुआ महसूस कर रहा है। लेकिन यह थकान दिन भर की भाग-दौड़ से ज़्यादा, मन की थकान है। हम हर दिन बहुत कुछ सहते हैं, बहुत कुछ सोचते हैं और बहुत कुछ भीतर दबाकर आगे बढ़ जाते हैं। समाज हमें यह भी सिखाता है कि हम कई रूपों में रहें। सबके सामने एक जैसे हम हो भी नहीं सकते। लेकिन दिन पर दिन मिलने वाले कुछ कड़वे अनुभव हमें भीतर से तोड़ते जाते हैं। बाहर से जीवन चलता रहता है, लेकिन भीतर बहुत कुछ रुक जाता है। शायद कोई पुरानी बात, कोई अधूरा रिश्ता, या कोई ऐसा अनुभव जिसे हमने समय रहते छोड़ने की कोशिश ही नहीं की।

आज हम जिस समय में जी रहे हैं, वहाँ जानकारी बहुत है, सलाह भी बहुत है, लेकिन सुकून कम होता जा रहा है। हर कोई आगे जाना चाहता है और इसी होड़ में कितने ही लोग दूसरों को कुचलकर भी आगे बढ़ने से नहीं हिचकते।

तो क्या हम खुद को कुचल जाने दें?

नहीं, बिल्कुल नहीं। सावधान रहें, सतर्क रहें।

लेकिन अगर कुछ ख़राब घट चुका है, तो उसे पीछे छोड़ना भी सीखना होगा। यह समझना ज़रूरी है कि आगे बढ़ने से पहले क्या छोड़ना ज़रूरी है। यहीं से “जाने दो” की बात शुरू होती है।

“जाने दो” यानी लेट गो कोई आध्यात्मिक अभ्यास नहीं है, यह आज के जीवन की एक व्यावहारिक ज़रूरत है।हम अक्सर मान लेते हैं कि जो हमें महसूस हो रहा है, वही सच है। या जो हमने सीखा है, समझा है, वही ठीक है। लेकिन यह हमेशा सच नहीं होता। कई बार हम वास्तविकता नहीं, अपनी व्याख्या पकड़कर बैठे होते हैं।

कोई छोटी-सी बात, जो किसी और के लिए सामान्य होती है, हमारे लिए पीड़ादायक इसलिए हो जाती है क्योंकि वह हमारी किसी पुरानी चोट को छू लेती है। तब हम यह सोचने लगते हैं कि मुझे ही बार-बार ऐसे अनुभव क्यों मिलते हैं। इसलिए ठहरकर अपने ट्रिगर्स को पहचानना और उन पर काम करना ज़रूरी हो जाता है।

वर्तमान संदर्भ में “जाने दो” इसलिए भी ज़रूरी है क्योंकि आज जीवन बहुत तेज़ हो गया है। रिश्ते, काम, अपेक्षाएँ, महत्वाकांक्षाएँ — कितना कुछ है जिसे मैनेज़ करना है। अगर ऐसे में मन पुराने बोझ उठाए रहेगा, तो न वर्तमान जिया जा सकेगा और न उसका आनंद आएगा। ऐसे में, मन धीरे-धीरे उदास, निराश और ऊर्जाहीन होता जाता है, और यही दबाव आगे चलकर गुस्सा, चिड़चिड़ापन और शिकायतों के रूप में बाहर आता है।

“जाने दो” का अर्थ यह नहीं है कि जो हुआ वह सही था। इसका अर्थ यह भी नहीं है कि आपको दर्द नहीं हुआ। जाने दो का अर्थ है यह स्वीकार करना कि उस अनुभव को ढोते रहना अब आपके लिए नुकसानदेह है। यह एक बेहतर समझ है, कोई भावनात्मक पलायन नहीं। घटना से मिली सीख को अपनाना है, और घटना को छोड़ देना है।

हम हर चीज़ अपने नियंत्रण में रखना चाहते हैं, जबकि सच्चाई यह है कि हर स्थिति को ठीक करने की ज़िम्मेदारी हमारी नहीं होती।

आज के समय का सबसे बड़ा “लेट गो” यह है कि हम हर बात को व्यक्तिगत लेना बंद करें। हर असहमति अस्वीकृति नहीं होती और हर घटना हमारे खिलाफ नहीं होती।

“जाने दो” का एक पहलू शरीर से भी जुड़ा है। हमारा शरीर वह सब याद रखता है जिसे हम भूलना चाहते हैं। नकारात्मक बातों पर ध्यान जाना हमारी स्वाभाविक प्रवृत्ति है। इसलिए भूलने के लिए खुद पर दबाब न डालें। केवल स्वीकार करें, देखें और अपनी दिनचर्या को अच्छे कार्यों से भरते रहें।

यह भी समझना ज़रूरी है कि “जाने दो” एक बार का कार्य नहीं है। यह रोज़ का अभ्यास है। कभी हम किसी विचार को छोड़ते हैं, कभी किसी उम्मीद को और कभी किसी पुराने डर को। कभी सब आसान लगता है, कभी नहीं। लेकिन जब सही मायनों में जाने देते हैं, तो भीतर जो हल्कापन महसूस होता है, वह शब्दों में नहीं बताया जा सकता।

आज जब वर्तमान परिवेश हमसे बहुत कुछ माँग रहा है, तब “जाने दो” हमें यह सिखाता है कि हर माँग का जवाब देना ज़रूरी नहीं है। कभी-कभी अपनी ओर लौटना और अपनी शांति चुनना ही सही विकल्प होता है। जब हम भीतर से हल्के होते हैं, तो बाहर की परिस्थितियाँ भी उतनी भारी नहीं लगतीं।

अंत में इतना ही कि “जाने दो” अपने आप से किया गया एक शांत समझौता है, कि जो बीत चुका है, वह अब वर्तमान को प्रभावित नहीं करेगा। जीवन को पूरी तरह नियंत्रित करना संभव नहीं है, लेकिन यह तय करना हमारे हाथ में है कि हम क्या पकड़े रखें और क्या छोड़ दें। यही आज के समय की सबसे बड़ी समझ है।

जाने दो की समझ को मजबूत करने में कुछ अभ्यास सहायक होते हैं...

*रोज़ ब्रीदिंग एक्सरसाइज करें। प्राणायाम, योग आदि मन और मस्तिष्क को मजबूती देते हैं।

*जितना हो सके प्रकृति के करीब रहें। खुली हवा में घूमना, हरी घास पर चलना तनाव को कम करता है।

*अपने आप को महसूस करें। मिट्टी या घास पर नंगे पाँव चलें, पानी में पाँव डालकर बैठें। इसे ग्राउंडिंग कहते हैं।

*डायरी लिखें। मन का बोझ लिखकर हल्का करें। लिखकर फाड़ देना भी “जाने दो” का एक प्रभावी अभ्यास है।

इस संदर्भ में आपके क्या अनुभव है? और यह ब्लॉग आपको कैसा लगा, हमें ज़रूर बताइए।

आप किस विषय पर आगे पढ़ना चाहते हैं, अपने सुझाव जरूर साझा करें, आपके सभी सुझावों का स्वागत है।