जी ले ज़रा

पति के सहयोग से दुनिया जीती जा सकती है लेकिन जब पति ही कटघरे में खड़ा कर दे तो कोई कहाँ जाए? चुपचाप सोने चली आई मेघा... आँखों में सावन - भादो तैरने लगे।

ARCHANA ANAND
16 Aug, 2020 • 1 min read min read • hi
❤️ 4 💬 4 👁 987
##Social issues ##Inspiration
जी ले ज़रा

Photo by Dorothy Puscas on Unsplash

" किससे बात कर रही थीं घंटे भर से ?" प्रणव ने पूछा था।

" मेरी एक दोस्त थी " मेघा ने धीरे से कहा।

" आजकल बड़े दोस्त बनाए जा रहे हैं ?" व्यंग्य से प्रणव ने पूछा।यह सवाल जवाब जानने की गरज से नहीं किया गया था लेकिन मेघा ने धीमी आवाज़ में कहा " ऐसा नहीं है, सारा दिन घर पर ही रहती हूँ तो थोड़ी बातचीत कर ली ,क्यों क्या हुआ ?"

" शरीफ घर की औरतों के यही लक्षण हैं? देख रहा हूँ आजकल मनमर्जियाँ बहुत बढ़ गई हैं तुम्हारी ।"

" पर ऐसा क्या कर दिया मैंने ?"

" मैं क्या जानता नहीं? दुनिया भर के आभासी दोस्त बना रखे हैं।लेखन के नाम पर गुलछर्रे उड़ाए जा रहे हैं, तुम्हें क्या लगता है, मैं समझता नहीं ?"


मेघा इस अचानक हुए हमले से बौखला गई थी। "घर के सारे काम निबटाकर अगर थोड़ी देर किसी से थोड़ी गपशप कर ली तो ऐसा क्या अनर्थ हो गया ?" उसने अपना पक्ष रखना चाहा था।उसकी इसी बात पर प्रणव तमतमा उठा था और अपने मन का सारा गुबार मेघा पर उड़ेल दिया था।लगे हाथों उसके चरित्र पर भी छींटाकशी करता चला गया था वह।बचाव में मेघा ने भी अपना पक्ष रखा और फिर तकरार बढ़ती चली गई।


फिर तो घंटों चीखता रहा था वह मेघा पर और सहमी सी मेघा चुपचाप खड़ी रह गई थी।पति के सहारे दुनिया जीती जा सकती है लेकिन जब पति ही कटघरे में खड़ा कर दे तो कोई कहाँ जाए? चुपचाप उसे अनसुना करने की कोशिश करती हुई सोने चली आई थी मेघा।आँखों में सावन - भादो तैरने लगे।अनवरत बरसती आँखों में कितनी ही बातें, कितनी ही यादें तैरने लगीं।


छुईमुई सी थी वो जब प्रणव के साथ सात फेरे लिए थे।उच्च शिक्षा की अदम्य लालसा थी उसके अंदर लेकिन घरवालों ने शादी करा दी थी।पति से जब पढ़ने की इच्छा जताई तो उसने साफ सीधे मना कर दिया था।साथ ही एक ताना भी उछाल दिया था - " पढ़ने की इतनी ही इच्छा थी तो शादी क्यों कर दी घरवालों ने ?"

मेघा अपने आँसू पीकर रह गई थी।वह अब अपने तथाकथित घर की बंदिनी थी।उसकी सुघड़ता घर भर पर अपनी छाप छोड़ गई पर पति के दिल पर नहीं।तिल भर भी जगह वह अपने पति के पाषाण हृदय में नहीं बना पाई।

प्रणव पितृसत्ता का वाहक पति था।ज़रा ज़रा सी बात पर चिल्लाना उसकी आदत थी और व्यंग्य करना उसका शगल।


पति में प्रेमी तलाशती मेघा हरसंभव प्रयास करती पर कभी भी उसे संतुष्ट नहीं कर पाती।आख़िर हारकर मेघा ने उससे कुछ भी शेयर करना बंद कर दिया।सोशल मीडिया पर लोगों को लिखते पढ़ते देख उसे भी थोड़ा उत्साह जगा और उसने कहानियाँ , कविताएँ लिखनी शुरू कर दीं।सरल स्वभाव की मेघा की रचनाएँ किसी सुरभि की तरह लोगों तक पहुंचने लगीं और कई आभासी मित्र बन गए।पुरुष मित्रों से एक तयशुदा दूरी ही रखी उसने।किसी को दिल तक फटकने भी नहीं दिया।जिसे टूटकर चाहा जब वही तोड़कर रख दे तो भला गैरों से कोई अपेक्षा भी क्यों करे ?


पर आज प्रणव का व्यवहार उसे अंदर तक रुला गया था।कानों में पिघले शीशे सा गूंज रहा था - "लेखिका बनेगी ,बड़ी लेखिका, गुलछर्रे उड़ाने का खूब तरीका ईजाद किया है।"

वह काँप उठी थी, इतना संभलकर चलने के बाद भी...क्या था यह सब ? पुरुष भला पत्नियों को खरीदी हुई संंपत्ति क्यों समझते हैं ?"

रोते रोते ही कब उसकी आँख लग गई उसे पता ही नहीं चला।

" आज दोपहर तक सोई रहने वाली हैं क्या ?" प्रणव की तेज़ आवाज़ से वो जैसे नीम बेहोशी से जागी थी।आँखों में सूईयाँ सी चुभ रही थीं।रात प्रणव की कही गई बातें, प्रताड़ना, लांछन सब दिमाग में घूम रहे थे।उसे लगा जैसे दुनिया घूम रही हो।


कोरोनाकाल ने उसके घर को भी उतना ही तबाह किया था जितना विश्व को।पति की कुंठाओं का वह एकमात्र कोपभाजन थी।आँखें गूलर के फूल सी सूजी हुई थीं उसकी।प्रणव ने देखकर भी उसे अनदेखा कर दिया था।मेघा चुपचाप रसोई में चली आई थी।आज कोई तीन महीने बाद प्रणव दफ्तर जा रहा था।नाश्ता बनाकर चुपचाप प्रणव को दफ़्तर भेजकर सोफे पर बैठ गई।आँखों से फिर आषाढ़ बह चला था।तभी बाहर झमाझम बारिश शुरू हो गई।मेघा नहाने के लिए बाथरूम चली गई।देर तक शॉवर के नीचे अपना अवसाद बहाती रही थी वो।जब नहाकर बाहर आई तो बारिश थम चुकी थी, बाहर धुली धूप और चमकीली हरियाली बिछी हुई थी।


मेघा धीरे से हाउसकोट पहन लॉन में चली आई।फूलों पर स्निग्ध धूप बिछी हुई थी, कहीं कहीं पत्तों पर सलोनी नन्हीं बूंदें अठखेलियाँ कर रही थीं।उसने प्रकृति की इस छटा को जमकर अपने कैमरे में कैद किया।लौटकर अपनी पसंद का संगीत लगा दिया।शीशे में खुद को निहारा।ये कैसी हो गई थी वह,हल्का सा मेकअप करके खुद को संवारा।बालों को समेटते हुए अचानक लगा जैसे हम औरतें कितना कुछ समेटती रहती हैं, सिवाय खुद के।संगीत की धुन पर धीरे धीरे थिरकने लगी,मन का अवसाद नृत्य के साथ उतरता हुआ सा महसूस हुआ उसे।


अपने कमरे में आकर खिड़की से परदे सरका दिए।सामने पत्तों से बूंदें धीरे - धीरे मिट्टी में घुलकर मिलती जा रही थीं।पत्ते वैसे ही निष्प्रभ होकर चमक रहे थे।मेघा से जैसे उसके मन ने कहा कि बरसना प्रकृति है और बूंदों का सूखकर मिट्टी में मिल जाना नियति।


उसने एक नज़र घड़ी पर डाली।शाम के छः बजे थे,प्रणव के आने का समय हो चला था।जानती थी कि प्रणव के घर में दाखिल होते ही सबकुछ वैसा ही हो जाएगा - अवसाद से भरपूर और रंगहीन पर उसने तय कर लिया था कि वह सदा ऐसे ही रहेगी ,इन पत्तों की तरह सदाबहार ...एक फीकी सी मुस्कान के साथ उसने अपनी डायरी खोली और उसपर लिख दिया - ' एक भरपूर दिन ।' आख़िर खुश रहने का हक तो सबसे पहले हमारा है न?


4 likes
☕

Support ARCHANA ANAND

Appreciate this story? Send a small tip to encourage the author to write more great work!

Please login to tip the author.

ARCHANA ANAND
Published By

ARCHANA ANAND

@archana2jhs

Comments

Appreciate the author by telling what you feel about the post 💓

  • Sunita Pawar · 6 years ago last edited 6 years ago

    बहुत अच्छी कहानी लिखी है❤️

  • Sonia Madaan · 6 years ago last edited 6 years ago

    Beautifully penned ?

  • Sushma Tiwari · 6 years ago last edited 6 years ago

    निशब्द हूं.. एक एक लाइन गहराई से दिल में उतरता चला गया.. क्या लिखा है ??"?

  • ARCHANA ANAND · 6 years ago last edited 6 years ago

    हृदयतल से आभार आप सखियों का @Sunita Pawar, @Sonia Madaan , @Sushma Tiwari ??

Please Login or Create a free account to comment.

★ Recommended For You

Stories tailored to your recent reading preferences

More stories in Fiction
fazal Esaf • 12 Jun, 2025 • 1 min read min

बिल के उस पार"

सफ़दर अली को लीवर संक्रमण के कारण आईसीयू में भर्ती हुए छह दिन हो चुके थे। उनकी पत्नी ज़ेबा, एक स्कूल टीचर, इलाज के ₹2,83,000 के भारी बिल को देखकर परेशान थी, क्योंकि डॉक्टरों ने अगले दिन तक आईसीयू का भुगतान करने या सफ़दर को जनरल वार्ड में शिफ़्ट करने के लिए कहा था। उसकी मासिक आय इस बिल का एक तिहाई भी नहीं थी। मदद के लिए, ज़ेबा ने सबसे पहले मस्जिद के इमाम साहब को फ़ोन किया, जिन्होंने चंदा इकट्ठा करने का आश्वासन दिया। फिर उसने स्कूल की प्रिंसिपल को कॉल किया, जिन्होंने व्हाट्सएप ग्रुप में मैसेज डालने की पेशकश की, लेकिन कोई आधिकारिक मदद नहीं की। उसकी आख़िरी उम्मीद वक़्फ़ बोर्ड की वेबसाइट भी बेकार साबित हुई। अगले दिन, सफ़दर की हालत बिगड़ने पर, डॉक्टर ने बताया कि लीवर ट्रांसप्लांट ज़रूरी है और इसका खर्च लगभग ₹18 लाख होगा। यह सुनकर ज़ेबा पूरी तरह टूट गई। उसे याद आया कि कैसे समाज के लोग दूसरों की मदद करने में उदासीन रहते हैं। कहानी इन सवालों के साथ समाप्त होती है कि क्या मस्जिदें और वक़्फ़ संपत्तियाँ वास्तव में ज़रूरतमंदों के लिए उपलब्ध हैं, क्या मुस्लिम समुदाय ने स्वास्थ्य आपात स्थितियों के लिए ठोस व्यवस्थाएँ की हैं, और क्या हम केवल प्रार्थनाओं तक ही सीमित रह गए हैं जब किसी को वास्तविक सहायता की आवश्यकता होती है। यह इस बात पर भी विचार करती है कि क्या समाज में किसी "ज़ेबा" को अकेला छोड़ दिया जाना चाहिए। यह कहानी एक महत्वपूर्ण प्रश्न उठाती है: "जब कोई बीमार होता है, क्या हम केवल संवेदना भेजते हैं, या समाधान भी?"

566 0
More stories in Fiction
fazal Esaf • 11 Jun, 2025 • 1 min read min

माफ़ी का मर्म

यह कहानी एक बुजुर्ग मुस्लिम इमाम हाजी यूसुफ़ साहब की है, जिनके बेटे की नृशंस हत्या पड़ोस में रहने वाले एक युवक ने कर दी। हत्या का कोई मजहबी या व्यक्तिगत कारण नहीं था — बस घृणा और ग़लतफहमी से उपजा हिंसक आवेग। पूरे मोहल्ले में शोक और ग़ुस्से का माहौल था। लेकिन जब अदालत में हाजी यूसुफ़ से यह पूछा गया कि वे क्या सज़ा चाहते हैं, तो उन्होंने हत्यारे को माफ कर दिया। उन्होंने कहा, "अगर मैं बदला लूंगा, तो मैं भी उसी घृणा में जीऊंगा जिसने मेरे बेटे की जान ली। लेकिन अगर मैं माफ कर दूं, तो शायद यह घृणा का अंत हो।" यह निर्णय सबको चौंका देता है — पड़ोसी, गैर-मुस्लिम मित्र, और समाज के वे लोग भी जो सोचते थे कि धर्म अलग करता है। इस माफ़ी ने लोगों को आत्म-चिंतन के लिए मजबूर कर दिया: जब ग़लती उसकी नहीं थी, तो वह फिर भी माफ कैसे कर सका? क्या हम दूसरों की गलतियों को इस तरह क्षमा कर सकते हैं? क्या हमारा धर्म, जाति, या पूर्वग्रह हमें मानवता से दूर कर रहे हैं? "माफ़ी का मर्म" सिर्फ एक कहानी नहीं, बल्कि आत्मा की गहराई से निकली इंसानियत की पुकार है — यह दिखाती है कि सच्ची शक्ति बंदूक में नहीं, माफ़ी में होती है।

565 0
More stories in Fiction
fazal Esaf • 06 Jun, 2025 • 1 min read min

माँ हूँ मैं – सलमा की कहानी"

"माँ हूँ मैं – सलमा की कहानी" यह कहानी एक जुझारू माँ सलमा बी की है, जो अपने निर्दोष बेटे रामिज को झूठे चोरी के आरोप से बचाने के लिए अकेले लड़ती है। बिना पैसे, बिना सहारे, लेकिन सच्चाई और ममता के बल पर वह गवाह ढूंढती है, सबूत इकट्ठा करती है और अंततः अपने बेटे को जेल से आज़ाद कराती है। यह कहानी हर माँ के हौसले और हर बेगुनाह की उम्मीद का प्रतीक है।

465 0
More stories in Fiction
Frances Jean Albino • 18 Jul, 2024 • 1 min read min

Someone once hurt me, but I choose to forgive

Choosing to forgive

1008 0